लेखक: एम बलवंत सिंह खन्ना
सावन का चौथा सोमवार था।
सुबह से ही शहर के शिवालयों में घंटियों की आवाज गूंज रही थी। कहीं कांवड़िए भगवा वस्त्रों में हर-हर महादेव का उद्घोष करते हुए आगे बढ़ रहे थे, तो कहीं महिलाएँ और युवतियाँ शिवलिंग पर जल चढ़ाने के लिए कतार में खड़ी थीं।
सोशल मीडिया भी सावन के रंग में रंगा हुआ था।
किसी की स्टोरी पर “हर हर महादेव” था, किसी की रील में कांवड़ यात्रा, किसी की तस्वीर में हाथ में बेलपत्र और माथे पर चंदन।
लेकिन उसी शहर के एक कैफे में बैठी अनन्या के सामने सावन का अर्थ कुछ और था।
वह विज्ञान की छात्रा रह चुकी थी और अब एक टेक कंपनी में काम करती थी। धार्मिक थी, लेकिन अंधविश्वासी नहीं।
उसके सामने बैठा आरव उसका प्रेमी था।
आरव मंदिर जाता था, शिव को मानता था, लेकिन अनन्या से अक्सर एक सवाल करता
“अगर भगवान हैं तो विज्ञान की जरूरत क्यों?”
अनन्या मुस्कुराकर कहती
“और अगर विज्ञान है तो भगवान की जरूरत क्यों?”
दोनों का रिश्ता शायद इसी सवाल और जवाब के बीच पला था।
वे एक-दूसरे से प्रेम करते थे, लेकिन दोनों की सोच अलग थी।
उस दिन अनन्या ने कहा,
“चलो आज शिव मंदिर चलते हैं।”
आरव ने आश्चर्य से पूछा,
“तुम?”
“हाँ, मैं।”
“तुम तो कहती हो कि पूजा से ज्यादा जरूरी कर्म है।”
“आज भी कहती हूँ।”
“फिर मंदिर क्यों?”
अनन्या ने अपना मोबाइल बैग में रखते हुए कहा,
“शायद यह देखने कि जिसे हम भगवान कहते हैं, उसके बारे में हमारे पूर्वजों ने हमें क्या समझाने की कोशिश की थी।”
आरव हँस पड़ा।
“आज तुम बहुत दार्शनिक लग रही हो।”
अनन्या ने कहा
“सावन है ना… थोड़ा गंभीर होना तो बनता है।”
मंदिर के बाहर काफी भीड़ थी।
कुछ महिलाएँ उपवास में थीं। कुछ पुरुष जल लेकर आए थे। युवा लड़के-लड़कियाँ भी बड़ी संख्या में दिखाई दे रहे थे।
आरव ने धीरे से पूछा,
“तुम भी आज व्रत रखोगी?”
अनन्या ने कहा,
“नहीं।”
“क्यों?”
“क्योंकि मेरे शरीर को आज भोजन की जरूरत है। मैं व्रत की भावना को मानती हूँ, लेकिन अपने शरीर के संकेतों को नजरअंदाज करके खुद को कमजोर करना भक्ति नहीं मानती।”

आरव चुप हो गया।
मंदिर के भीतर शिवलिंग पर जल चढ़ाया जा रहा था।
अनन्या ने पूछा,
“तुम्हें पता है लोग शिवलिंग पर जल क्यों चढ़ाते हैं?”
आरव ने कहा,
“क्योंकि परंपरा है।”
“हाँ, परंपरा है। लेकिन हर परंपरा को समझना भी चाहिए। हमारे पूर्वज प्रकृति, जल और जीवन के संबंध को बहुत गहराई से समझते थे। जल जीवन का आधार है। नदी, वर्षा, जंगल और मिट्टी इन सबका संरक्षण केवल आधुनिक पर्यावरण विज्ञान की बात नहीं है। भारतीय परंपराओं में भी प्रकृति को सम्मान देने की लंबी परंपरा रही है।”
आरव ने मुस्कुराकर कहा,
“तो आज शिव पूजा के साथ पर्यावरण का लेक्चर भी मिलेगा?”
“जरूर मिलेगा।”
दोनों हँस पड़े।
उसी समय उनके पास एक बुजुर्ग दंपती आकर खड़े हुए।
पति अपनी पत्नी का हाथ पकड़े हुए थे।
पत्नी के हाथ में बेलपत्र था।
आरव ने अनायास पूछा,
“आप लोग हर साल आते हैं?”
