लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना
रिश्तों की दुनिया बड़ी अजीब होती है। कुछ रिश्ते खून से बनते हैं, कुछ समाज से, और कुछ अनजाने ही दिल की गहराइयों में पनप जाते हैं। ये वही रिश्ते होते हैं जिनके नाम नहीं होते, पर उनकी मौजूदगी हर पल महसूस होती है।
राघव और अवनि का रिश्ता भी ऐसा ही था। दोनों कभी औपचारिक रूप से एक-दूसरे के नहीं हुए, पर शायद दिल के किसी कोने में हमेशा के लिए बस गए थे।
पहली बार मुलाक़ात एक साहित्यिक गोष्ठी में हुई थी। भीड़ के बीच अवनि की आवाज़ जैसे सीधे राघव की आत्मा को छू गई थी। नज़रे मिलीं तो लगा जैसे वर्षों से बिछड़े किसी अपने से अचानक सामना हो गया हो। कोई वादा नहीं, कोई इकरार नहीं—बस एक अजीब-सी खामोश समझदारी थी दोनों के बीच।
दिन बीतते गए। कभी किताबों की चर्चा में, कभी चाय के प्याले में, कभी बारिश में भीगी सड़कों पर चलते हुए… वे एक-दूसरे के और पास आते गए। पर यह पास आना कभी रिश्ते का नाम न ले सका। शायद हालात, शायद समाज, या शायद उनका अपना डर—कि कहीं यह रिश्ता टूट न जाए।

राघव जानता था कि अवनि उसके जीवन का हिस्सा कभी पूरी तरह नहीं बन पाएगी। और अवनि भी समझती थी कि राघव उसकी पहुंच से कहीं दूर खड़ा है। फिर भी दोनों के बीच एक डोर थी, जो न टूटी, न बंधी। एक ऐसा एहसास जो “मोहब्बत” तो नहीं था, पर मोहब्बत सा था।
रात के सन्नाटे में जब राघव अकेला बैठता, तो उसकी यादें उसके पास आकर बैठ जातीं। कभी किताब के पन्नों में, कभी अधूरे गीतों में, और कभी उस खालीपन में, जो अवनि के बिना पूरा न हो पाता। अवनि भी अपने जीवन की उलझनों में घिरी रहती, पर कहीं भीतर राघव की मौजूदगी उसे सहारा देती।
समय धीरे-धीरे बहता रहा। दोनों अपनी-अपनी ज़िम्मेदारियों में डूब गए, पर रिश्ता वहीं का वहीं रहा। न हासिल हुआ, न जुदा हुआ।
सालों बाद, जब राघव एक किताब के विमोचन कार्यक्रम में पहुँचा, तो मंच पर अवनि दिखी। अब चेहरे पर उम्र की लकीरें थीं, पर आँखों की चमक वही थी। नज़रें मिलीं और एक क्षण के लिए समय थम गया। न कोई सवाल, न कोई जवाब—बस एक मुस्कान। उस मुस्कान में वे सारे साल समा गए जो चुपचाप बीत गए थे।
कार्यक्रम ख़त्म हुआ। भीड़ के बीच से गुज़रते हुए अवनि राघव के पास आई। उसने धीरे से कहा—
“जानते हो, हमने कभी रिश्ते का नाम नहीं रखा, शायद इसलिए आज तक वो टूटा नहीं।”
राघव ने हल्की हँसी के साथ जवाब दिया—
“हाँ… कुछ रिश्ते बस सुंदरम होते हैं। उनका पूरा होना ज़रूरी नहीं, उनका होना ही काफी है।”
और फिर, भीड़ में गुम होने से पहले, दोनों ने एक आख़िरी बार एक-दूसरे को देखा।
शायद यही था उनका अंत… या फिर एक अनंत शुरुआत।


अपने शीर्षक की तरह ही सुन्दरम….
Good,l like it