लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना
भारत एक लोकतांत्रिक और कल्याणकारी राष्ट्र है। यहाँ सरकार केवल शासन करने के लिए नहीं चुनी जाती, बल्कि संकट के समय जनता की ढाल बनने के लिए चुनी जाती है। लेकिन हर बड़े संकट, हर आर्थिक दबाव और हर राष्ट्रीय चुनौती के समय एक सवाल बार-बार सिर उठाता है
क्या बलिदान देने की जिम्मेदारी केवल आम नागरिक की ही है?
हाल ही में देश के प्रधानमंत्री जी के द्वारा देशवासियों से कुछ अपीलें की गईं-कम तेल उपयोग करने की सलाह, पेट्रोल-डीजल की खपत घटाने का आग्रह, “वर्क फ्रॉम होम” को प्राथमिकता देने की बात, विदेशी यात्राओं से बचने की अपील और कई प्रकार की सावधानी बरतने का संदेश।
एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में इन बातों को सुनना और समझना आवश्यक है। कोई भी संवेदनशील व्यक्ति यह नहीं कहेगा कि देशहित में संयम या जिम्मेदारी गलत है। लेकिन सवाल अपीलों से नहीं, उनकी टाइमिंग और जिम्मेदारियों के संतुलन से खड़ा होता है।

अगर देश के सामने कोई गंभीर आर्थिक, वैश्विक या आपूर्ति संकट मंडरा रहा था, तो क्या उसकी तैयारी केवल जनता के लिए थी?
क्या सरकार और राजनीतिक दलों की कोई समान जिम्मेदारी नहीं बनती?
विडंबना देखिए-कुछ ही समय पहले तक देश में चुनावी रैलियों का शोर था। करोड़ों रुपये खर्च किए गए। विशाल मंच बने। हेलीकॉप्टर उड़े। प्रचार-प्रसार हुआ। मुफ्त योजनाओं और वादों की बाढ़ आई। ऐसा कहीं नहीं लगा कि देश किसी संभावित संकट की ओर बढ़ रहा है।
लेकिन जैसे ही चुनाव समाप्त हुए, अचानक त्याग, बचत और संयम की भाषा शुरू हो गई।
यही वह बिंदु है जहाँ लोकतंत्र में सवाल पैदा होते हैं।
अगर परिस्थिति इतनी संवेदनशील थी कि जनता को अपने दैनिक जीवन में कटौती करने की सलाह देनी पड़ी, तो फिर चुनावी तामझाम पर नियंत्रण क्यों नहीं किया गया?
क्या लोकतंत्र का अर्थ केवल चुनाव जीतना रह गया है?
क्या राजनीतिक दल अब जनसेवा से अधिक चुनाव प्रबंधन की मशीनें बनते जा रहे हैं?
आम नागरिक पहले ही महँगाई, बेरोजगारी, शिक्षा और स्वास्थ्य के बढ़ते खर्च से जूझ रहा है।
एक तरफ उसे कहा जाता है-
अगर गैस महंगी है तो कम उपयोग करो,
अगर पेट्रोल महंगा है तो सार्वजनिक परिवहन अपनाओ,
अगर बिजली संकट है तो बचत करो,
अगर पानी की समस्या है तो निजी व्यवस्था करो।
धीरे-धीरे नागरिक यह महसूस करने लगा है कि सुविधाएँ देना अब सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि नागरिक की “एडजस्टमेंट क्षमता” बनती जा रही है।
सबसे बड़ा प्रश्न यही है-
अगर हर समस्या का समाधान जनता को खुद ही ढूँढना है, तो फिर सरकार की भूमिका क्या रह जाती है?
लोकतंत्र में जनता टैक्स केवल सड़कों या भवनों के लिए नहीं देती। वह टैक्स देती है ताकि संकट के समय शासन उसके साथ खड़ा दिखाई दे। ताकि नीतियाँ दूरदर्शी हों। ताकि तैयारी समय रहते हो। ताकि नेतृत्व केवल भाषणों में नहीं, व्यवहारिक निर्णयों में भी दिखाई दे।
कोविड काल ने देश को बहुत कुछ सिखाया था। लोगों ने अपने प्रियजन खोए, नौकरियाँ गंवाईं, व्यापार टूटे। उस दौर में “जनता कर्फ्यू”, “थाली”, “मोमबत्ती” जैसे प्रतीकात्मक प्रयासों के साथ-साथ स्वास्थ्य व्यवस्था की वास्तविक सीमाएँ भी सामने आईं। इसलिए जब फिर किसी संभावित संकट की आहट की बात होती है, तो नागरिक स्वाभाविक रूप से पूछता है-
क्या इस बार तैयारी केवल भाषणों तक सीमित रहेगी या व्यवस्था भी मजबूत होगी?
कटाक्ष यह नहीं कि जनता को बचत क्यों करनी चाहिए।
कटाक्ष यह है कि त्याग का नैतिक बोझ हमेशा नीचे वाले वर्ग पर ही क्यों डाला जाता है?
क्या कभी राजनीतिक दलों से कहा जाएगा कि वे चुनावों में खर्च सीमित करें?
क्या कभी नेताओं के काफिलों, विज्ञापनों और अत्यधिक सरकारी प्रचार पर नियंत्रण की बात होगी?
क्या कभी सत्ता खुद अपने विशेषाधिकारों में कटौती करेगी?
सच्चा नेतृत्व वही होता है जो जनता से पहले खुद उदाहरण प्रस्तुत करे।
अगर देश को ईंधन बचाना है, तो शुरुआत सरकारी तामझाम से भी होनी चाहिए।
अगर खर्च घटाना है, तो सरकारी प्रचार और राजनीतिक आयोजनों पर भी अंकुश दिखना चाहिए।
अगर संकट आने वाला है, तो उसकी तैयारी अस्पतालों, रोजगार, सार्वजनिक परिवहन और खाद्य सुरक्षा में भी दिखाई देनी चाहिए।
लोकतंत्र केवल नागरिकों के कर्तव्यों से नहीं चलता, सत्ता की जवाबदेही से भी चलता है।

आज जरूरत इस बात की है कि जनता भावनाओं से ऊपर उठकर प्रश्न पूछे। क्योंकि सवाल पूछना लोकतंत्र विरोध नहीं-लोकतंत्र की आत्मा है।
और शायद यही सबसे बड़ा राष्ट्रधर्म भी है।
क्योंकि-
जब हर संकट में केवल जनता से ही त्याग माँगा जाए, तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि सत्ता आखिर किसके लिए है-जनता के लिए, या केवल चुनावों के लिए?

प्रश्न समसामयिक है. अभी-अभी पांच राज्यों के चुनाव सम्पन्न हुए हैं किन्तु प्रधान मंत्री जी को यह अपील पहले क्यों नहीं करनी चाहिए थी? यह निश्चित ही विचारणीय प्रश्न है. ऐसा करने से चुनाव परिणाम प्रभावित होता! आपका शीर्षक निश्चित ही प्रासंगिक है. संपूर्ण विचार सार्थक है.