“खून का यह रंग शर्म नहीं, समझ की ज़रूरत है”

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आता तो हर महीने है… कुछ दिन साथ भी रहता है… लेकिन कोई उससे बात नहीं करता। कोई उसके बारे में बात नहीं करना चाहता।
वो चुपचाप आता है… दर्द, असहजता, और डर साथ लाता है…
कभी स्कूल की छुट्टी बनकर, तो कभी आत्म-संकोच का कारण बनकर।
उसका नाम लेना भी ‘शर्म’ समझा जाता है, जैसे कोई अपराध हो गया हो।

यह ‘वो’ कुछ और नहीं, हर लड़की और महिला के जीवन का एक अहम हिस्सा—पीरियड्स है।

हर साल 28 मई को स्वस्थ पीरियड्स दिवस (Menstrual Hygiene Day) मनाया जाता है ताकि हम इस मुद्दे को सामाजिक अंधेरे से बाहर ला सकें। लेकिन अफसोस, आज भी यह विषय ग्रामीण क्षेत्रों में न केवल उपेक्षित है, बल्कि कलंक बन चुका है। हर महीने यह अनुभव करोड़ों महिलाओं की जिंदगी में आता है, लेकिन इसके बारे में ना बात होती है, ना शिक्षा दी जाती है, और ना ही समझदारी दिखाई जाती है।

ग्रामीण भारत की हकीकत यह है कि जब लड़कियों को पहली बार पीरियड्स आते हैं, तो उनका स्वागत भय और भ्रम से होता है। उन्हें बताया नहीं जाता कि यह सामान्य है, बल्कि यह जताया जाता है कि अब वो “अलग” हो गई हैं। उन्हें पुराने कपड़ों की चिंदी थमा दी जाती है, जिससे न केवल उनका आत्म-सम्मान घायल होता है, बल्कि उनका स्वास्थ्य भी खतरे में पड़ जाता है।

कई मामलों में यही गंदे कपड़े संक्रमण, फंगल रोग, यूरीन ट्रैक्ट इंफेक्शन और यहाँ तक कि सर्वाइकल कैंसर का कारण बनते हैं। नतीजा यह है कि महिलाएं चुपचाप पीड़ा झेलती हैं—ना किसी से कहती हैं, ना दिखाती हैं। और समाज? वो तो जैसे कहता है—“ये उनका मामला है, हमें क्या?”

लेकिन हर अंधेरा स्थायी नहीं होता।
धीरे-धीरे बदलाव आया।
सरकारी योजनाओं ने ग्रामीण स्कूलों और आंगनबाड़ियों में सैनेटरी नैपकिन पहुंचाना शुरू किया। कुछ एनजीओ और स्वयंसेवी संगठन जागरूकता शिविर लगाने लगे। माँ-बहनों ने आपस में बात करनी शुरू की। बेटियाँ अब सवाल पूछने लगीं।

लेकिन सवाल यह है—क्या यह काफी है?

आज भी देश में लाखों लड़कियां और महिलाएं हैं, जिनके लिए सैनेटरी पैड एक ‘शहर वाली चीज़’ है।
आज भी दुकानदार पैड को काले थैले में लपेट कर देते हैं।
आज भी स्कूल में पीरियड्स पर बात करने से पहले शिक्षक खुद नज़रें झुका लेते हैं।
आज भी पुरुषों को यह लगता है कि यह सिर्फ “औरतों का विषय” है।

मैं खुद इसका उदाहरण हूं।
एक लड़का होते हुए, मैंने 20 साल की उम्र में पहली बार “सैनेटरी पैड” शब्द सुना। इससे पहले मैंने कभी इस विषय पर ना कुछ पढ़ा था, ना किसी से सुना था। यह कोई गर्व की बात नहीं, बल्कि उस सामाजिक चुप्पी की शर्मनाक मिसाल है, जिसे हमने पीढ़ियों से ओढ़ रखा है।

पर क्या अब भी हम चुप रहें?

समझने और समझाने का समय आ गया है।

  • पीरियड्स कोई गंदगी नहीं है, यह प्रकृति का नियम है।
  • सैनेटरी पैड कोई लग्ज़री नहीं, आवश्यकता है।
  • माहवारी पर बात करना अश्लील नहीं, आवश्यक है।
  • पुरुषों का इस विषय में शिक्षित होना कमजोरी नहीं, समझदारी है।

तो अब क्या करें?

  1. शिक्षा से शुरुआत करें — स्कूल में पीरियड्स शिक्षा सिर्फ लड़कियों के लिए नहीं, लड़कों के लिए भी अनिवार्य होनी चाहिए।
  2. सुलभता बढ़ाएँ — हर गाँव, स्कूल और पंचायत भवन में मुफ्त और सुरक्षित सैनेटरी पैड उपलब्ध कराए जाएँ।
  3. मिथक तोड़ें — मंदिर, रसोई और समाज में महिलाओं को “अपवित्र” कहने वाली सोच का विरोध करें।
  4. पुरुषों को जोड़ें — पिताओं, भाइयों और पतियों को सिखाएं कि पीरियड्स पर बात करना कमजोरी नहीं, संवेदनशीलता है।
  5. लोकल नेतृत्व को प्रेरित करें — सरपंच, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, शिक्षकों को इस विषय में बोलने के लिए प्रेरित करें।

पीरियड्स एक स्त्री का शरीर नहीं, समाज की समझ भी तय करता है।
अगर हम इस विषय पर चुप हैं, तो हम सिर्फ एक प्रक्रिया नहीं, एक पूरी पीढ़ी को अंधेरे में जीने को मजबूर कर रहे हैं।

अब समय है कि हम यह कहें—
“हाँ, हमें पता है पीरियड्स क्या है, और हम इस पर बात करने में शर्म नहीं, गर्व महसूस करते हैं।”
क्योंकि खून का यह रंग शर्म का नहीं, जीवन का रंग है।

लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना
एक ऐसा बेटा, भाई और दोस्त—जो अब इस चुप्पी का हिस्सा नहीं बनना चाहता


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4 thoughts on ““खून का यह रंग शर्म नहीं, समझ की ज़रूरत है”

  1. शानदार
    जब पुरुष भी सकारात्मक सोच के साथ इस विषय पर बात करेंगे तब ही जागरुकता आएगी।

  2. बहुत सुंदर विचार यह समाज के हर व्यक्ति के लिए आवश्यक हैं कि इस विषय पर खुलकर घर, कार्यालय अन्य महत्वपूर्ण स्थानों पर इस विषय पर बात करके इसे शर्म के बजाय सम्मान का विषय बनाना चाहिए|

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