“जोड़े” -विवाह, परंपरा और नई पीढ़ी के बीच फँसा हुआ निर्णय

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लेखक : एम बी बलवंत सिंह खन्ना

छत्तीसगढ़ में विवाह केवल एक सामाजिक अनुबंध नहीं, बल्कि उत्सव है। विशेषकर गर्मियों के दिन-जब स्कूलों की परीक्षाएँ समाप्त हो जाती हैं, छुट्टियाँ लग जाती हैं और गाँव-शहर में रिश्तेदारों का आना-जाना आसान हो जाता है-तब शादियों का मौसम अपने चरम पर होता है। ढोल-नगाड़े, मंगलगीत, हल्दी-मेहंदी, बारात और विदाई… यह सब मिलकर विवाह को एक पारिवारिक पर्व बना देते हैं।

पर आज यह उत्सव केवल रस्मों तक सीमित नहीं रहा। उसके भीतर एक गहरी मानसिक और सामाजिक लड़ाई चल रही है-परंपरा बनाम आधुनिकता की, माता-पिता की सोच बनाम युवाओं की पसंद की, और समाज की अपेक्षाओं बनाम व्यक्तिगत स्वतंत्रता की।

आज का समय वैश्वीकरण का है। एक छोटा-सा मोबाइल फोन पूरी दुनिया को हथेली पर ला खड़ा करता है। सेकंडों में किसी व्यक्ति का इतिहास, शिक्षा, नौकरी, आदतें, पसंद-नापसंद, यहाँ तक कि उसका निजी जीवन भी खोजा जा सकता है। ऐसे दौर में “जोड़े” अब केवल कुंडली या खानदान देखकर तय नहीं होते, बल्कि फोटो, सोशल मीडिया प्रोफाइल, बातचीत, और व्यक्तिगत अनुभवों से तय होने लगे हैं।

पुराने समय में विवाह का अर्थ था-दो परिवारों का समझौता। वर-वधू अक्सर विवाह के बाद ही एक-दूसरे को ठीक से जानते थे। माता-पिता का निर्णय सर्वोपरि होता था। प्रेम विवाह अपवाद था, अरेंज मैरिज नियम।
आज तस्वीर उलट चुकी है। अब अरेंज मैरिज भी “सहमति आधारित अरेंज मैरिज” बन गई है। लड़का-लड़की पहले मिलते हैं, बात करते हैं, सोचते हैं, फिर विवाह तय होता है।

और इसके समानांतर एक और प्रवृत्ति उभरी है-लिव-इन रिलेशनशिप।
जहाँ विवाह से पहले ही पति-पत्नी जैसा जीवन जिया जाता है, बिना सामाजिक बंधन के, बिना पारिवारिक जिम्मेदारी के। यह आधुनिक सोच का प्रतीक है, पर पारंपरिक समाज के लिए यह अब भी असहज और प्रश्नों से भरा विषय है।

छत्तीसगढ़ जैसे सांस्कृतिक रूप से जड़ों से जुड़े प्रदेश में आज भी अधिकांश परिवार अरेंज मैरिज को प्राथमिकता देते हैं। यहाँ विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा का विषय होता है।
ऐसे में प्रश्न उठता है
आख़िर माता-पिता किन पैमानों पर अपने बेटे के लिए बहू और बेटी के लिए दामाद चुनते हैं?

एक पिता जब अपने दामाद की तलाश करता है, तो वह केवल एक युवक नहीं देखता, वह अपनी बेटी का भविष्य देखता है।
वह पूछता है
क्या यह लड़का मेरी बेटी को सम्मान देगा?
क्या यह उसे सुरक्षित रख पाएगा?
क्या इसके संस्कार हमारे जैसे हैं?
क्या इसका परिवार हमारी बेटी को अपनाएगा?
क्या इसकी नौकरी स्थिर है?
क्या इसकी आदतें ठीक हैं?

दामाद केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि भविष्य की पूरी संरचना बन जाता है।

उसी तरह, जब एक लड़का अपने लिए वधू चाहता है, तो उसके सामने भी चुनौतियाँ कम नहीं होतीं।
उसे सुंदरता चाहिए, पर केवल सुंदरता नहीं
संस्कार चाहिए, समझ चाहिए, तालमेल चाहिए।
पर साथ ही समाज की शर्तें भी जुड़ी होती हैं जाति, वर्ग, आर्थिक स्थिति, परिवार की छवि।

और यदि किसी लड़के को कोई लड़की पसंद आ भी जाए, तो सबसे कठिन परीक्षा तब होती है जब उसे अपने माता-पिता से यह कहना पड़ता है
“मुझे यही लड़की चाहिए।”

यह केवल प्रेम की बात नहीं होती, यह परंपरा से टकराव होता है।
यह साहस होता है।
यह डर भी होता है-कि कहीं माता-पिता की नाराज़गी रिश्ते को तोड़ न दे।

इस पूरी प्रक्रिया में सबसे बड़ा सवाल यह है
क्या लड़की की राय सच में मायने रखती है?

