लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना
भारत का लोकतंत्र एक दिन में नहीं बना-यह सदियों के संघर्ष, असंख्य बलिदानों और जनचेतना के जागरण का परिणाम है। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम केवल अंग्रेज़ों से मुक्ति की लड़ाई नहीं थी, बल्कि यह अपने अधिकारों-विशेषकर मत देने और अपनी बात रखने के अधिकार-की लड़ाई भी थी। यही वह बीज था, जिसने आगे चलकर भारत को एक सशक्त लोकतांत्रिक राष्ट्र के रूप में स्थापित किया।
आज़ादी से पहले भारत अनेक रियासतों और राजतांत्रिक व्यवस्थाओं में बँटा हुआ था, जहाँ जनता की भूमिका सीमित थी। निर्णय शासकों के हाथ में होते थे और आम जन केवल पालन करने के लिए बाध्य थे। लेकिन 1947 के बाद, जब देश ने एक नए युग में प्रवेश किया और भारतीय संविधान लागू हुआ, तब भारत ने खुद को एक गणराज्य और लोकतंत्र के रूप में परिभाषित किया। यह परिवर्तन केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक और मानसिक क्रांति भी था-जहाँ “प्रजा” से “नागरिक” बनने का सफर तय हुआ।

लोकतंत्र की यह यात्रा केवल संसद या विधानसभा तक सीमित नहीं रही। पंचायती राज व्यवस्था के माध्यम से सत्ता का विकेंद्रीकरण हुआ और गाँव-गाँव तक लोकतंत्र की जड़ें पहुँचीं। आज एक साधारण नागरिक भी अपने मत के माध्यम से देश की दिशा तय करने में भागीदार है-यह किसी भी लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत होती है।
लेकिन प्रश्न यह है कि क्या हम आज उस लोकतंत्र की आत्मा को उतनी ही गंभीरता से निभा रहे हैं, जितनी गंभीरता से उसे हासिल किया गया था?
वर्तमान परिदृश्य पर दृष्टि डालें तो पाएंगे कि चुनाव अब केवल विकास और कल्याण के मुद्दों तक सीमित नहीं रह गए हैं। जब भी किसी राज्य में विधानसभा या देश में लोकसभा चुनाव होते हैं, तो चर्चा अक्सर जाति, धर्म, क्षेत्रीयता और पहचान के इर्द-गिर्द घूमने लगती है। यह प्रवृत्ति धीरे-धीरे लोकतंत्र के मूल उद्देश्य को धूमिल कर रही है।
भारत एक कल्याणकारी राज्य है, जहाँ सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी नागरिकों की मूलभूत आवश्यकताओं-शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, पानी, बिजली और सुरक्षा-को सुनिश्चित करना है। लेकिन जब चुनाव इन वास्तविक मुद्दों से भटककर भावनात्मक और विभाजनकारी विषयों पर केंद्रित हो जाते हैं, तो सबसे बड़ा नुकसान आम जनता का ही होता है।
यह भी एक विडंबना है कि जिस मताधिकार के लिए कभी आंदोलन हुए, वही मताधिकार आज कई बार बिना गहराई से सोच-विचार के प्रयोग किया जाता है। वोट देना एक अधिकार ही नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी भी है। यह केवल किसी व्यक्ति या पार्टी को चुनने का कार्य नहीं, बल्कि अपने भविष्य की दिशा तय करने का निर्णय है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि मतदाता खुद से सवाल पूछे-
क्या वह अपने वोट का इस्तेमाल मुद्दों के आधार पर कर रहा है?
क्या वह अपने क्षेत्र की समस्याओं और उनके समाधान पर ध्यान दे रहा है?
या फिर वह केवल भावनाओं और प्रचार के प्रभाव में निर्णय ले रहा है?
लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती यह है कि इसमें सुधार की गुंजाइश हमेशा रहती है। लेकिन यह सुधार केवल सरकारों से नहीं, बल्कि नागरिकों की सोच से शुरू होता है। जब तक जनता अपने मुद्दों को प्राथमिकता नहीं देगी, तब तक राजनीतिक विमर्श भी उसी दिशा में नहीं बदलेगा।
आज देश के विभिन्न राज्यों में चुनावी परिणाम आने वाले हैं। यह केवल सरकार बदलने या बनने की प्रक्रिया नहीं है-यह लोकतंत्र की परिपक्वता की परीक्षा भी है। यह देखने का समय है कि क्या मतदाता अब भी पुराने ढर्रे पर चल रहा है, या फिर वह विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे वास्तविक मुद्दों को प्राथमिकता दे रहा है।
हमें यह समझना होगा कि मुद्दों से रहित चुनाव लोकतंत्र को कमजोर करते हैं। वे केवल सत्ता परिवर्तन का माध्यम बन जाते हैं, न कि समाज परिवर्तन का। और जब चुनाव समाज को जोड़ने के बजाय तोड़ने लगें, तो यह लोकतंत्र के लिए एक गंभीर संकेत है।
अंततः, लोकतंत्र केवल एक व्यवस्था नहीं-एक चेतना है। यह नागरिकों के विचार, उनकी जागरूकता और उनके निर्णयों पर निर्भर करता है। अगर हम सच में उस संघर्ष और बलिदान का सम्मान करना चाहते हैं, जिसने हमें यह अधिकार दिया, तो हमें अपने वोट को केवल एक अधिकार नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार संकल्प के रूप में देखना होगा।
क्योंकि-
लोकतंत्र की असली ताकत मतपेटी में नहीं, बल्कि मतदाता की समझ में होती है।

सार गर्भित लेख ,लेकिन ऐसी सोच के कितने लोग बाक़ी हैं ?काश लोग यह समझ पाते ,अपनी ताक़त जान पाते
हाँ मैम