“क्लिक से रिश्ता, दस्तख़त से जुदाई”

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(एक कहानी, जो हज़ारों के आईने में खुद को देखती है)

रुचि कभी ज़्यादा बोलने वाली नहीं थी। लेकिन उसकी चुप्पी में वो सब था, जो शब्द कभी कह नहीं पाते। माँ के मस्तिष्क में उभरते हुए सफ़ेद बाल और पिताजी की झुकी हुई पीठ के बीच, उसने अपने सपनों को तह करके अलमारी के किसी कोने में रख दिया।

हर दिन घर के आँगन में सूरज उगता था, लेकिन उसके जीवन में सिर्फ रोशनी नहीं, ज़िम्मेदारियों की तपिश आती थी।

पर एक कोना था उसकी दुनिया में, जहाँ सब कुछ थोड़ा रंगीन लगता—इंस्टाग्राम।
वहाँ उसकी कविताएँ थीं, छोटी-छोटी खुशियाँ थीं, एक अधूरी परछाई थी… और वहीं मिला उसे विक्रांत।

एक “रील” से शुरू हुई बात, “शब्दों की चोरी” पर हुई मुस्कान, और फिर रोज़ रातों की डीएम चैट्स… दो अकेलेपन जैसे एक-दूसरे की बाँहों में सुकून ढूँढ रहे हों।

पहली वीडियो कॉल में वो लम्हा कैद था, जब रुचि ने उसकी आँखों में देखा और सोचा—”शायद यही है मेरा अपना सा कोई।”

चार महीनों में दोनों ने पूरी उम्र साथ बिताने के ख्वाब देख लिए। माँ से झूठ कहा, और कोर्ट के बाहर दस्तख़त करते हुए दिल के किसी कोने में हल्की सी हिचकी उठी—”क्या सच में ये सही है?”
पर वो सोच चुकी थी… और अब रुचि शर्मा नहीं, रुचि सिंह थी।

नई ज़िंदगी, नए शहर की खुशबू, दो कप चाय और एक साझा सपना। वो हर छोटी बात में बड़ी मुस्कान ढूँढते थे। इंस्टा स्टोरी में दिल के इमोजी थे, कैप्शन में ‘Forever and ever…’

फिर एक दिन, ज़िंदगी ने एक नई करवट ली—रुचि माँ बनने वाली थी।
विक्रांत ने उसे गले लगाकर कहा—”हम कर लेंगे सब… साथ में।”

बेटी हुई। साक्षी।
एक नन्हा जीवन, जिसने घर में एक नई धड़कन ला दी।
लेकिन बच्चों के आने से सिर्फ लोरी नहीं आती—आती है थकान, आती है खामोशियाँ, आती हैं अधूरी रातें।

अब रुचि की आँखों में कविता नहीं, काले घेरे थे।
विक्रांत की बातों में अब प्यार नहीं, झुंझलाहट थी।
एक-दूसरे को ‘कहने’ से पहले, अब ‘समझाने’ की ज़रूरत पड़ती थी… जो हो नहीं पा रही थी।

पहले हल्की नोकझोंक थी, फिर बहसें… फिर वो आईं खामोशियाँ, जिनका वज़न सबसे भारी होता है।

फिर एक दिन कोर्ट के बाहर, उसी बेंच पर बैठे थे जहाँ कभी साथ जीने की कसम ली थी।
लेकिन अब वहाँ सिर्फ सन्नाटा था।

“कूलिंग पीरियड” मिला।
छह महीने।
छह ठंडी साँसों वाले महीने।

दोनों ने फिर कोशिश की—बेटी को स्कूल भेजा, रात में दाल-चावल साथ में खाया।
लेकिन खाने में स्वाद नहीं था, और बातों में अपनापन नहीं।
रात को एक ही छत के नीचे, दो मोबाइल की रौशनी थी… और उनके बीच चुप्पी का अंधेरा।

फिर वो दिन आया—दस्तख़त वाला दिन।
कोई नहीं रोया, कोई कुछ नहीं बोला।
पर दोनों की उँगलियाँ काँप रही थीं, और काग़ज़ पर स्याही से ज़्यादा एक रिश्ता बह रहा था।

अब विक्रांत हर महीने पैसे भेजता है।
और रुचि… हर बार बेटी की तस्वीरें।
वो तस्वीरें, जिनमें साक्षी हँसती है, लेकिन अब वो हँसी दो लोगों को जोड़ने की जगह, उनकी दूरी का गवाह बन गई है।

कभी-कभी रात को, जब रुचि बेटी को लोरी गाते हुए थपकती है, तो आँसू तकिए में बह जाते हैं।
वो सोचती है—
“क्या मेरी बेटी अधूरी रहेगी?”
“क्या मैं अधूरी रह गई?”

विक्रांत भी ऑफिस से लौटते हुए कार में रुक कर वो पुराना वीडियो देखता है, जहाँ साक्षी कहती है—“पापा आओ…”
और उसके भीतर कुछ चुभता है।
वो जानता है, अब वो बस ‘रविवार’ का पापा है।

साक्षी जब दौड़कर उसके गले लगती है, वो कहता है—“खुश हो न?”
बच्ची सिर हिलाती है… लेकिन उसकी आँखें चुप रहती हैं।

यही है आज के रिश्तों की कहानी।

हमारे प्यार अब “सेंड रिक्वेस्ट” से शुरू होते हैं,
“लाइक्स” में बढ़ते हैं,
और फिर कभी “ब्लॉक” तो कभी “साइन” से ख़त्म हो जाते हैं।

फिल्टर से चेहरे चमकते हैं,
पर रिश्ते, बिना फिल्टर ही सबसे सुंदर होते हैं—
थोड़े धुँधले, पर सच्चे।

रुचि और विक्रांत की कहानी कोई अनोखी नहीं है।
ये हर उस प्रोफ़ाइल की कहानी है, जहाँ दो हँसते हुए चेहरों की पीछे एक चुप सी उदासी होती है।

और साक्षी…
वो हर उस बच्चे की परछाईं है,
जो अपने माँ-बाप से एक ही सवाल करना चाहता है—
“आप दोनों साथ क्यों नहीं रह सकते?

हम रिश्तों में जल्दबाज़ हो गए हैं—
प्यार करने में भी, और टूट जाने में भी।

तो अगली बार, जब कोई “Hi” के साथ दिल भेजे,
तो थोड़ी देर रुकिए…
सोचिए…
क्योंकि एक क्लिक से बना रिश्ता,
कभी-कभी पूरी ज़िंदगी की तन्हाई बन जाता है।


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