कॉकरोच से क्रांति तक: क्या इतिहास स्वयं को दोहरा रहा है?

अन्ना आंदोलन 2011 बनाम कॉकरोच जनता पार्टी आंदोलन 2026 का तुलनात्मक विश्लेषण लेखक: एम. बी. बलवंत सिंह खन्ना भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में कुछ आंदोलन ऐसे होते हैं जो केवल सरकार के खिलाफ विरोध नहीं होते, बल्कि व्यवस्था और जनता के बीच बढ़ती दूरी का प्रतीक बन जाते हैं। वर्ष 2011 का अन्ना हज़ारे आंदोलन…

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चेहरा नहीं, भरोसा याद रहता है

डिजिटल युग के अनकहे रिश्तों पर एक चिंतन लेखक: एम. बी. बलवंत सिंह खन्ना मनुष्य के जीवन में कुछ रिश्ते जन्म से मिलते हैं, कुछ समय के साथ बनते हैं और कुछ ऐसे भी होते हैं जिनका न कोई नाम होता है, न कोई परिचय और न ही कभी आमने-सामने मुलाकात। फिर भी वे हमारे…

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आज़ादी बनाम असुरक्षा: सवाल लड़कियों की स्वतंत्रता पर नहीं, समाज की मानसिकता पर है

लेखक: एम. बी. बलवंत सिंह खन्ना भारत जैसे सामाजिक ढांचे वाले देश में किसी लड़की का घर की चौखट पार कर अपने दम पर खड़ा होना आज भी आसान नहीं है। आज भी लाखों लड़कियाँ ऐसी हैं जिन्हें पढ़ाई, नौकरी, करियर या अपने निर्णय लेने की आज़ादी बड़ी मुश्किल से मिलती है। कई घरों में…

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जब युवा सड़क पर हो और सत्ता सफाई में: आखिर सुन कौन रहा है?

लेखक: एम. बी. बलवंत सिंह खन्ना किसी भी राष्ट्र की वास्तविक स्थिति जाननी हो तो उसके शेयर बाजार, ऊँची इमारतों या चुनावी भाषणों को मत देखिए। उसके युवाओं की आँखों में झाँकिए। यदि वहाँ उम्मीद दिखाई दे तो समझिए राष्ट्र सही दिशा में है, और यदि वहाँ गुस्सा, निराशा तथा अविश्वास दिखाई दे तो समझिए…

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जब लालच रिश्तों से बड़ा हो जाता है

लेखक: एम. बी. बलवंत सिंह खन्ना किसी भी सभ्य समाज की पहचान उसकी इमारतों, सड़कों या आर्थिक प्रगति से नहीं होती। उसकी पहचान इस बात से होती है कि वह अपनी बेटियों के साथ कैसा व्यवहार करता है। जिस समाज में बेटियाँ सम्मान और सुरक्षा के साथ जीती हैं, वही समाज वास्तव में सभ्य कहलाने…

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“त्याग सिर्फ जनता करे, तो सत्ता किसलिए?”

लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना भारत एक लोकतांत्रिक और कल्याणकारी राष्ट्र है। यहाँ सरकार केवल शासन करने के लिए नहीं चुनी जाती, बल्कि संकट के समय जनता की ढाल बनने के लिए चुनी जाती है। लेकिन हर बड़े संकट, हर आर्थिक दबाव और हर राष्ट्रीय चुनौती के समय एक सवाल बार-बार सिर उठाता हैक्या…

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“लोकतंत्र की दिशा: मताधिकार से मुद्दों तक”

लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना भारत का लोकतंत्र एक दिन में नहीं बना-यह सदियों के संघर्ष, असंख्य बलिदानों और जनचेतना के जागरण का परिणाम है। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम केवल अंग्रेज़ों से मुक्ति की लड़ाई नहीं थी, बल्कि यह अपने अधिकारों-विशेषकर मत देने और अपनी बात रखने के अधिकार-की लड़ाई भी थी। यही वह बीज…

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“शिक्षा का बदलता चेहरा-अधिकार, अवसर या आर्थिक विभाजन?”

लेखक- एम बी बलवंत सिंह खन्ना ©️ पिछले दो सोमवारों की व्यस्तता के बाद जब कलम फिर से हाथ में आई, तो मन सीधे उस विषय की ओर गया जो हर घर, हर परिवार और हर भविष्य से जुड़ा है-शिक्षा।अप्रैल का महीना है। स्कूलों में नए दाखिले शुरू हो चुके हैं। हर माता-पिता अपने बच्चे…

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“टैक्स के बदले तसल्ली?-या अधिकारों का व्यवस्थित क्षरण”

लेखक : एम बी बलवंत सिंह खन्ना दुनिया एक अस्थिर दौर से गुजर रही है। कहीं युद्ध हैं, कहीं आर्थिक अनिश्चितता, कहीं संसाधनों पर संघर्ष। इन वैश्विक हलचलों का असर सीमाओं के भीतर भी महसूस किया जा रहा है-महँगाई बढ़ती है, आपूर्ति प्रभावित होती है, और आम आदमी की ज़िंदगी पर दबाव बढ़ता है।लेकिन सवाल…

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“हुक्का-पानी से व्हाट्सऐप तक -समाज से दूरी की बदलती कहानी”

लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना कल्पना कीजिए…अगर आपको अपने ही गाँव से, अपने ही समाज से बेदखल कर दिया जाए।लोग आपसे बात करना बंद कर दें, आपके घर का हुक्का–पानी बंद कर दिया जाए, कोई लेन-देन न रखे, न सुख-दुख में कोई साथ खड़ा हो-तो आप क्या करेंगे? यह केवल एक सामाजिक दंड नहीं…

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