बुजुर्ग व्यक्ति मुस्कुराए।
“पैंतीस साल से।”
उनकी पत्नी ने हँसकर कहा,
“और इनको आज भी लगता है कि मैं शिव से इनके लिए प्रार्थना करती हूँ।”
पति बोले,
“और ये समझती हैं कि मैं इनके लिए व्रत रखता हूँ।”
अनन्या ने पूछा,
“तो सच क्या है?”
बुजुर्ग महिला ने कहा
“सच यह है बेटी कि शादी के बाद समझ आया-पति-पत्नी का रिश्ता भगवान से मांगी गई चीज नहीं, भगवान को निभाया गया वचन है।”
दोनों कुछ क्षण चुप रहे।
बुजुर्ग व्यक्ति ने पत्नी की ओर देखते हुए कहा
“पहले हम एक-दूसरे से प्यार करते थे। अब एक-दूसरे की जिम्मेदारी हैं। प्यार कम नहीं हुआ, उसका रूप बदल गया।”
अनन्या ने आरव की तरफ देखा।
आरव ने भी उसे देखा।
दोनों के बीच बिना शब्दों के एक सवाल गुजर गया
क्या प्रेम केवल साथ रहने का नाम है, या एक-दूसरे की जिम्मेदारी उठाने का भी?
मंदिर से बाहर निकलते हुए आरव ने पूछा,
“तुम्हें शिव में सबसे ज्यादा क्या पसंद है?”
अनन्या ने कहा,
“नीलकंठ।”
“क्यों?”
“क्योंकि समुद्र मंथन की कथा में जब विष निकला तो शिव ने उसे अपने कंठ में धारण किया। मैं इसे केवल धार्मिक कथा की तरह नहीं देखती। मुझे इसमें जीवन का बहुत बड़ा संदेश दिखाई देता है।”
“कैसा संदेश?”
“हर रिश्ते में, हर परिवार में, हर समाज में कुछ न कुछ विष पैदा होता है-गुस्सा, अहंकार, ईर्ष्या, गलतफहमी, तनाव। सवाल यह नहीं कि विष आएगा या नहीं। सवाल यह है कि हम उसके साथ क्या करेंगे।”
आरव ध्यान से सुन रहा था।
अनन्या ने आगे कहा
“नीलकंठ होना मतलब विष को दुनिया में फैलाना नहीं। लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि उसे पीकर खुद को खत्म कर लो। शायद असली सीख यह है कि नकारात्मकता को अपने भीतर पहचानो, उसे संभालो और आगे मत फैलाओ।”
आरव ने कहा,
“यानी रिलेशनशिप में भी नीलकंठ बनना पड़ेगा?”
अनन्या मुस्कुराई।
“कभी-कभी।”
“और अगर सामने वाला बार-बार विष ही देता रहे?”
अनन्या ने पहली बार गंभीर होकर कहा
“तब शिव की तरह धैर्य के साथ विवेक भी चाहिए। प्रेम का मतलब अत्याचार सहना नहीं है।”
आरव के चेहरे पर गंभीरता आ गई।
शाम को दोनों नदी किनारे बैठे थे।
दूर कांवड़िए लौट रहे थे।
“बोल बम!”
की आवाज हवा में घुल रही थी।
आरव ने पूछा,
“एक बात बताओ। अगर तुम्हें कभी शादी करनी पड़ी तो तुम कैसी शादी चाहोगी?”
अनन्या हँस पड़ी।
“तुम्हें आज अचानक शादी की चिंता क्यों होने लगी?”
“बस पूछ रहा हूँ।”
“तो सुनो। मुझे ऐसा रिश्ता चाहिए जिसमें मेरा साथी मेरे सवालों से परेशान न हो।”
“और?”
“मेरी स्वतंत्रता से डरे नहीं।”
“और?”
“मेरी गलतियों पर मुझे अपमानित न करे।”
“और?”
“जब मैं कमजोर पड़ूँ तो मुझे कमजोर समझकर छोड़ न दे।”
आरव ने धीरे से कहा,
“और अगर मैं तुम्हें ऐसा रिश्ता दे पाऊँ?”