हम अक्सर कहते हैं कि आज लड़कियों को अधिकार मिला है, शिक्षा मिली है, स्वतंत्रता मिली है।
पर विवाह के समय क्या उसे यह कहने का पूरा अधिकार होता है
“माँ जी, बाबू जी, मुझे ऐसा पति चाहिए”?

अक्सर उसकी पसंद को “जिद” कहकर टाल दिया जाता है।
उसके डर को “नाटक” कहकर दबा दिया जाता है।
और उसकी चुप्पी को “सहमति” मान लिया जाता है।

यह चुप्पी ही आगे चलकर रिश्तों में दरार बनती है।

विवाह केवल सामाजिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि जीवन का सबसे बड़ा भावनात्मक निर्णय है।
यदि इसमें लड़की या लड़के की इच्छा शामिल नहीं होगी, तो वह रिश्ता केवल औपचारिकता बन जाएगा।

आज की पीढ़ी इसी द्वंद्व में जी रही है।
एक ओर परिवार की अपेक्षाएँ हैं,
दूसरी ओर व्यक्तिगत सपने।

युवा कहते हैं
हमें प्यार चाहिए, समझ चाहिए, दोस्ती चाहिए।
माता-पिता कहते हैं
हमें सुरक्षा चाहिए, स्थिरता चाहिए, समाज की स्वीकृति चाहिए।

दोनों सही हैं।
पर दोनों के बीच संवाद कम है।

विवाह अब केवल रस्म नहीं रहा, वह मानसिक समझ का प्रश्न बन गया है।
अगर माता-पिता केवल समाज देखकर निर्णय करेंगे और बच्चे केवल भावना देखकर, तो टकराव तय है।
समाधान बीच के रास्ते में है
जहाँ परंपरा भी बचे और स्वतंत्रता भी।

आज यह भी एक सच्चाई है कि सही साथी की तलाश में लोग उम्र निकाल देते हैं।
कभी परिवार को कोई पसंद नहीं आता,
कभी स्वयं को कोई उपयुक्त नहीं लगता।
और धीरे-धीरे विकल्प कम होते जाते हैं।

यह कतार पीड़ादायक है
सही जीवनसाथी के इंतज़ार की कतार।

कुछ युवा अंततः अकेले रहने का निर्णय कर लेते हैं।
क्योंकि वे समझौता नहीं करना चाहते।
और समाज उन्हें “अधूरा” कह देता है।

पर शायद यह भी एक नई सामाजिक सच्चाई है
हर व्यक्ति विवाह के लिए नहीं बना,
और हर विवाह खुशहाली की गारंटी नहीं।

आज ज़रूरत इस बात की है कि विवाह को फिर से संवाद का विषय बनाया जाए, आदेश का नहीं।
माता-पिता बच्चों से पूछें
तुम क्या चाहते हो?
और बच्चे माता-पिता से समझें
वे क्यों डरते हैं?

विवाह तब ही सफल होगा जब उसमें तीनों की सहमति हो
लड़के की, लड़की की और परिवार की।

“जोड़े” अब केवल तय नहीं किए जाने चाहिए, उन्हें समझा जाना चाहिए।
क्योंकि जोड़ा केवल दो शरीरों का नहीं, दो विचारों का मिलन है।
और जब विचार नहीं मिलते, तो रिश्ते बोझ बन जाते हैं।

छत्तीसगढ़ की मिट्टी ने हमें परिवार का मूल्य सिखाया है।
आधुनिक दुनिया हमें व्यक्ति का अधिकार सिखा रही है।
इन दोनों के बीच संतुलन ही भविष्य का रास्ता है।

विवाह अगर परंपरा और स्वतंत्रता के बीच पुल बन जाए,
तो वह उत्सव रहेगा।
वरना वह संघर्ष बन जाएगा।

आज ज़रूरत है कि हम विवाह को केवल रस्म न मानें,
बल्कि उसे समझ, सम्मान और सहमति का संस्कार बनाएं।

क्योंकि
सही जोड़ा वही है, जिसमें दोनों मन से जुड़े हों-सिर्फ समाज से नहीं।


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3 thoughts on ““जोड़े” -विवाह, परंपरा और नई पीढ़ी के बीच फँसा हुआ निर्णय

  1. वैवाहिक परंपरा को वर्तमान आधुनिक युग से समायोजन की कल्‍पना को आपने बहुत ही बेहतर ढंग से उल्‍लेखित किये हैं । बहुत ही सुन्‍दर लेख मेरे मित्र….

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