(मातृ शक्ति से मानव शक्ति तक की यात्रा)
लेखक: एम. बी. बलवंत सिंह खन्ना
पिछले सप्ताह जब मेरी कहानी “ओ री पत्नी” प्रकाशित हुई, तो अनेक पाठकों ने सराहना की। सबने माना कि एक स्त्री, एक पत्नी, किस तरह अपने प्रेम, धैर्य और मौन से टूटते रिश्ते को सँभाल लेती है।
पर उसी प्रशंसा के बीच कुछ सवाल भी जन्मे
और वे सवाल साधारण नहीं थे, बल्कि समाज के भीतर दबे हुए सच को उजागर करने वाले थे।
एक पाठक ने पूछा
“क्या एक मजबूत पति,
भटकी हुई पत्नी को
बिना तोड़े, बिना शर्मिंदा किए,
चुपचाप घर वापस ले आएगा?”
यहीं से इस लेख की शुरुआत होती है।
स्त्री की भूल और समाज का कठोर चेहरा
अगर किसी पुरुष से चूक हो जाए, तो समाज कह देता है
“चलो, गलती हो गई… पुरुष है।”
लेकिन अगर वही चूक स्त्री से हो जाए, तो शब्द बदल जाते हैं
“चरित्र…”
“मर्यादा…”
“इज्जत…”
स्त्री की भूल केवल उसकी भूल नहीं मानी जाती,
उसे पूरे परिवार की इज्जत से जोड़ दिया जाता है।

यही समाज का सबसे बड़ा अन्याय है।
जब पति भटकता है, पत्नी उसे अपने आँचल में छिपा लेती है।
जब पत्नी भटकती है, समाज उसे सरेआम कठघरे में खड़ा कर देता है।
या पति भी पत्नी का सम्बल बन सकता है?
यह सवाल केवल पति का नहीं,
पूरे समाज की मानसिकता का है।
क्या हमारा पुरुष वर्ग इतना परिपक्व हुआ है कि वह कह सके
“गलती केवल पुरुषों से नहीं स्त्री से भी होती और उनका गलती भी गलती ही कहलाती है?
क्या वह पत्नी की मानसिक स्थिति को समझ पाएगा
कि शायद वह अकेली थी, उपेक्षित थी, भावनात्मक रूप से टूट चुकी थी?
क्या वह यह पूछेगा
“तुम क्यों भटकी?”
या सिर्फ यह कहेगा
“तुम भटके क्यों?”
मातृ शक्ति बनाम मानव शक्ति
हम भारत को मातृ शक्ति का देश कहते हैं।
हम देवी की पूजा करते हैं।
पर स्त्री जब इंसान बनकर गलती करती है,
तो हम उसे देवी मानना भूल जाते हैं।
मातृ शक्ति का अर्थ केवल सहन करना नहीं है।
मातृ शक्ति का अर्थ है
समझना, सुधारना, संभालना।
और यही अधिकार पुरुष को भी सीखना होगा।
रिश्तों की असली परीक्षा
रिश्ते तब नहीं परखे जाते जब सब ठीक हो,
रिश्ते तब परखे जाते हैं जब कोई टूट रहा हो।
अगर पति भटकता है और पत्नी उसे प्रेम से लौटा लाती है
तो यह उसकी महानता है।
पर अगर पत्नी भटकती है और पति उसे सम्मान से स्वीकार कर ले
तो यह समाज की महानता होगी।
क्या परिवार स्वीकार करेगा?
यह भी एक कठिन प्रश्न है
क्या घर उसे स्वीकार करेगा?
क्या बच्चे माँ को फिर से माँ कह पाएँगे?
क्या समाज फिर से स्त्री को रिश्तों की डोर से बांध सकेगा ?
हम भूल जाते हैं कि स्त्री भी
थकती है, टूटती है, भ्रमित होती है।
हम उसे देवी तो बना देते हैं,
पर इंसान बनने का अधिकार नहीं देते।
बदलाव की ज़रूरत
आज ज़रूरत इस बात की है कि
पति भी पत्नी का सम्बल बने।
पति भी कह सके
“तुम मेरी हो,
गलती के साथ भी।”
समाज को भी यह समझना और स्वीकारना होगा कि भूल एक स्त्री भी कर सकती है जिसे वापस सही राह पर लाना एक पुरुष का भी धर्म है।
अगर एक मजबूत पत्नी,
भटके हुए पति को घर लौटा सकती है
तो एक मजबूत पति भी,
भटकी हुई पत्नी को
सम्मान और समझ से
घर लौटा सकता है।
बस फर्क इतना है कि
पत्नी यह काम सदियों से करती आई है,
और पति को यह करना अभी सीखना है।
ओ री पत्नी…
तू सम्बल है।
ओ रे पति…
अब तू भी सम्बल बनना सीख।

क्योंकि
रिश्ते किसी एक की महानता से नहीं,
दोनों की समझदारी से चलते हैं।
और जिस दिन हमारा समाज यह मान लेगा कि
स्त्री की भूल भी इंसानी भूल है, अपराध नहीं,
उसी दिन सच में मातृ शक्ति का सम्मान होगा।

पुरुष भी स्वीकार तो करता है लेकिन अपवाद है। बाकी पुरुष या पति के स्वीकार करने से ज्यादा जरूरी है समाज का स्वीकार किया जाना । समाज हमेशा ऐसी स्त्री को संदेह की नजर से देखता रहता है। आपसी सहमति से लिया हुआ तलाक तक समाज पचा नहीं पाता है ये तो फिर भी…
Good
बहुत सुंदर भाई समाज के वर्तमान परिदृश्य मे सही कटाक्ष और सही सवाल हैं 💐💐