80-90 के दशक की वो सुनहरी शामें, जब गांव की मिट्टी में खेलने के बाद बच्चों के पैर धूल से सने होते थे और घर के आंगन में चौपाल लगती थी। चूल्हे से उठता धुंआं, और दादा-दादी, नाना-नानी के होठों से बहती कहानियों का जादू। दिनभर के काम के बाद, थके हुए शरीर और तरोताज़ा होते दिल। न मोबाइल था, न आज के जैसे वोटीटी। बस एक कहानी थी, और उसके बीच-बीच में आने वाली हुंकारू की आवाजें—”हाँ, हाँ…”।
“संसार की सबसे सुंदर कला है—कहानी कहना, क्योंकि वह दिलों को जोड़ने का काम करती है।”

गर्मी की छुट्टियों में जैसे ही दिन ढलता, गांव के लोग अपने खेतों और कामों से लौटकर घरों की ओर रुख करते। चूल्हों पर खाने की महक तैरने लगती, और आंगन में धीरे-धीरे भीड़ जमा होने लगती। घर के बड़े-बुजुर्ग आराम से खाट पर बैठते, उनकी आंखों में कहानियों का संसार उमड़ता। बच्चों से लेकर बड़े तक सब इंतजार करते कि आज किस कहानी की बारी है। दादा की खाट पर बैठते ही बबलू, सनी, साहिल, मोगल जैसे बच्चे वहीं धरना दे देते।
“विद्या के बिना ज्ञान नहीं, और कहानी के बिना संवेदनाएं नहीं।”
नारायण दादा की आंखों में आज भी वही चमक थी जो हर रोज होती थी जब वो कहानी शुरू करते थे। उन्होंने अपनी धोती को ठीक करते हुए कहना शुरू किया, “बहुत समय पहले की बात है, जब राजा विक्रमादित्य का राज्य था…” और सबकी आंखें चमक उठीं। कहानी का रस इतना गहरा होता था कि बच्चे पूरी तरह से उसमें डूब जाते थे। लेकिन कहानियों का ये सिलसिला तभी चलता था जब बीच-बीच में हुंकारू की आवाज आती रहती थी—”हाँ, हाँ…।” यह सिर्फ एक ध्वनि नहीं थी, बल्कि कहानी का हिस्सा थी, कहानी को जीवंत रखने का तरीका था।

अगर कोई श्रोता हुंकारू देना भूल जाता, तो कहानीकार नाराज़ हो जाता था। “सुन रहे हो या सो गए?” दादा सवाल करते। हुंकारू न देने का मतलब था कि श्रोता का ध्यान भटक गया है। और अगर कोई एक बार हुंकारू देना भूल जाए, तो ऐसा लगता जैसे कहानी का सुर ही बिगड़ गया हो।
“मनुष्य का सच्चा खजाना उसकी कहानियों में छिपा होता है।”
गांव की उस रात भी कुछ ऐसा ही हुआ था। नारायण दादा ने जब अपनी कहानी की लय पकड़ी, तो बबलू का ध्यान कहीं और चला गया था। उसकी हुंकारू नहीं आई। दादा ने तुरंत टोका, “अरे बेटा, ध्यान कहां है? सुनाई नहीं दे रहा?”
