लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना
सुबह की भागदौड़ भरी उस घड़ी में मैंने शायद ये नहीं सोचा था कि आज का दिन मुझे एक ऐसा अनुभव देगा, जो समाज की सोच पर सवाल उठा देगा।
रायपुर की सेजबहार स्थित मेरी कॉलोनी गोल्फ ग्रीन में बीती रात आए आंधी-तूफान ने बिजली व्यवस्था ठप कर दी।
हमारी कॉलोनी की सप्लाई अभी भी ग्रामीण फीडर से जुड़ी है, जबकि आसपास की कई कॉलोनियाँ शहरी सुविधा का लाभ उठा रही हैं। बिल्डर को कई बार शिकायतें, निवेदन, आवेदन सब हो चुके हैं — लेकिन परिणाम वही ढाक के तीन पात।
इस अंधेरे में सबसे बड़ा संकट था — मोबाइल चार्जिंग। मेरे दोनों फोन – एक iPhone 15 (₹96,000) और दूसरा Samsung Galaxy (₹25,000) – बंद होने की कगार पर थे। साथ में Apple की स्मार्ट वॉच भी लगभग खत्म। हम जैसे डिजिटल मार्केटिंग और कंटेंट राइटिंग में लगे लोगों के लिए ये सिर्फ डिवाइस नहीं, जीवनरेखा होते हैं।
तभी ध्यान आया कि बगल में ही अविनाश स्मार्ट सिटी है — रायपुर की एक प्रतिष्ठित, सुव्यवस्थित और ‘स्मार्ट’ कॉलोनी। उम्मीद थी कि वहां मदद मिल सकती है।
बिना नहाए, बस वही घर के आरामदायक कपड़ों में निकल पड़ा — डी-मार्ट के ₹99 वाले चप्पल, ₹699 का लोअर, और ₹299 की सादी टी-शर्ट पहनकर।
लेकिन मेरे पास जो था, वो नजरों से छिपा रह गया — महंगे फोन, स्मार्ट वॉच और सबसे बड़ी चीज़ — ज़रूरत।
मैं गया, बोला — “भैया, लाइट नहीं है हमारी कॉलोनी में… फोन चार्ज करना है।”
पर वहाँ कर्मचारी ने जैसे मेरी बात नहीं, मेरा पहनावा सुना। ऊपर से नीचे देखा, और पहले पूछे कहा रहते हो मैंने कहा गोल्फ ग्रीन फिर वे बोले — “गार्ड रूम में कर लो।”
उस पल मैं समझ गया, मैं इंसान नहीं, कपड़ों से बना एक धारणा बन चुका हूँ — “छपरी”, “मजदूर”, “गैर-ज़रूरी।”
अगर मैं वही महंगे कपड़ों में होता, शायद चाय भी मिल जाती।
एक पल के लिए मन में गांधी और अंबेडकर जी दोनों का चेहरा घूम गया — एक ने पूरी दुनिया को धोती में जीकर दिखा दिया, तो दूसरे ने सूट पहनकर स्वाभिमान की नई परिभाषा गढ़ी।
दोनों ने एक संदेश दिया — पहनावा इंसान की पहचान नहीं, उसका चयन है।
पर अफ़सोस, हम 21वीं सदी में भी इसी सतही सोच से जूझ रहे हैं — “पहले कपड़े देखो, फिर इज़्ज़त दो।”

जो बात सबसे ज्यादा खली — वह यह कि यह घटना किसी सड़कछाप दुकान पर नहीं, रायपुर की एक बेहद प्रतिष्ठित और स्मार्ट कॉलोनी के साइट ऑफिस में घटी।
अगर इंसानियत इतनी ब्रांडेड हो जाए कि वो 299 की टी-शर्ट में दिखाई ही ना दे, तो फिर तरक्की का क्या मतलब?
मेरे गोल्फ ग्रीन में बिल्डर साहब भले ही बिजली ग्रामीण फीडर से दे रहे हों, कॉलोनी में अव्यवस्था हो, कर्मचारी कामों को भले ही टालते रहते हों लेकिन उनके कर्मचारी कम से कम इज़्ज़त से बात करते हैं — यह बात अब जाकर समझ आई।
हाँ, शुक्रगुजार हूं उस गार्ड का जिसने इंसान की तरह देखा, बात की, और मुझे बैठाकर मोबाइल चार्ज करने दिया।
कभी-कभी असली “स्मार्ट” वही होते हैं, जो दूसरों को उनकी ज़रूरत के वक्त “सम्मान” दे पाते हैं।
सीख यही है — समाज की असली तरक्की तब होगी, जब हम पहनावे से नहीं, व्यवहार से इंसान पहचानेंगे।
आपका क्या मानना है — क्या हम वाकई स्मार्ट हो रहे हैं या सिर्फ स्मार्टफोन से लैस हो रहे हैं?

Nice
bacche Yuva budhe sabhi smartphone se less ho rahe hain