ज़ेन जी: एक पीढ़ी का प्रश्न या व्यवस्था के लिए चेतावनी?

अधिकार, आक्रोश और लोकतंत्र के बदलते चेहरे पर एक चिंतन लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना©️ भारत एक युवा देश है। यह बात हम दशकों से सुनते आए हैं। लेकिन हर पीढ़ी अपने समय के प्रश्नों के साथ सामने आती है। कभी आज़ादी की लड़ाई लड़ने वाली पीढ़ी थी, कभी आपातकाल का विरोध करने वाली,…

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कॉकरोच से क्रांति तक: क्या इतिहास स्वयं को दोहरा रहा है?

अन्ना आंदोलन 2011 बनाम कॉकरोच जनता पार्टी आंदोलन 2026 का तुलनात्मक विश्लेषण लेखक: एम. बी. बलवंत सिंह खन्ना भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में कुछ आंदोलन ऐसे होते हैं जो केवल सरकार के खिलाफ विरोध नहीं होते, बल्कि व्यवस्था और जनता के बीच बढ़ती दूरी का प्रतीक बन जाते हैं। वर्ष 2011 का अन्ना हज़ारे आंदोलन…

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जब युवा सड़क पर हो और सत्ता सफाई में: आखिर सुन कौन रहा है?

लेखक: एम. बी. बलवंत सिंह खन्ना किसी भी राष्ट्र की वास्तविक स्थिति जाननी हो तो उसके शेयर बाजार, ऊँची इमारतों या चुनावी भाषणों को मत देखिए। उसके युवाओं की आँखों में झाँकिए। यदि वहाँ उम्मीद दिखाई दे तो समझिए राष्ट्र सही दिशा में है, और यदि वहाँ गुस्सा, निराशा तथा अविश्वास दिखाई दे तो समझिए…

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“त्याग सिर्फ जनता करे, तो सत्ता किसलिए?”

लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना भारत एक लोकतांत्रिक और कल्याणकारी राष्ट्र है। यहाँ सरकार केवल शासन करने के लिए नहीं चुनी जाती, बल्कि संकट के समय जनता की ढाल बनने के लिए चुनी जाती है। लेकिन हर बड़े संकट, हर आर्थिक दबाव और हर राष्ट्रीय चुनौती के समय एक सवाल बार-बार सिर उठाता हैक्या…

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“लोकतंत्र की दिशा: मताधिकार से मुद्दों तक”

लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना भारत का लोकतंत्र एक दिन में नहीं बना-यह सदियों के संघर्ष, असंख्य बलिदानों और जनचेतना के जागरण का परिणाम है। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम केवल अंग्रेज़ों से मुक्ति की लड़ाई नहीं थी, बल्कि यह अपने अधिकारों-विशेषकर मत देने और अपनी बात रखने के अधिकार-की लड़ाई भी थी। यही वह बीज…

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हार और जीत के बीच का भाव

लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना मैदान के एक कोने में शोर था।तालियों की गूंज, मुस्कुराते चेहरे, कंधों पर उठाए जा रहे खिलाड़ी, और हवा में उड़ती खुशियाँ।लग रहा था जैसे उस पल समय भी ठहर कर उस जीत को देखना चाहता हो। और उसी मैदान के दूसरे कोने में…एक अजीब सा सन्नाटा था। वह…

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“चुप्पी का शोर”

लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना हम जिस दुनिया में जी रहे हैं, वह पहले कभी इतनी भरी हुई नहीं थी।हाथों में मोबाइल, कानों में ईयरफोन, आँखों में स्क्रीन और मन में अनगिनत सूचनाएँ।हर पल कुछ न कुछ चल रहा है-मैसेज, कॉल, नोटिफिकेशन, खबरें, रीलें, मीम्स। लेकिन इसी शोर के बीच एक चीज़ सबसे ज़्यादा…

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संबंध, सवाल, सम्मान और रुचि

(नव वर्ष की पहली सोच, पहली संवेदना)लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना नव वर्ष केवल कैलेंडर की तारीख बदलने का नाम नहीं होता, यह अपने भीतर झाँकने, अपने संबंधों को टटोलने और जीवन के रास्तों को नए अर्थ देने का अवसर भी होता है। ऐसे समय में जब दुनिया तेज़ी से आगे बढ़ रही है,…

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‘कतार’

“कतार- व्यवस्था, विवशता और हमारी सोच का आईना” लेखक : एम बी बलवंत सिंह खन्ना कतार- एक साधारण सा शब्द, लेकिन हमारे सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक जीवन का सबसे बड़ा प्रतीक। कतार कभी व्यवस्था का संकेत देती है, तो कभी अव्यवस्था का प्रमाण बन जाती है। कहीं यह अनुशासन सिखाती है, तो कहीं यह हमारी…

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“छत्तीसगढ़िया वाद: सादगी को कमजोरी मत समझिए”

लेखक: एम बलवंत सिंह खन्ना सादर नमन उस धरती को, जिसने सत्य, संतुलन और संवाद को हमेशा जीवन का मूल माना- छत्तीसगढ़।यह वही भूमि है जहाँ संत बाबा गुरु घासीदास जी ने जन्म लेकर मनखे-मनखे एक समान का संदेश दिया; जहाँ शहीद वीर नारायण सिंह ने अत्याचार के विरुद्ध आवाज़ उठाई; जहाँ डॉक्टर खुबचंद बघेल…

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