लेखक: एम. बी. बलवंत सिंह खन्ना
भारत जैसे सामाजिक ढांचे वाले देश में किसी लड़की का घर की चौखट पार कर अपने दम पर खड़ा होना आज भी आसान नहीं है। आज भी लाखों लड़कियाँ ऐसी हैं जिन्हें पढ़ाई, नौकरी, करियर या अपने निर्णय लेने की आज़ादी बड़ी मुश्किल से मिलती है। कई घरों में आज भी बेटी के बाहर निकलने का समय तय होता है, उसके मित्रों पर निगरानी होती है, उसके कपड़ों से लेकर उसकी जीवनशैली तक पर सवाल उठाए जाते हैं।

ऐसे समाज में जब कोई लड़की अपनी मेहनत से आत्मनिर्भर बनती है, नौकरी करती है, अपने फैसले खुद लेती है और स्वतंत्र जीवन जीने की कोशिश करती है, तो वह सिर्फ अपना जीवन नहीं बदल रही होती-वह उन लाखों लड़कियों के लिए एक रास्ता बना रही होती है जो अब भी बंधनों में हैं।
लेकिन जब किसी स्वतंत्र लड़की के साथ कोई दर्दनाक अपराध घटता है, तो समाज का एक बड़ा वर्ग तुरंत निष्कर्ष पर पहुँच जाता है-“इतनी आज़ादी क्यों दी?”, “रात में बाहर क्यों गई?”, “दोस्तों के साथ क्यों गई?”
यहीं सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा होता है।
क्या समस्या लड़कियों की आज़ादी है?
या समस्या उस समाज की मानसिकता है जहाँ दोस्ती, भरोसा और रिश्तों के पीछे छिपे चेहरे कभी-कभी हैवानियत में बदल जाते हैं?
यह सच है कि आज की दुनिया में सतर्कता बेहद आवश्यक है। लड़का हो या लड़की-दोनों के लिए। हर व्यक्ति को अपने आसपास के माहौल, लोगों की मानसिकता और संभावित खतरों को समझने की आवश्यकता है। भरोसा जीवन का हिस्सा है, लेकिन अंधविश्वास जोखिम बन सकता है। दोस्ती की भी एक सीमा होती है, और सुरक्षा की समझ उससे भी बड़ी आवश्यकता है।

विशेषकर महिलाओं के लिए यह सच और कठोर हो जाता है, क्योंकि हमारे समाज में अपराध का शिकार अक्सर वही बनती हैं। इसलिए सुरक्षा को लेकर जागरूक रहना कमजोरी नहीं, बल्कि परिपक्वता है।
लेकिन यहाँ एक बेहद जरूरी बात समझनी होगी
सतर्क रहने की सलाह और स्वतंत्रता छीन लेने की सोच-दोनों अलग बातें हैं।
यदि किसी अपराध के बाद समाज यह कहने लगे कि लड़कियाँ बाहर जाना बंद कर दें, दोस्त न बनाएँ, नौकरी न करें, स्वतंत्र जीवन न जिएँ-तो यह अपराधियों की जीत होगी।
क्यों?
क्योंकि तब सजा अपराधी को नहीं, बल्कि पूरे महिला समाज को मिलेगी।
और यही सबसे खतरनाक स्थिति होगी।
किसी एक दर्दनाक घटना के कारण लाखों लड़कियों के सपनों पर ताले नहीं लगने चाहिए। उनकी उड़ान पर पाबंदियाँ नहीं बढ़नी चाहिए। बल्कि होना यह चाहिए कि कानून और कठोर हो, पुलिस व्यवस्था और मजबूत हो, सामाजिक शिक्षा बेहतर हो और पुरुषों के भीतर बचपन से ही स्त्री सम्मान का संस्कार डाला जाए।
सवाल लड़कियों से कम और समाज से ज्यादा पूछा जाना चाहिए।
हम अपने बेटों को क्या सिखा रहे हैं?
क्या हम उन्हें यह सिखा रहे हैं कि स्त्री कोई वस्तु नहीं, एक स्वतंत्र व्यक्तित्व है?
क्या हम उन्हें यह सिखा रहे हैं कि “ना” का अर्थ “ना” ही होता है?
क्या हम उन्हें यह सिखा रहे हैं कि किसी का भरोसा तोड़ना सिर्फ अपराध नहीं, इंसानियत की हत्या है?

सच तो यह है कि समाज में महिलाओं की सुरक्षा का प्रश्न केवल कानून से हल नहीं होगा। यह घरों में तय होगा। परिवारों में तय होगा। संस्कारों में तय होगा।
हाँ, लड़कियों को भी यह समझना होगा कि स्वतंत्रता का अर्थ लापरवाही नहीं है। आधुनिक होना गलत नहीं, लेकिन विवेक खो देना खतरनाक हो सकता है। अपनी सुरक्षा को प्राथमिकता देना कोई पुरातन सोच नहीं-यह जीवन की आवश्यकता है।
जीवन में कुछ फैसले एक पल के होते हैं, लेकिन उनके परिणाम पूरी जिंदगी बदल सकते हैं।
इसलिए आज आवश्यकता दो समानांतर सोच की है।
एक, लड़कियाँ निर्भय होकर आगे बढ़ें, अपने सपने पूरे करें, अपनी पहचान बनाएँ।
दूसरा, वे जागरूक रहें, परिस्थिति को समझें, लोगों को परखें और सुरक्षा को कभी हल्के में न लें।
और समाज?
समाज को अपनी मानसिकता बदलनी होगी।
किसी भी अपराध के बाद पहला सवाल पीड़िता पर नहीं, अपराधी पर उठना चाहिए।
अगर हर बार घटना के बाद हम केवल लड़कियों की आज़ादी सीमित करेंगे, तो हम समस्या का समाधान नहीं, उसे और गहरा करेंगे।
याद रखिए
बेटियों को पिंजरे में बंद करके सुरक्षित नहीं बनाया जा सकता।
उन्हें सुरक्षित बनाने के लिए समाज को सभ्य बनाना होगा।
क्योंकि असली लड़ाई आज़ादी और बंदिश के बीच नहीं है।
असली लड़ाई है
स्वतंत्रता और सुरक्षा को साथ लेकर चलने की।
