अधिकार, आक्रोश और लोकतंत्र के बदलते चेहरे पर एक चिंतन
लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना©️
भारत एक युवा देश है। यह बात हम दशकों से सुनते आए हैं। लेकिन हर पीढ़ी अपने समय के प्रश्नों के साथ सामने आती है। कभी आज़ादी की लड़ाई लड़ने वाली पीढ़ी थी, कभी आपातकाल का विरोध करने वाली, कभी मंडल-कमंडल की राजनीति देखने वाली। आज जिस पीढ़ी की चर्चा सबसे अधिक हो रही है, उसे दुनिया “जेन जी” (Generation Z) के नाम से जानती है।
यह वही पीढ़ी है जिसका जन्म इंटरनेट, स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के युग में हुआ। यह जानकारी के लिए पुस्तकालयों की मोहताज नहीं है। यह सवाल पूछने से डरती नहीं है और सत्ता, समाज तथा संस्थाओं को चुनौती देने का साहस रखती है। हाल के दिनों में जंतर-मंतर पर हुए छात्र आंदोलनों, विशेषकर नीट परीक्षा विवाद और शिक्षा व्यवस्था को लेकर हुए प्रदर्शनों में इस पीढ़ी की सक्रिय भागीदारी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत का युवा वर्ग अब केवल दर्शक नहीं रहना चाहता।

जेन जी आखिर है कौन?
जेन जी (Generation Z) वह पीढ़ी है जिसने दुनिया को किताबों से कम और स्क्रीन से अधिक जाना है। यह इंटरनेट, स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के युग में पली-बढ़ी पीढ़ी है, जिसके लिए सूचना कोई विशेषाधिकार नहीं बल्कि सामान्य जीवन का हिस्सा है। यह पीढ़ी सीमाओं से परे सोचती है, वैश्विक घटनाओं पर तुरंत प्रतिक्रिया देती है और हर विषय पर प्रश्न पूछने का साहस रखती है। जहाँ पिछली पीढ़ियाँ अनुभव से सीखती थीं, वहीं जेन जी जानकारी से राय बनाती है। यही कारण है कि इसके विचार अधिक स्वतंत्र, अपेक्षाएँ अधिक ऊँची और व्यवस्था से जवाबदेही की माँग अधिक मुखर दिखाई देती है।
लेकिन यही विशेषता कई बार टकराव का कारण भी बनती है। जहाँ पुरानी पीढ़ियाँ धैर्य, प्रतीक्षा और क्रमिक परिवर्तन में विश्वास रखती थीं, वहीं जेन जी तत्काल जवाब चाहती है। उसे लगता है कि यदि कोई समस्या दिखाई दे रही है तो उसका समाधान भी तुरंत होना चाहिए।
जंतर-मंतर का संदेश
नीट परीक्षा विवाद और उससे जुड़े विरोध प्रदर्शनों को केवल एक परीक्षा का मुद्दा मानना भूल होगी। इसके पीछे युवाओं की वह चिंता छिपी हुई है जो वर्षों की मेहनत के बाद भी व्यवस्था की निष्पक्षता को लेकर आश्वस्त नहीं है।
जब कोई छात्र लाखों प्रतियोगियों के बीच अपनी जगह बनाने के लिए दिन-रात मेहनत करता है और फिर परीक्षा प्रणाली पर ही प्रश्नचिह्न लग जाए, तो उसका आक्रोश स्वाभाविक है। जंतर-मंतर पर दिखाई देने वाली भीड़ केवल नाराजगी नहीं थी, बल्कि व्यवस्था से भरोसे की माँग भी थी।
यह आंदोलन इस बात का संकेत है कि आज का युवा केवल नौकरी नहीं चाहता, वह निष्पक्ष अवसर भी चाहता है।
सरकार के लिए संदेश
सरकारों को यह समझना होगा कि आज की पीढ़ी केवल भाषणों और नारों से संतुष्ट नहीं होती। वह आँकड़े देखती है, तथ्य खोजती है और प्रश्न पूछती है।
यदि युवाओं के मन में यह भावना घर कर जाए कि उनकी मेहनत का मूल्यांकन निष्पक्ष नहीं है, तो यह केवल शिक्षा व्यवस्था का संकट नहीं रहेगा, बल्कि लोकतांत्रिक विश्वास का संकट बन जाएगा।
