लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना
एक छोटे से कस्बे में जन्मा आदि, एक ऐसा लड़का था जो पढ़ाई में ठीक-ठाक था। परिवार में पढ़ाई का माहौल था, सभी लोग शिक्षित थे, लेकिन बड़े शहरों जैसी जानकारी और संसाधन नहीं थे।
आदि के जीवन में सबसे बड़ा मोड़ उस समय आया जब उसने 12वीं कक्षा की परीक्षा दी और परिणाम का इंतजार ही कर रहा था कि उसके सिर से पिता का साया उठ गया।
पिता न सिर्फ परिवार के संरक्षक थे, बल्कि आदि के जीवन में सबसे बड़े मार्गदर्शक भी। उनके जाने के बाद एक अजीब-सी चुप्पी पूरे घर में छा गई। लेकिन घर के लोग पढ़ाई का महत्व समझते थे। माँ ने आँसू पोछते हुए कहा — “बेटा, पढ़ाई रुकनी नहीं चाहिए। यही तेरे पापा की भी इच्छा थी।”
इसी विश्वास और हौसले के साथ आदि ने राजधानी रायपुर की ओर रुख किया।

पहली बार अकेले: जब दिल में कसक थी और कदम थरथरा रहे थे
आदि पहली बार अपने कस्बे से बाहर निकल रहा था। छोटी सी अटैची में कपड़े, कंधे पर बैग और मन में पिता की याद लिए वह यूनिवर्सिटी के कैंपस में दाखिला प्रक्रिया के लिए पहुंचा।
चारों तरफ भीड़ थी। हर विद्यार्थी के साथ उनके माता-पिता या बड़े भाई-बहन मौजूद थे। कुछ जगह तो परिवार वाले बहस कर रहे थे — “इस कॉलेज में दाखिला लेना चाहिए या नहीं?” कोई फीस का काउंटर संभाल रहा था, तो कोई दस्तावेज दिखा रहा था।
लेकिन आदि चुपचाप एक किनारे खड़ा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि कहाँ से शुरू करे।
उसने धीरे-धीरे साहस जुटाया और लाइन में लग गया। जब उसका नंबर आया, तो काउंसलर ने कुछ सवाल किए:
“कौन सा कोर्स लेना है?”
“कौन-कौन से कॉलेज में आवेदन किया है?”
आदि ने अपनी समझ के अनुसार जवाब दिए, लेकिन मन में एक हल्की सी टीस थी — काश आज पापा साथ होते तो शायद और बेहतर निर्णय ले पाता।
अकेले एडमिशन की चुनौतियाँ: हर कदम पर सीख
आदि के अनुभव से यह स्पष्ट होता है कि अकेले कॉलेज में दाखिला लेना केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि एक जीवन पाठ होता है।
- जानकारी की कमी:
कौन-सा कॉलेज बेहतर है, फीस कितनी है, स्कॉलरशिप की प्रक्रिया क्या है — ये सब बातें अगर कोई अनुभवी साथ हो, तो आसानी से समझ आती हैं। - कागजों का झंझट:
आदि ने एक बार फीस चालान में नाम गलत भर दिया। काउंटर पर वापस भेजा गया। अगर कोई साथ होता, तो शायद ये गलती न होती। - भावनात्मक खालीपन:
यह सबसे बड़ी चुनौती थी। काउंसलिंग के बाद जब सभी लोग अपने परिवार के साथ गेट के बाहर खड़े थे, आदि अकेले एक कोने में खड़ा था। हाथ में दाखिले की रसीद थी, लेकिन आँखों में हल्की सी नमी भी।
परिवार की भूमिका: केवल शिक्षा नहीं, मार्गदर्शन भी जरूरी
परिवार में अगर कोई भी व्यक्ति विश्वविद्यालय की प्रक्रिया समझता हो, तो उसका साथ होना बहुत मायने रखता है।
- कॉलेज और कोर्स के चयन में मदद:
परिवार बड़े फायदों और नुकसानों को समझते हैं जो एक छात्र अकेले नहीं देख पाता। - कागजी प्रक्रिया आसान बनाना:
दस्तावेजों की जांच, फीस जमा करने जैसी चीजों में गलती कम होती है। - भावनात्मक समर्थन:
सबसे जरूरी बात — मनोबल। जब कोई पास होता है, तो डर और घबराहट कम हो जाती है।
यदि आप भी आदि की तरह अकेले जा रहे हैं, तो यह बातें ध्यान रखें:
- रिसर्च करें:
कॉलेज, कोर्स, फीस, स्कॉलरशिप की जानकारी ऑनलाइन या जानकार लोगों से लेकर ही जाएं। - सभी कागजात पहले से तैयार रखें:
मूल प्रमाण पत्र, फोटोकॉपी, पासपोर्ट साइज फोटो आदि। - डरें नहीं, सवाल पूछें:
हेल्प डेस्क पर खुलकर बात करें। गलतफहमी दूर करें। - जल्दबाजी में फैसला न लें:
कोर्स और कॉलेज का चयन सोच-समझकर करें।
अकेलेपन से आत्मनिर्भरता तक: आदि की सीख
आदि ने अकेले कदम रखा था। गलती भी हुई, अनुभव भी मिला। लेकिन सबसे बड़ी बात यह थी कि उसने हार नहीं मानी। आज वह उसी कॉलेज में पढ़ रहा है, नए दोस्तों के साथ, और अब नए बच्चों को काउंसलिंग में मदद भी करता है।
कई बार जीवन में ऐसा मोड़ आता है जब हमें अकेले ही आगे बढ़ना होता है। अगर परिवार शिक्षित है लेकिन साथ नहीं दे पा रहा, तब भी घबराएं नहीं।
क्योंकि रास्ता चाहे कितना भी कठिन हो, अगर इरादा मजबूत है तो मंज़िल मिल ही जाती है।
