“शाटीदार – एक विलुप्त होती परंपरा और शिक्षा का उजाला”

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लेखक – एम. बी. बलवंत सिंह खन्ना ©️

गाँवों की एक पुरानी परंपरा थी-शाटीदार
एक ऐसा पद, जो न कहीं दर्ज था, न किसी काग़ज़ में, लेकिन हर परिवार –हर समाज के सुख दुख का कार्यक्रम इसी के भरोसे चलती थी।
वो समय जब न मोबाइल था, न व्हाट्सएप, न कोई इवेंट मैनेजमेंट किसी घर में छट्ठी हो, मुंडन हो, गोद भराई हो, सगाई–विवाह हो या अंतिम संस्कार…
हर सूचना घर–घर पहुँचाने की ज़िम्मेदारी शाटीदार ही निभाता था।

सुबह की पहली भोर में, गाँव की पगडंडियों पर उसकी साइकिल की छोटी-सी घंटी और उनकी तेज गूँजती- तब लोग समझ जाते, “आज किसी घर में कार्यक्रम है।”
उसका काम सिर्फ़ सूचना पहुँचाना नहीं था, बल्कि पूरे गाँव को जोड़कर रखना था।

मेहनताना?
प्रति घर एक खाड़ी धान -यानी 20 लम्मर धान और प्रति लम्मर धान में ढाई किलो धान अर्थात् एक खाड़ी में 50 किलो।
हमारे गाँव में तब 100 घर थे जहाँ शाटीदार को साल भर में लगभग 500 किलो धान मिलता था।
इसके अलावा जिस घर में कार्यक्रम होता था, वहाँ से कुछ कपड़े, पैसे या अन्न मिल जाता-
पर फिर भी ये काम “रोज़गार” नहीं, “विश्वास की ड्यूटी” जैसा था।

हमारे गाँव का शाटीदार दादा
वही दादा जिनसे इस कहानी की असली पीड़ा शुरू होती है।
वे हमारे घर के पीछे रहते थे, रिश्ते में दादा लगते हैं, हालांकि उम्र से नहीं।
बहुत सादा, मेहनती, लगनशील… पर एक कमी-
शिक्षा के प्रति प्रेम नहीं।

शाटीदार की छोटी-सी आमदनी से भविष्य बनाना मुश्किल जरूर था।
पर दादा जी ने मेहनत से कुछ खेत गिरवी लेकर खेती शुरू की थी।
लगता था कि अब उनका जीवन सुधर रहा है।

लेकिन नियति कभी-कभी एक ही झटके में सब उजाड़ देती है…

15 साल पहले उनकी बेटी ने ख़ुद को आग के हवाले कर आत्महत्या कर ली।
उस आग ने सिर्फ़ उसका जीवन नहीं,
बल्कि पूरे परिवार की खुशियों को भस्म कर दिया।

उसके बाद से दादा बदल गए –
ना वही मेहनत, ना वही लगन, ना वही मुस्कान।
जिसने दूसरों का खेत गिरवी रखा था,
वो अब अपने जीवन को सँभाल न सका।
जिन लोगों के खेत उसने गिरवी रखा था, वे खेत वापस छूट गए।
आर्थिक स्थिति तबाह, मानसिक स्थिति बिखरी…
और वो “शाटीदारी” भी छोड़न दिए।

अब परिवार रोज़ी–रोटी के लिए
शहरों में मजदूरी करने मजबूर था।

और बेटा?

एकमात्र संतान-
जिस पर अब माँ–बाप की दुनिया टिक गई थी।
बेटी के जाने का घाव इतना गहरा था कि वे इस बेटे पर जान छिड़कते थे।
बेटा जो मांगता – दादा जी तुरंत भेज देते।
भले खुद भूखे रहें, लेकिन बेटे को कमी न हो।

पिछले माह दिवाली में जब गाँव गया तो पता चला-
दादा जी गाँव आए हैं, लेकिन रहने की स्थिति…
एक छोटे कमरे का घर जो अब खंडहर हो चुका है।

बेटा?
कहाँ सोता है, कहाँ खाता है –
किसी को पता नहीं।

शिक्षा का आभाव
एक परिवार को खोखला बनाते हुए
धीरे-धीरे पूरा खत्म कर देता है।

सच कहूँ… उस दिन मुझे बेहद दर्द हुआ।

मैंने अपनी आँखों के सामने देखा कि—
शिक्षा का न होना सिर्फ़ गरीबी नहीं लाता, बल्कि पीढ़ियाँ बर्बाद कर देता है।

शाटीदार दादा जी ने बहुत मेहनत की,
पर अपने बच्चों को पढ़ा न सके।
और जब जीवन ने करवट बदली,
तो न उनके पास सहारा था,
न सुरक्षित भविष्य।

यह कहानी सिर्फ़ शाटीदार की नहीं

पूरी एक पीढ़ी की है।
एक ऐसी प्रथा जो डिजिटल युग के आने से खत्म हो रही है,
पर जो तंत्र गाँवों को जोड़ता था,
एकता को मजबूत रखता था।

लेकिन यह सीख भी देती है

“किसी भी परंपरा से बड़ा वरदान यदि कोई है, तो वह है शिक्षा।”

शिक्षा ही सम्मान है,
शिक्षा ही सुरक्षा है,
शिक्षा ही वह दीया है
जो किसी भी अँधेरे भरे जीवन को रोशन कर सकता है।

जो भी परिवार आज अपने बच्चों को पढ़ा रहे हैं-
समझ लीजिए, आप भविष्य बचा रहे हैं।

और जो शिक्षा को हल्का समझते हैं-
वे एक नहीं, पूरी पीढ़ी को खतरे में डालते हैं।

शाटीदार की परंपरा विलुप्त हो रही है,

पर उससे मिली सीख सदा जिंदा रहनी चाहिए।

शिक्षा अपनाइए,
बच्चों को पढ़ाइए,
क्योंकि-

“अज्ञानता घरों को उजाड़ देती है, और शिक्षा… उन्हें जीवन देती है।”


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