लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना
गाँव की कच्ची गलियों से जब भी सूरज की सुनहरी किरणें छनकर आतीं, तो लगता जैसे हर ईंट, हर पेड़ और हर छप्पर में जीवन साँस ले रहा हो। यही गाँव था जहाँ कुमार का जन्म हुआ था। मिट्टी की खुशबू, बैलों की घंटियाँ, कुएँ पर खनकते घड़ों की आवाज़ और खेतों में लहराती फसलें-ये सब उसकी दुनिया थे।
कुमार बचपन से ही होशियार था। स्कूल में मास्टरजी हमेशा कहते-“यह लड़का एक दिन बड़ा आदमी बनेगा।” माँ उसके स्कूल की कॉपियाँ सँभालकर रखतीं और गर्व से देखतीं, जैसे उन कॉपियों में उसका पूरा भविष्य लिखा हो। लेकिन किसे पता था कि वही भविष्य एक दिन माँ की गोद और गाँव की मिट्टी से उसे दूर ले जाएगा।
गाँव के लोग कहते-“गाँव से शहर जाना है, शहर से विदेश और विदेश से चाँद तक।” कुमार ने भी यही सपना देखा। उसकी पढ़ाई ने उसे शहर तक पहुँचाया, और नौकरी ने विदेश बुला लिया।
जब पहली बार गाँव से विदा होने लगा, माँ ने उसकी बैग पैक की थी। उसमें कुछ जोड़ी कपड़े, गाँव की चूल्हे में पकी रोटियाँ और माँ के हाथ से बनाया हुआ गुड़ था। जाते-जाते माँ ने सिर्फ इतना कहा—“बेटा, जहाँ रहना, अच्छे से रहना। लेकिन कभी भूलना मत, तेरी माँ यहीं तेरी राह देखती रहेगी।”
कुमार ने सहजता से कहा था-“माँ, कुछ ही सालों की बात है। फिर पैसा कमाकर तुम्हें भी अपने पास ले आऊँगा।”
लेकिन वो कुछ साल धीरे-धीरे बीतते-बीतते दशकों में बदल गए।
शहर और फिर विदेश की चकाचौंध ने कुमार को अपने रंग में रंग लिया। दफ्तर की भागदौड़, चमकते मॉल, ऊँची इमारतें और विदेशी दोस्त-सबने मिलकर उसके जीवन को नया रूप दे दिया। माँ की गठरी में रखा गुड़ कब का खत्म हो चुका था, लेकिन उसकी मिठास कुमार के दिल में कहीं खो गई।
फोन पर कभी-कभार माँ से बात होती। माँ हर बार वही पूछती-“बेटा, कब आ रहा है? खेतों में धान की बालियाँ झूम रही हैं, तुझे बहुत याद करती हूँ।”
कुमार जवाब देता—“माँ, अभी बहुत काम है, जल्दी ही टिकट बुक करूँगा।”
लेकिन टिकट कभी बुक नहीं हुआ।
गाँव में माँ बूढ़ी हो चली थी। आँखों की रोशनी धुँधली पड़ रही थी, लेकिन आँगन की ओर उसका चेहरा हमेशा टिकता रहता-शायद इसी आस में कि बेटा कभी अचानक दरवाज़े से दाखिल होगा।
गाँव वाले कहते-“बुढ़िया की आँखें अब सिर्फ अपने बेटे का रास्ता देखती हैं।”
एक दिन पड़ोस की औरत ने मज़ाक में कहा-“तुम्हारा बेटा तो अब चाँद पर ही घर बना रहा होगा।”
माँ ने मुस्कुराते हुए कहा-“हाँ, सुना है शहर वाले विदेश जाते हैं, और विदेश वाले चाँद पर जा रहे हैं। लेकिन चाहे वो कहीं भी चला जाए, मेरे लिए तो वही छोटा-सा कुमार है, जो मेरी गोद में सोया करता था।”
समय बीतता रहा। कुमार ने सचमुच बहुत नाम और पैसा कमाया। उसके पास गाड़ी थी, बड़ा मकान था, और दोस्तों के साथ विदेशी दावतें थीं। लेकिन उसके दिल के किसी कोने में अक्सर एक खालीपन सिर उठाता। कभी-कभी रात में सोते वक्त माँ की छवि आँखों के सामने तैरती-वो झुर्रियों से भरा चेहरा, वो सूनी आँखें और वो थकी हुई गोद।
लेकिन अगले ही दिन ऑफिस की मीटिंग्स और जिम्मेदारियाँ उसे उस खालीपन से दूर कर देतीं।
फिर एक दिन फोन आया। गाँव से किसी ने खबर दी—“कुमार, तेरी माँ अब ज़्यादा दिन की मेहमान नहीं।”
ये सुनते ही कुमार की दुनिया जैसे थम गई। उसे अचानक लगा कि उसने कितनी बड़ी गलती कर दी। जो सफ़र वो तय करता रहा-गाँव से शहर, शहर से विदेश-वो सब किसी काम का नहीं, अगर माँ की आँचल से ही दूर हो गया।
कुमार ने तुरंत टिकट लिया और गाँव पहुँचा।
जब वह घर पहुँचा तो आँगन में सन्नाटा था। माँ बिस्तर पर लेटी हुई थीं। उनका चेहरा और भी झुर्रियों से भर चुका था, लेकिन आँखें अब भी उसी दरवाज़े की ओर थीं, जहाँ से उनका बेटा दाखिल हुआ था।
कुमार माँ के पैरों पर गिर पड़ा-“माँ, मुझे माफ कर दे मैं देर से आया।”
माँ ने काँपते हाथों से उसके सिर पर हाथ रखा और धीमे स्वर में बोलीं- “बेटा, मैं तेरा ही इंतज़ार कर रही थी। अब आ गया न तू… मेरी गोद में अपना सर रख में तेरी बालो को सहलाते हुए तुझे सुलाना चाहती हूँ ”

कुमार फूट-फूटकर रो पड़ा।
उस रात कुमार माँ की गोद में सिर रखकर सो गया। बहुत दिनों बाद उसे सुकून मिला। पर सुबह जब नींद खुली, तो माँ का हाथ उसके सिर से सरक चुका था। माँ हमेशा के लिए जा चुकी थीं।
कुमार ने महसूस किया कि उसने सारी दुनिया देख ली, लेकिन माँ की गोद जितनी गहरी, उतनी पवित्र जगह कहीं नहीं।
उस दिन उसे समझ आया—
गाँव को शहर जाना है,
शहर को विदेश,
विदेश को चाँद पर जाना है…
लेकिन चाँद को भी माँ की गोद में ही लौटना है।
और फिर उसने अपने मन से पूछा-
“फिर भला माँ की गोद छोड़कर गाँव को शहर क्यों जाना है?”
कुमार ने माँ के पैरो के नीचे की मिट्टी अपने माथे पर लगाई और ठान लिया कि अब इस गाँव को कभी नहीं छोड़ेगा। अब उसका हर सफ़र यहीं से शुरू होगा और यहीं आकर पूरा होगा।


NICE TRUE STORY