“हुक्का-पानी से व्हाट्सऐप तक -समाज से दूरी की बदलती कहानी”

लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना कल्पना कीजिए…अगर आपको अपने ही गाँव से, अपने ही समाज से बेदखल कर दिया जाए।लोग आपसे बात करना बंद कर दें, आपके घर का हुक्का–पानी बंद कर दिया जाए, कोई लेन-देन न रखे, न सुख-दुख में कोई साथ खड़ा हो-तो आप क्या करेंगे? यह केवल एक सामाजिक दंड नहीं…

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हार और जीत के बीच का भाव

लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना मैदान के एक कोने में शोर था।तालियों की गूंज, मुस्कुराते चेहरे, कंधों पर उठाए जा रहे खिलाड़ी, और हवा में उड़ती खुशियाँ।लग रहा था जैसे उस पल समय भी ठहर कर उस जीत को देखना चाहता हो। और उसी मैदान के दूसरे कोने में…एक अजीब सा सन्नाटा था। वह…

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नालायक

(विद्या निकेतन मॉडल कॉन्वेंट स्कूल, पामगढ़ – रजत जयंती समारोह 2026 के स्मरण में) लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना ©️ रजत जयंती…पच्चीस वर्षों की साधना, संघर्ष और संस्कार का उत्सव। जब मुझे यह समाचार मिला कि विद्या निकेतन मॉडल कॉन्वेंट स्कूल, पामगढ़ अपना रजत जयंती समारोह मना रहा है, तो मन के भीतर कोई…

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संबंध, सवाल, सम्मान और रुचि

(नव वर्ष की पहली सोच, पहली संवेदना)लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना नव वर्ष केवल कैलेंडर की तारीख बदलने का नाम नहीं होता, यह अपने भीतर झाँकने, अपने संबंधों को टटोलने और जीवन के रास्तों को नए अर्थ देने का अवसर भी होता है। ऐसे समय में जब दुनिया तेज़ी से आगे बढ़ रही है,…

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‘कतार’

“कतार- व्यवस्था, विवशता और हमारी सोच का आईना” लेखक : एम बी बलवंत सिंह खन्ना कतार- एक साधारण सा शब्द, लेकिन हमारे सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक जीवन का सबसे बड़ा प्रतीक। कतार कभी व्यवस्था का संकेत देती है, तो कभी अव्यवस्था का प्रमाण बन जाती है। कहीं यह अनुशासन सिखाती है, तो कहीं यह हमारी…

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“बेडरूम”

लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना विवाह, मर्यादा और बेडरूम की शांत दुनिया की एक कहानी विवाह सिर्फ़ दो लोगों का साथ नहीं—दो संसारों का मिलन है।दो संस्कृतियाँ, दो आदतें, दो परिवार, दो तरीके… सब धीरे-धीरे एक ही धुन में ढलते हैं।और इस धुन को सुर में रखने की सबसे नाज़ुक, सबसे महत्वपूर्ण जगह है—बेडरूम।…

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“वो दीवाली, जब बिना स्टेटस लगाए भी त्योहार मनते थे”

लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना रात के आठ बजे थे, मोहल्ले में झिलमिल करती लाइटों की कतारें टिमटिमा रही थीं, लेकिन दिल में कहीं एक खालीपन था। खिड़की से बाहर देखा- बच्चे मोबाइल में व्यस्त थे, कोई वीडियो बना रहा था, कोई नए पटाखों का शो दिखा रहा था। चमक ज़रूर थी, पर न…

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“गाँव छोड़ शहर क्यों? क्या अपने सपनों को जन्मभूमि में ही साकार कर सकते हैं?”

लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना आज भारत के गाँवों से युवाओं का शहरों की ओर पलायन एक आम दृश्य बन गया है। गाँव की मिट्टी से उठकर कोई बच्चा जब कड़ी मेहनत से पढ़ाई करता है तो उसका सपना होता है कि वह अपने परिवार का जीवन बदल दे। लेकिन सच यह है कि…

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माँ की गोद से बड़ा कोई सुकून नहीं

लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना गाँव की कच्ची गलियों से जब भी सूरज की सुनहरी किरणें छनकर आतीं, तो लगता जैसे हर ईंट, हर पेड़ और हर छप्पर में जीवन साँस ले रहा हो। यही गाँव था जहाँ कुमार का जन्म हुआ था। मिट्टी की खुशबू, बैलों की घंटियाँ, कुएँ पर खनकते घड़ों की…

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“खून का यह रंग शर्म नहीं, समझ की ज़रूरत है”

आता तो हर महीने है… कुछ दिन साथ भी रहता है… लेकिन कोई उससे बात नहीं करता। कोई उसके बारे में बात नहीं करना चाहता।वो चुपचाप आता है… दर्द, असहजता, और डर साथ लाता है…कभी स्कूल की छुट्टी बनकर, तो कभी आत्म-संकोच का कारण बनकर।उसका नाम लेना भी ‘शर्म’ समझा जाता है, जैसे कोई अपराध…

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