माँ की गोद से बड़ा कोई सुकून नहीं

लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना गाँव की कच्ची गलियों से जब भी सूरज की सुनहरी किरणें छनकर आतीं, तो लगता जैसे हर ईंट, हर पेड़ और हर छप्पर में जीवन साँस ले रहा हो। यही गाँव था जहाँ कुमार का जन्म हुआ था। मिट्टी की खुशबू, बैलों की घंटियाँ, कुएँ पर खनकते घड़ों की…

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अवैध संबंधों का जाल : किशोर, युवा और समाज पर असर

लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना आज का दौर तेज़ी से बदल रहा है। इंटरनेट, सोशल मीडिया और बदलती जीवनशैली ने इंसान को जितना जोड़ा है, उतना ही अकेला भी किया है। दोस्त बनाने की आज़ादी है, रिश्ते निभाने के विकल्प खुले हैं, और पल भर में नए संबंध बन जाते हैं। लेकिन इसी के…

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“हमारे बीच के निषादराज”

लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना रामायण में निषादराज की कहानी हम सबने कभी-न-कभी पढ़ी, सुनी या देखी होगी। जब भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण वनवास के दौरान गंगा तट पहुँचे, तब गंगा पार कराने के लिए निषादराज ने अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया। यह प्रसंग केवल नदी पार करने का नहीं है, बल्कि…

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नशे की गिरफ्त: एक समाज की डगमगाती नींव

लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना रात का सन्नाटा था, लेकिन धमतरी की सड़कों पर गाड़ियों की लाइटें किसी अशुभ घटना का संकेत दे रही थीं। पुलिस की गाड़ी में बैठे तीन युवक—चेहरे पर नशे की चमक और बेखौफ मुस्कान—मानो दुनिया को यह जताने आए हों कि अपराध उनके लिए कोई डर का विषय नहीं…

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“कपड़े सस्ते थे, सपने नहीं”

रायपुर में जन्मा आत्मविश्वास, जो अब कभी कम नहीं होता रायपुर मेरे लिए केवल एक शहर नहीं रहा।यह मेरे व्यक्तित्व का निर्माण स्थल है, मेरी आत्मा का रंग, और मेरे सपनों का पहला ठिकाना। छोटे कस्बे से निकलकर जब मैं इस शहर की धड़कन में शामिल हुआ, तब न तो जेब भारी थी और न…

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“धुएं में उड़ता बचपन – वर्तमान समय की नई चुनौती”

लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना बचपन जो सादगी और मासूमियत के लिए जाना जाता है, आज एक नई सामाजिक बीमारी से जूझ रहा है। बचपन जहां लोग अपनी सहजता और अपनत्व से किसी को भी “अपना” बना लेते हैं, अब उसी समाज में एक गंभीर समस्या चुपचाप जड़ें जमा रही है – कम उम्र…

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जब आदि ने अकेले भरी दाखिला की राह: एक शिक्षाप्रद और भावनात्मक अनुभव

लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना एक छोटे से कस्बे में जन्मा आदि, एक ऐसा लड़का था जो पढ़ाई में ठीक-ठाक था। परिवार में पढ़ाई का माहौल था, सभी लोग शिक्षित थे, लेकिन बड़े शहरों जैसी जानकारी और संसाधन नहीं थे। आदि के जीवन में सबसे बड़ा मोड़ उस समय आया जब उसने 12वीं कक्षा…

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शब्दों का संस्कार: जब भाषा से मर्यादा हटने लगे

लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना भारत, एक ऐसा देश जो अपनी सभ्यता, संस्कृति और संस्कारों के लिए विश्वविख्यात रहा है। यहाँ की मिट्टी से लेकर यहाँ की बोली तक में एक खास तरह की आत्मीयता, विनम्रता और मर्यादा झलकती थी। हम बचपन से सुनते आए हैं — वाणी में मधुरता होनी चाहिए, क्योंकि शब्दों…

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मेरे आँगन का पर्यावरण

लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना आज विश्व पर्यावरण दिवस है। मन बार-बार कुछ लिखने को कह रहा है — लेकिन शब्द कहाँ से शुरू करूँ, ये समझ नहीं आता। शायद इसलिए कि मैं जिस ग्रामीण पृष्ठभूमि से आता हूँ, वहाँ जीवन और पर्यावरण दो अलग चीज़ें नहीं, बल्कि एक ही साँस के दो रूप…

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“सुराही की ठंडकता हो रही ग़ायब”

लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना गर्मी का मौसम था, आसमान से जैसे आग बरस रही थी। दोपहर में सन्नाटा ऐसा कि पत्ते भी हिलने से डरते थे। मगर हमारे घर के आँगन में उस खामोशी को तोड़ने वाले कुछ स्थायी साथी थे—एक पुराना कुआँ, आम का पेड़, और एक सुराही, जो हर साल की…

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