अनन्या कुछ पल नदी को देखती रही।
फिर बोली
“तो फिर मुझे शिव से कुछ मांगने की जरूरत नहीं होगी।”
आरव मुस्कुराया।
तभी पास से एक बच्चा अपनी माँ से पूछ रहा था
“मम्मी, शिवजी के सिर पर चाँद क्यों है?”
माँ ने कहा,
“क्योंकि शिवजी भगवान हैं।”
बच्चा फिर पूछ बैठा
“लेकिन चाँद तो आसमान में होता है?”
माँ के पास इस बार कोई जवाब नहीं था।
अनन्या और आरव दोनों मुस्कुराए।
अनन्या ने कहा
“यही तो खूबसूरती है। सवाल पूछना बंद मत करो।”
आरव ने पूछा,
“धर्म में भी?”
“सबसे ज्यादा वहीं।”
“और अगर सवाल करने पर कोई नाराज हो जाए?”
“तो समझना कि उसे अपने विश्वास पर भरोसा कम है।”
आरव हँस पड़ा।
उस रात घर लौटते समय अनन्या ने अपनी माँ को फोन किया।
“माँ, सावन सोमवार पर आपने व्रत रखा?”
“हाँ।”
“कमजोरी तो नहीं लग रही?”
“थोड़ी।”
अनन्या ने कहा,
“पानी पीती रहना। जरूरत लगे तो फल खा लेना।”
माँ हँस पड़ीं।
“तू भगवान से ज्यादा डॉक्टर बन गई है।”
अनन्या ने कहा,
“नहीं माँ, भगवान ने शरीर दिया है तो उसकी देखभाल करना भी तो पूजा ही है।”
फोन रखने के बाद उसने खिड़की से बाहर देखा।
आसमान में चाँद था।
उसे अचानक लगा
शायद विज्ञान और भक्ति एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं।
विज्ञान पूछता है
“यह कैसे होता है?”
और अध्यात्म पूछता है
“इसका उपयोग हम कैसे करें?”
विज्ञान हमें जीवन को समझने की शक्ति देता है।
और अध्यात्म हमें उस जीवन को सार्थक बनाने की दिशा दे सकता है।
कुछ महीने बाद आरव और अनन्या ने शादी कर ली।
शादी बहुत साधारण थी।
न कोई दिखावा, न अनावश्यक खर्च।
दोनों ने एक-दूसरे से एक वचन जरूर लिया
“जब हम एक-दूसरे को समझ न पाएँ, तब भी एक-दूसरे को सुनना बंद नहीं करेंगे।”
शादी के बाद पहले सावन सोमवार को दोनों फिर उसी मंदिर पहुँचे।
इस बार उनके साथ वही बुजुर्ग दंपती भी दिखाई दिए।
बुजुर्ग महिला ने अनन्या को देखकर पूछा
“तो बेटी, मिल गया तुम्हारा शिव?”
अनन्या मुस्कुराई।
आरव ने तुरंत कहा
“नहीं अम्मा, मुझे मेरी पार्वती मिल गई।”
सभी हँस पड़े।
बुजुर्ग व्यक्ति ने आरव के कंधे पर हाथ रखा और कहा
“बेटा, शिव-पार्वती की कहानी सिर्फ पति-पत्नी की कहानी मत समझना। यह दो स्वतंत्र व्यक्तित्वों के साथ चलने की कहानी भी है।”
आरव ने सिर झुका दिया।
और उस दिन शिवलिंग पर जल चढ़ाते हुए दोनों ने कोई बड़ी मनोकामना नहीं मांगी।
बस एक छोटी-सी प्रार्थना की
“हे महादेव, हमें इतना विवेक देना कि प्रेम में अंधे न हों, विज्ञान में अहंकारी न हों, भक्ति में अंधविश्वासी न हों और स्वतंत्रता में गैर-जिम्मेदार न हों।”
शायद सावन की भक्ति का यही आधुनिक अर्थ हो सकता है
शिव को केवल मंदिर में ढूँढना नहीं,
अपने व्यवहार में भी थोड़ा शिवत्व पैदा करना।
जहाँ प्रेम हो, लेकिन अधिकार नहीं।
जहाँ स्वतंत्रता हो, लेकिन जिम्मेदारी भी।
जहाँ विज्ञान हो, लेकिन संवेदना भी।
जहाँ प्रश्न हों, लेकिन सम्मान भी।
और जहाँ भक्ति हो
वहाँ मनुष्य के प्रति करुणा भी हो।
हर हर महादेव।
