लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना
क्या एक पति का अपनी पत्नी से यह कहना-“तू जा, मैं संभाल लूँगा”- सिर्फ़ एक भावनात्मक वाक्य है? या यह एक नई सामाजिक क्रांति की दस्तक है? यह सवाल हमें उस दौर में ले जाता है जहाँ सदियों से पुरुषों को परिवार का “कमाने वाला” और स्त्रियों को “घर सँभालने वाली” मानकर भूमिकाएँ बाँट दी गईं।
इतिहास की बेड़ियाँ
हमारे समाज में यह धारणा गहरी है कि पुरुष बाहर की दुनिया के लिए बने हैं और स्त्रियाँ घर की दुनिया के लिए। घर की चौखट स्त्री का संसार रही है, और चौखट के बाहर पुरुष का अधिकार क्षेत्र। यही कारण है कि इतिहास में हमने गिनी-चुनी स्त्रियों को ही शिक्षा, राजनीति या कला के मंच पर देखा। बाकी औरतें घर के भीतर ही खप गईं।
क्या यह स्थिति नारी की “कमज़ोरी” का प्रमाण थी? या फिर पुरुषप्रधान समाज की बनाई दीवारों का परिणाम? इस प्रश्न का उत्तर हमें असहज कर सकता है, लेकिन सच यही है कि औरतों के सपनों को अक्सर उनकी जिम्मेदारियों की जंजीरों में बाँध दिया गया।
वर्तमान की असमानता
आज का समाज बदला है। महिलाएँ वैज्ञानिक भी हैं, पायलट भी हैं, सांसद भी हैं और लेखक भी। पर क्या यह बराबरी सचमुच बराबरी है? क्या नौकरी करने वाली महिला को आज भी घर के काम से छुट्टी मिल पाती है?
कहावत है—“औरत दोहरी पारी खेलती है।” सुबह से रात तक घर संभालना और फिर नौकरी या व्यवसाय को भी पूरी तरह निभाना। नतीजा यह होता है कि करियर की सीढ़ी चढ़ते-चढ़ते वह थक जाती है। यहाँ तक कि कई औरतें अपराधबोध में जीती हैं—कहीं बच्चे उपेक्षित न हो जाएँ, कहीं पति नाराज़ न हो जाएँ, कहीं समाज उंगली न उठाए।
यही वह मोड़ है जहाँ “तू जा, मैं संभाल लूँगा” वाक्य जीवन बदल सकता है। अगर पति यह कहकर घर की ज़िम्मेदारियाँ अपने कंधों पर ले ले, तो पत्नी निश्चिंत होकर अपने सपनों की उड़ान भर सकती है।
क्या पुरुष तैयार हैं?
सवाल यह है कि क्या हमारे समाज के पुरुष इस मानसिकता को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं? क्या वे रसोई में खड़े होकर बच्चों के लिए खाना बना सकते हैं? क्या वे सास-ससुर की दवाइयों का ध्यान रख सकते हैं? क्या वे बच्चों की कॉपी जाँच सकते हैं या स्कूल की मीटिंग में शामिल हो सकते हैं?
अक्सर इसका जवाब टालमटोल में मिलता है। कहा जाता है-“यह तो औरतों का काम है।” लेकिन क्या सचमुच? काम की कोई लिंग-सीमा नहीं होती। खाना बनाना, घर सँभालना, बच्चों की देखभाल करना-ये सब इंसानी काम हैं, “औरतों का” या “मर्दों का” नहीं।
पुरुष की असली महानता
हम महानता को अक्सर युद्धों, पदों और पैसों से जोड़ते हैं। लेकिन क्या यह महानता नहीं होगी कि एक पति अपनी पत्नी को यह कहे- “तू जा, मैं संभाल लूँगा”? क्या यह कम साहसिक है कि वह सामाजिक तानों को नज़रअंदाज़ करते हुए पत्नी को प्रोत्साहित करे?
वह पुरुष सचमुच महानायक है जो यह मानता है कि पत्नी का करियर, उसके सपने और उसकी आकांक्षाएँ परिवार जितनी ही महत्वपूर्ण हैं।
भविष्य का समाज
अगर हम आने वाले समय की तस्वीर बनाएँ तो एक प्रश्न बार-बार सामने आता है-क्या हमारी बेटियाँ और बहुएँ अपने सपनों को सहजता से जी पाएँगी? या वे वही संघर्ष दोहराएँगी जो उनकी माँ और दादी ने किया?
कल्पना कीजिए एक ऐसे समाज की जहाँ पति-पत्नी दोनों समान रूप से घर और बाहर की जिम्मेदारियाँ निभाएँ। जहाँ बच्चे अपने पिता को भी रसोई में सक्रिय देखते हैं और माँ को भी ऑफिस जाते हुए। यह दृश्य बच्चों को बराबरी का असली पाठ पढ़ाएगा। तब “औरत का सपना” और “मर्द का सपना” जैसी कोई विभाजन रेखा नहीं रहेगी।
बहस का मुद्दा
आलोचक कह सकते हैं कि यह सोच “आदर्शवादी” है। लेकिन क्या बिना आदर्श के कोई परिवर्तन संभव है? जब समाज ने यह मान लिया कि औरतें केवल घर के लिए बनी हैं, तब किसी ने सवाल नहीं उठाया। तो अब अगर यह प्रस्ताव रखा जाए कि “घर दोनों का है, जिम्मेदारी भी दोनों की होनी चाहिए”, तो इसे असंभव क्यों माना जाए?
सोचिए—जिस दिन हर पति अपनी पत्नी को यह कहेगा- “तू जा, मैं संभाल लूँगा”- उस दिन क्या कोई औरत अपने सपनों को बीच रास्ते छोड़ने के लिए मजबूर होगी? क्या तब औरतें सिर्फ़ “शादी की नायिका” नहीं, बल्कि “जीवन की महानायिका” नहीं बनेंगी?
“तू जा, मैं संभाल लूँगा”- केवल शब्दों का खेल नहीं है। यह समाज की सोच में बदलाव का प्रतीक है। यह बराबरी का बीज है, साझेदारी की जड़ है और प्रेम की असली परिभाषा है।
अगर हम सचमुच भविष्य की पीढ़ियों को बेहतर समाज देना चाहते हैं, तो हमें यह स्वीकार करना होगा कि घर सँभालना स्त्रियों का कर्तव्य नहीं, परिवार का सामूहिक दायित्व है। पति का यह छोटा-सा वाक्य स्त्री को आकाश की ऊँचाइयों तक ले जा सकता है।

तो अगली बार जब पत्नी अपने सपनों की बात करे, तो हर पति को यही कहना चाहिए- “तू जा, मैं संभाल लूँगा।”

Bahut achcha lekh wakai ye badlav hona chahiye