नीलकंठ -जब प्रेम ने विज्ञान से पूछा, “भक्ति क्या है?”
लेखक: एम बलवंत सिंह खन्ना सावन का चौथा सोमवार था। सुबह से ही शहर के शिवालयों में घंटियों की आवाज गूंज रही थी। कहीं कांवड़िए भगवा वस्त्रों में हर-हर महादेव का उद्घोष करते हुए आगे बढ़ रहे थे, तो कहीं महिलाएँ और युवतियाँ शिवलिंग पर जल चढ़ाने के लिए कतार में खड़ी थीं। सोशल मीडिया…
तुमने मुझे सुना था
लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना©️ रात के साढ़े ग्यारह बजे थे। शहर की ज्यादातर खिड़कियों में रोशनी बुझ चुकी थी, लेकिन निखिल के कमरे की खिड़की अब भी खुली थी। सामने सड़क पर आती-जाती गाड़ियों की रोशनी कमरे की दीवार पर कुछ पल के लिए चमकती और फिर अंधेरा पहले से थोड़ा गहरा हो…
ज़ेन जी: एक पीढ़ी का प्रश्न या व्यवस्था के लिए चेतावनी?
अधिकार, आक्रोश और लोकतंत्र के बदलते चेहरे पर एक चिंतन लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना©️ भारत एक युवा देश है। यह बात हम दशकों से सुनते आए हैं। लेकिन हर पीढ़ी अपने समय के प्रश्नों के साथ सामने आती है। कभी आज़ादी की लड़ाई लड़ने वाली पीढ़ी थी, कभी आपातकाल का विरोध करने वाली,…
कॉकरोच से क्रांति तक: क्या इतिहास स्वयं को दोहरा रहा है?
अन्ना आंदोलन 2011 बनाम कॉकरोच जनता पार्टी आंदोलन 2026 का तुलनात्मक विश्लेषण लेखक: एम. बी. बलवंत सिंह खन्ना भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में कुछ आंदोलन ऐसे होते हैं जो केवल सरकार के खिलाफ विरोध नहीं होते, बल्कि व्यवस्था और जनता के बीच बढ़ती दूरी का प्रतीक बन जाते हैं। वर्ष 2011 का अन्ना हज़ारे आंदोलन…
चेहरा नहीं, भरोसा याद रहता है
डिजिटल युग के अनकहे रिश्तों पर एक चिंतन लेखक: एम. बी. बलवंत सिंह खन्ना मनुष्य के जीवन में कुछ रिश्ते जन्म से मिलते हैं, कुछ समय के साथ बनते हैं और कुछ ऐसे भी होते हैं जिनका न कोई नाम होता है, न कोई परिचय और न ही कभी आमने-सामने मुलाकात। फिर भी वे हमारे…
आज़ादी बनाम असुरक्षा: सवाल लड़कियों की स्वतंत्रता पर नहीं, समाज की मानसिकता पर है
लेखक: एम. बी. बलवंत सिंह खन्ना भारत जैसे सामाजिक ढांचे वाले देश में किसी लड़की का घर की चौखट पार कर अपने दम पर खड़ा होना आज भी आसान नहीं है। आज भी लाखों लड़कियाँ ऐसी हैं जिन्हें पढ़ाई, नौकरी, करियर या अपने निर्णय लेने की आज़ादी बड़ी मुश्किल से मिलती है। कई घरों में…
जब युवा सड़क पर हो और सत्ता सफाई में: आखिर सुन कौन रहा है?
लेखक: एम. बी. बलवंत सिंह खन्ना किसी भी राष्ट्र की वास्तविक स्थिति जाननी हो तो उसके शेयर बाजार, ऊँची इमारतों या चुनावी भाषणों को मत देखिए। उसके युवाओं की आँखों में झाँकिए। यदि वहाँ उम्मीद दिखाई दे तो समझिए राष्ट्र सही दिशा में है, और यदि वहाँ गुस्सा, निराशा तथा अविश्वास दिखाई दे तो समझिए…
जब लालच रिश्तों से बड़ा हो जाता है
लेखक: एम. बी. बलवंत सिंह खन्ना किसी भी सभ्य समाज की पहचान उसकी इमारतों, सड़कों या आर्थिक प्रगति से नहीं होती। उसकी पहचान इस बात से होती है कि वह अपनी बेटियों के साथ कैसा व्यवहार करता है। जिस समाज में बेटियाँ सम्मान और सुरक्षा के साथ जीती हैं, वही समाज वास्तव में सभ्य कहलाने…
“त्याग सिर्फ जनता करे, तो सत्ता किसलिए?”
लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना भारत एक लोकतांत्रिक और कल्याणकारी राष्ट्र है। यहाँ सरकार केवल शासन करने के लिए नहीं चुनी जाती, बल्कि संकट के समय जनता की ढाल बनने के लिए चुनी जाती है। लेकिन हर बड़े संकट, हर आर्थिक दबाव और हर राष्ट्रीय चुनौती के समय एक सवाल बार-बार सिर उठाता हैक्या…
“लोकतंत्र की दिशा: मताधिकार से मुद्दों तक”
लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना भारत का लोकतंत्र एक दिन में नहीं बना-यह सदियों के संघर्ष, असंख्य बलिदानों और जनचेतना के जागरण का परिणाम है। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम केवल अंग्रेज़ों से मुक्ति की लड़ाई नहीं थी, बल्कि यह अपने अधिकारों-विशेषकर मत देने और अपनी बात रखने के अधिकार-की लड़ाई भी थी। यही वह बीज…