बबलू सकपकाया, “हाँ, हाँ दादा जी, सुन रहा हूँ!” सभी हंस पड़े, लेकिन दादा जी ने अपनी कहानी को फिर से मोड़ दिया। कहानी आगे बढ़ी, और श्रोता फिर से उसमें खो गए।
अब वर्षों बीत गए और यह सिलसिला धीरे-धीरे टूटने लगा। समय बदल रहा था, और साथ ही बदल रहे थे लोगों के तरीके। टीवी, कार्टून, और वीडियो गेम ने धीरे-धीरे वो जगह ले ली, जहां कभी दादा-दादी की कहानियों का साम्राज्य था। बच्चे अब घर लौटते तो कहानी सुनने की बजाय टीवी का रिमोट ढूंढते।
“जो कहानियों से नहीं जुड़ता, वह अपने अस्तित्व से दूर हो जाता है।”
नारायण दादा जी के चेहरे पर अब वो मुस्कान कम होने लगी थी। उनकी कहानियों को सुनने वाला कोई नहीं था। पहले जहां पूरा आंगन भर जाता था, अब वहाँ सिर्फ खामोशी थी। वो अकेले खाट पर बैठते और इंतजार करते कि शायद कोई आ जाए। एक शाम उन्होंने कुकू को पुकारा, “बेटा, आज एक कहानी सुनो।”
कुकू, जो अब बड़ा हो चुका था और कॉलेज में पढ़ाई कर रहा था, ने बिना ज्यादा रुचि दिखाए कहा, “दादा जी, अब तो हम मोबाइल पर सब देख लेते हैं। आपको तकलीफ होगी, रहने दीजिए।”
“सुनना भी एक कला है, जो दिल की गहराइयों से उपजती है।”
लेकिन दादा जी की आंखों में वही पुरानी चमक थी। उन्होंने धीमी आवाज में कहा, “बहुत समय पहले…” कुकू का ध्यान कहीं और था। उसने एक बार भी हुंकारू नहीं दिया। दादा ने कहानी बीच में रोक दी। “बेटा, हुंकारू नहीं दे रहे हो?” कुकू को यह समझ में नहीं आया। वो हैरान था। “दादा जी, ये हुंकारू क्या होता है?”
दादा जी की आंखों में आंसू छलक पड़े। उन्होंने थकी हुई आवाज़ में कहा, “हुंकारू… कहानी को जिन्दा रखने के लिए होता है। अगर कोई हुंकारू नहीं देता, तो कहानी खत्म हो जाती है। जैसे अब हो गई है।”
“कहानी सुनाने वाले हाथ नहीं, दिल की आवाज़ से बुनी जाती है।”
उस रात नारायण दादा जी नहीं रहे। उनकी आखिरी कहानी अधूरी रह गई, क्योंकि हुंकारू देने वाला कोई नहीं था।
कुकू ने कभी सोचा नहीं था कि कहानी का इतना गहरा मतलब हो सकता है। वो हमेशा यही समझता था कि ये तो बस पुराने जमाने की बातें हैं। लेकिन अब उसे एहसास हुआ कि उसने क्या खो दिया था। वो किस्से, वो कहानियां, वो हुंकारू… जो कभी साधारण सी बातें लगती थीं, अब धरोहर बन गई थीं।
“संस्कृति की जड़ों में कहानियों की गहराई होती है। अगर कहानियां खत्म हो जाएं, तो जड़ें भी कमजोर हो जाती हैं।”
अब कुकू अपने दोस्तों को दादा जी की कहानियों के बारे में बताता, लेकिन वो जादू वापस नहीं ला पाता। अब तो सबकुछ डिजिटल हो गया था। कहानी का वो सजीव जादू, जो हुंकारू की धुन से गूंजता था, सन्नाटे में खो चुका था। लेकिन उसने ठान लिया था कि वो इन कहानियों को फिर से जीवंत करेगा, अपनी अगली पीढ़ी को यह धरोहर सौंपेगा।
अंत में, कुकू ने अपने दोस्तों से कहा, “कहानियों को सुनने के लिए सिर्फ कान नहीं, दिल भी चाहिए। हम जितनी कहानियां छोड़ देंगे, उतनी ही अपनी जड़ों से दूर हो जाएंगे। एक हुंकारू हमारी पुरानी यादों और संस्कृति को ज़िंदा रख सकता है।”
“कहानी तब तक ज़िंदा रहती है जब तक उसे सुनने वाला कोई हो, और हुंकारू तब तक गूंजता है जब तक दिल से कोई महसूस करे।”
