Share

“कतार- व्यवस्था, विवशता और हमारी सोच का आईना”

लेखक : एम बी बलवंत सिंह खन्ना

कतार- एक साधारण सा शब्द, लेकिन हमारे सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक जीवन का सबसे बड़ा प्रतीक। कतार कभी व्यवस्था का संकेत देती है, तो कभी अव्यवस्था का प्रमाण बन जाती है। कहीं यह अनुशासन सिखाती है, तो कहीं यह हमारी नीतिगत विफलताओं और सामाजिक असंतुलन को उजागर करती है। आज का मनुष्य जन्म से मृत्यु तक किसी न किसी कतार में खड़ा है-अंतर बस इतना है कि कुछ कतारें आशा देती हैं और कुछ जीवन भर का इंतज़ार।

कतार कई प्रकार की होती है। एक वह, जो स्वैच्छिक होती है-जैसे हवाई अड्डे पर बोर्डिंग के लिए लाइन, टोल प्लाज़ा पर वाहनों की कतार, या परीक्षा केंद्र के बाहर लगी अनुशासित पंक्ति। ये कतारें हमें सिखाती हैं कि सीमित संसाधनों के बीच न्यायपूर्ण बंटवारा कैसे किया जाए। दूसरी कतार वह है, जो मजबूरी की उपज होती है-अस्पताल में इलाज के लिए, सरकारी दफ्तर में प्रमाण पत्र के लिए, राशन दुकान पर अनाज के लिए, पानी के नल पर एक बाल्टी भरने के लिए। यह कतार हमें याद दिलाती है कि कल्याणकारी राज्य होने के बावजूद बुनियादी सुविधाएँ भी सबको सहज रूप से उपलब्ध नहीं हैं।

    आज कुछ युवा भी एक अदृश्य कतार में खड़ा है-ऐसी कतार जो किसी दफ़्तर, पोर्टल या चौराहे पर नहीं दिखती, पर दिल और दिमाग़ के भीतर रोज़ लंबी होती जाती है। कोई सच्चे प्रेम के आने का इंतज़ार कर रहा है, कोई अपने इज़हार के बाद सामने से आने वाले एक “हाँ” या “ना” के जवाब पर अटका हुआ है, तो कोई विवाह जैसे बड़े निर्णय के लिए एक सही साथी की तलाश में समय की लाइन में खड़ा है। सोशल मीडिया की तेज़ रफ़्तार, तुलना की संस्कृति और विकल्पों की भीड़ ने इस कतार को और उलझा दिया है-जहाँ धैर्य कम होता जा रहा है, पर उम्मीद अब भी ज़िंदा है। यह भावनात्मक कतार सिखाती है कि आज का युवा सिर्फ़ रोज़गार या अवसर के लिए नहीं, बल्कि भरोसे, स्थिरता और अर्थपूर्ण संबंधों के लिए भी प्रतीक्षा कर रहा है-और शायद यही इंतज़ार उसे भीतर से अधिक संवेदनशील और परिपक्व बना रहा है। 

    इसके अलावा विवाह के लिए सही रिश्ते की कतार कई बार सबसे अधिक कष्टदायक साबित होती है। मनचाहा जीवनसाथी पाने की चाह में व्यक्ति बरसों तक प्रतीक्षा करता रहता है-कभी कुंडली, कभी आर्थिक स्थिति, कभी सामाजिक मान्यताएँ तो कभी “परफेक्ट मैच” की तलाश उसे आगे बढ़ने से रोक देती है। देखते-देखते उम्र बढ़ जाती है और विकल्प सिमटने लगते हैं, फिर एक ऐसा मोड़ आता है जहाँ मनपसंद के साथ विवाह का सपना धुंधला पड़ने लगता है। इसी लंबी और थकाऊ कतार में खड़े-खड़े कई युवा निराश हो जाते हैं और अंततः अकेले जीवन जीने का निर्णय ले लेते हैं-इच्छा से कम, परिस्थिति से अधिक। यह कतार केवल इंतज़ार की नहीं, बल्कि सामाजिक दबाव, समय के डर और अधूरी उम्मीदों की कतार है, जो आज के युवाओं के मन में गहरी चुप्पी और अनकहा दर्द छोड़ जाती है।

    विकासशील और कल्याणकारी देश का दावा करने वाले भारत में कतारें जीवनशैली का हिस्सा बन चुकी हैं। सरकारी अस्पतालों में सुबह चार बजे से लाइन लगती है, ताकि दोपहर तक डॉक्टर को दिखाने का नंबर मिल सके। रेलवे टिकट के लिए लंबी कतारें कभी खिड़की पर, कभी वेटिंग लिस्ट में बदल जाती हैं। राशन दुकान की लाइन बताती है कि अनाज सिर्फ़ पेट नहीं, बल्कि धैर्य भी मांगता है। पानी के नल की कतारें उन इलाकों की सच्चाई बयान करती हैं, जहाँ आज़ादी के दशकों बाद भी जल-सुरक्षा सपना बनी हुई है। नौकरी के लिए लगी कतारें- ये तो सबसे लंबी और सबसे पीड़ादायक हैं, जहाँ लाखों युवा एक ही विज्ञापन के पीछे दौड़ते हैं, वर्षों तक परीक्षा देते हैं और अंत में निराशा हाथ लगती है।