सरकार के लिए लाभ यह है कि यदि वह युवाओं की शिकायतों को गंभीरता से सुने और पारदर्शिता बढ़ाए, तो वही युवा सबसे बड़ा समर्थक वर्ग बन सकता है। लेकिन यदि उनकी चिंताओं को केवल विरोध या शोर मानकर अनदेखा किया गया, तो यही वर्ग सबसे बड़ा आलोचक भी बन सकता है।
विपक्ष के लिए अवसर और चुनौती
विपक्ष को ऐसे आंदोलनों में अवसर दिखाई देता है। लोकतंत्र में यह स्वाभाविक भी है। लेकिन किसी भी छात्र आंदोलन को केवल राजनीतिक लाभ के चश्मे से देखना खतरनाक हो सकता है।
यदि विपक्ष युवाओं की वास्तविक समस्याओं को समझे और ठोस वैकल्पिक नीति प्रस्तुत करे, तो उसे लाभ मिलेगा। लेकिन यदि वह केवल सरकार विरोध तक सीमित रह गया, तो जेन जी जैसी जागरूक पीढ़ी उसे भी उतनी ही कठोरता से परखेगी।
आज का युवा केवल सत्ता से ही नहीं, विपक्ष से भी जवाब मांगता है।
क्या संस्कार और शिक्षा पर प्रश्न उठेंगे?
कई बार जब युवा सड़क पर उतरते हैं, नारे लगाते हैं या तीखा विरोध करते हैं, तब कुछ लोग तुरंत उनके संस्कारों और शिक्षा पर प्रश्न उठाने लगते हैं।
लेकिन यह प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि क्या हर विरोध असंस्कार का प्रतीक है?
लोकतंत्र में असहमति कोई अपराध नहीं है। अधिकारों के लिए आवाज उठाना भी असंस्कार नहीं है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब विरोध संवाद के स्थान पर घृणा का रूप लेने लगे या तर्क की जगह हिंसा ले ले।
संस्कार का अर्थ केवल चुप रहना नहीं होता। संस्कार का अर्थ यह भी है कि अपनी बात दृढ़ता से कहें, लेकिन दूसरों की बात सुनने का धैर्य भी रखें।
आगे का भारत कैसा होगा?
जेन जी आने वाले दशकों में भारत की नौकरशाही, राजनीति, मीडिया, उद्योग और शिक्षा संस्थानों का नेतृत्व करेगी। इसलिए यह केवल एक पीढ़ी नहीं, बल्कि भारत के भविष्य का प्रारूप है।
यदि इस पीढ़ी को सही दिशा, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, लोकतांत्रिक संवाद और नैतिक मूल्यों का आधार मिला, तो यह भारत को नई ऊँचाइयों तक ले जा सकती है।
लेकिन यदि इसके भीतर केवल आक्रोश, ध्रुवीकरण और अविश्वास बढ़ता गया, तो वही ऊर्जा समाज में अस्थिरता का कारण भी बन सकती है।
निष्कर्ष: डरने की नहीं, समझने की जरूरत
हर नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी को असहज करती है। इतिहास इसका साक्षी है। कभी युवाओं को उद्दंड कहा गया, कभी आदर्शवादी, कभी विद्रोही। लेकिन समाज आगे बढ़ा क्योंकि उसने नई पीढ़ी की ऊर्जा को समझने का प्रयास किया।
आज जेन जी भी उसी मोड़ पर खड़ी है।
प्रश्न यह नहीं है कि यह पीढ़ी बहुत अधिक सवाल क्यों पूछती है।
प्रश्न यह है कि क्या हमारी संस्थाएँ उन सवालों के उत्तर देने के लिए तैयार हैं?
यदि युवा अपने अधिकार, पारदर्शिता, निष्पक्षता और बेहतर भविष्य की माँग कर रहे हैं, तो इसे लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी जीवंतता का प्रमाण माना जाना चाहिए।
क्योंकि जिस दिन युवा सवाल पूछना छोड़ देंगे, उस दिन लोकतंत्र भी धीरे-धीरे अपनी आत्मा खो देगा। और जिस देश के युवा जागते हैं, वही देश भविष्य लिखता है।
