जेब वाली दादी और पर्स वाली दीदी
लेखक- एम बी बलवंत सिंह खन्ना गाँव की सुबहें अब भी वैसी ही होती हैं — धीमी, शांत, और धूप की नर्म चादर ओढ़े हुए। लेकिन समय का चेहरा बदल चुका है। अब हर आँगन में मोबाइल की घंटियाँ सुनाई देती हैं, और बच्चों के हाथों में खिलौनों की जगह स्क्रीन चमकती है। उस दिन…