यहीं से एक गंभीर सवाल उठता है-इतनी विशाल जनसंख्या होने के बावजूद बेरोज़गारी इतनी अधिक क्यों है? और जब बेरोज़गारी है, तो हर क्षेत्र में कुशल लोगों की कमी क्यों दिखाई देती है? यह विरोधाभास ही आज की कतारों की असली कहानी है। युवा “रोज़गार, रोज़गार” चिल्ला रहा है, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि अगर आप अपनी गाड़ी सर्विसिंग के लिए ले जाएँ, तो तुरंत समय नहीं मिलेगा-क्योंकि कारीगर नहीं हैं। सैलून में बाल कटवाने जाएँ, तो लाइन लगेगी-क्योंकि नाई कम हैं और ग्राहक ज़्यादा। हलवाई, ड्राइवर, हाउस हेल्प, कामवाली बाई, फ़ोटोग्राफ़र, वीडियो एडिटर, ग्राफ़िक डिज़ाइनर, मेकअप आर्टिस्ट-हर क्षेत्र में कुशल लोगों की भारी माँग है।

यह कतारों का दूसरा चेहरा है-जहाँ काम है, वहाँ काम करने वाले नहीं; और जहाँ काम करने वाले हैं, वहाँ काम नहीं। इसका मूल कारण केवल सिस्टम नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक सोच भी है। हमारे युवाओं का एक बड़ा वर्ग ऐसा है, जो अपने “उसूलों” और “पसंद” के नाम पर काम चुनता है। वे कहते हैं-काम चाहिए, लेकिन अपनी शर्तों पर; रोज़गार चाहिए, लेकिन स्किल सीखने की मेहनत नहीं। कुछ लोग वर्षों तक बेरोज़गार रहना स्वीकार कर लेते हैं, लेकिन किसी तकनीकी या श्रम-आधारित कौशल को अपनाने से कतराते हैं। नतीजा यह होता है कि नौकरी की कतार लंबी होती जाती है और कुशल कर्मियों की कतार छोटी रह जाती है।

कतार का एक और आयाम ट्रैफ़िक में दिखता है। सड़कों पर लगी लंबी लाइनें अक्सर सिस्टम से ज़्यादा नागरिकों के असंवेदनशील व्यवहार की देन होती हैं। जहाँ नियम कहता है कि गाड़ियाँ एक लेन में चलें, वहीं लोग विपरीत दिशा से घुसकर व्यवस्था को और बिगाड़ देते हैं। हर व्यक्ति अपनी जल्दी को सबसे महत्वपूर्ण मानता है और यही सोच सामूहिक जाम का कारण बनती है। ट्रैफ़िक की कतार हमें बताती है कि कानून केवल किताबों में नहीं, नागरिकों के व्यवहार में भी लागू होना चाहिए।

कतार के कुछ लाभ भी हैं। यह हमें धैर्य सिखाती है, समानता का भाव देती है और संसाधनों के न्यायपूर्ण वितरण का माध्यम बनती है। अगर कतार न हो, तो ताक़तवर पहले और कमज़ोर पीछे रह जाएगा। कतार लोकतंत्र की एक छोटी इकाई है-जहाँ हर व्यक्ति अपनी बारी का इंतज़ार करता है। लेकिन जब कतार स्थायी हो जाए, जब इंतज़ार ही जीवन बन जाए, तब यह व्यवस्था नहीं, बल्कि शोषण का रूप ले लेती है।

इसके दुष्परिणाम गहरे हैं। लंबी कतारें समय की बर्बादी हैं, मानसिक थकान बढ़ाती हैं और लोगों में आक्रोश पैदा करती हैं। अस्पताल की कतार में खड़ा बीमार व्यक्ति सिर्फ़ इलाज का इंतज़ार नहीं कर रहा होता, वह सिस्टम से लड़ रहा होता है। नौकरी की कतार में खड़ा युवा सिर्फ़ अवसर नहीं, बल्कि अपने आत्मसम्मान को बचाने की कोशिश कर रहा होता है। पानी की कतार में खड़ी महिला सिर्फ़ बाल्टी नहीं भर रही होती, वह अपने जीवन का कीमती समय दे रही होती है।

एक कल्याणकारी राज्य में कतारें अस्थायी होनी चाहिए, स्थायी नहीं। सरकार की जिम्मेदारी है कि वह सुविधाओं का विकेंद्रीकरण करे, सेवाओं को डिजिटल बनाए, और सबसे ज़रूरी-कौशल विकास को शिक्षा का केंद्र बनाए और इन सब को केवल फाइलों तक नहीं बल्कि धरातल पर क्रियान्वयन भी करवाए। वहीं समाज और व्यक्ति की जिम्मेदारी है कि वह श्रम को सम्मान दे, छोटे काम को छोटा न समझे और नियमों का पालन करे। जब तक हम स्किल को स्टेटस से नहीं, ज़रूरत से नहीं जोड़ेंगे, तब तक बेरोज़गारी की कतार लंबी ही रहेगी।

कतार हमें यह भी सिखाती है कि व्यवस्था केवल ऊपर से नहीं बनती, नीचे से भी बनती है। अगर नागरिक नियम तोड़ेंगे, तो कोई भी सिस्टम सफल नहीं होगा। अगर युवा स्किल से भागेंगे, तो डिग्रियाँ भी रोज़गार नहीं दे पाएँगी। और अगर सरकार ज़मीनी सच्चाई को समझे बिना योजनाएँ बनाएगी, तो कतारें कम होने के बजाय बढ़ती जाएँगी।

अंततः, कतार सिर्फ़ खड़े होने की जगह नहीं, सोचने का मौका भी है। यह हमें पूछने पर मजबूर करती है- क्या हम सही दिशा में खड़े हैं? क्या हम इंतज़ार ही करेंगे, या व्यवस्था बदलने की पहल भी करेंगे? एक सभ्य समाज वही है, जहाँ कतारें हों-पर मजबूरी की नहीं, अनुशासन की; उम्मीद की हों, हताशा की नहीं। जब कतारें घटेंगी, तभी कहा जा सकेगा कि विकास सिर्फ़ आंकड़ों में नहीं, जीवन में भी उतरा है।


Share

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back To Top