गांव के पूरब कोने में, जहाँ अब भी महुआ के पेड़ हर वसंत अपनी चुप खुशबू बिखेरते हैं, वहीं मिट्टी की दीवारों से घिरा एक पुराना सा घर खड़ा है। छप्पर कुछ झुक चुका है, दीवारों पर समय की दरारें उभर आई हैं, मगर आंगन अब भी वैसा ही साफ और पवित्र लगता है, जैसा चालीस साल पहले रहा होगा। उसी आंगन के एक कोने में, धूप-छांव के बीच, एक पुरानी खटिया चुपचाप पड़ी रहती है। वही खटिया, जिसने तीन पीढ़ियों को आते-जाते देखा है, उनकी कहानियाँ सुनी हैं।

हर शाम जब गोधूलि का समय आता है और गायों के गले में बंधी घंटियों की आवाज़ दूर तक गूंजती है, बांसुरी की मीठी तान कहीं से हवा में तैरती है, तो गांव के बच्चे उस खटिया के इर्द-गिर्द इकठ्ठा हो जाते हैं। वे बच्चे जिनके नाम अब बड़े स्टाइलिश हैं—’जयविक’, ‘नायरा’, ‘एवियन’… सब ऐसे दौड़ते हैं जैसे कोई जादुई कहानी सुनने वाले हों। और खटिया पर बैठे होते हैं बबा, सिर पर सफेद साफा बांधे, चेहरे पर समय की झुर्रियाँ, मगर आंखों में अब भी वैसी ही चमक जैसे खेत में पहली बार हल चलाने वाला किसान देखता है। उनके पास एक पुराना झोला होता है, जिसमें न कोई मोबाइल, न कोई मोटी किताब, बस कुछ पीले पड़े खत, एक तांबे की डिबिया और एक जर्जर सी डायरी।
बबा जब बोलते हैं तो ऐसा लगता है, जैसे खुद धरती बोल रही हो। एक दिन उन्होंने हँसते हुए बच्चों से पूछा—”तुम जानते हो, मेरा नाम गजोधर क्यों रखा गया?” बच्चे खिलखिलाकर हँस पड़े—’गजोधर!’ अब कौन रखता है ऐसा नाम! बबा भी मुस्कराए। फिर धीरे-धीरे सुनाने लगे—”जब मैं पैदा हुआ था, मेरे दादा जी गांव के सबसे समझदार और सम्मानित आदमी माने जाते थे। जहां कहीं कोई झगड़ा होता, लोग कहते—’गजोधर दादा को बुलाओ।’ उनका नाम ही भरोसा था। जब मैं जन्मा, गांव के बुजुर्गों ने कहा—’नाम को ज़िंदा रखना है, गजोधर रखो।’ और तब से मैं गजोधर हो गया।”
पास बैठी सरला काकी ने टोकते हुए कहा—”अब तो लोग मोबाइल में ‘Trendy Baby Names’ ढूंढते हैं और नाम रख देते हैं—अलविन, मायरा, जेड… अरे, इन नामों में ना जड़ों की महक रही, ना गांव की मिठास।” बबा हँसते-हँसते ठहाका लगाते हैं—”अब नाम नहीं, फैशन हो गया है बेटा। नामों में न बंस बचा, न माटी।”
फिर बबा अपनी पुरानी डायरी खोलते हैं। उसमें एक-एक नाम दर्ज है—बिरजू, सरला, कमला, रामलाल, झुनिया, रामबाई… साधारण नाम, मगर उनमें मिट्टी की सोंधी खुशबू बसती है। बबा धीरे से कहते हैं—”इन नामों में पूर्वजों की सांसें हैं। बिना देखे भी कोई पहचान सकता है—ये बिरजू का बेटा होगा या रामलाल का नाती।”
तभी एक छोटा बच्चा, जिसकी शर्ट पर लिखा है—’Future Rockstar’, सहमते हुए पूछ बैठता है—”बबा, क्या हमारे नाम गलत हैं?” बबा उसके सिर पर हाथ फेरते हैं—”गलत नहीं हैं बेटा, बस जो नाम भूल गए हैं, वही ठीक नहीं है। तुम कोई भी नाम रखो, उसमें अपनी माटी की महक न खोने देना। नाम सिर्फ शब्द नहीं होते, नाम आत्मा होते हैं।”
समय बीतता है। गांव में एक बच्चा जन्म लेता है। घरवाले सोचते हैं अब कोई मॉडर्न नाम रखा जाएगा, शायद कोई ऐसा जो शहरों में खूब चले। पर जब नामकरण का दिन आता है, बूढ़े पंडित जी पूछते हैं—”नाम क्या रखा जाएगा?” सबकी नजरें आपस में सवाल करने लगती हैं। तभी खटिया पर लेटे बबा आंखें खोलते हैं और धीरे से कहते हैं—”नाम रखो—गजोधर।” एक पल को जैसे हवा भी ठहर जाती है। सरला काकी के होंठ काँपते हैं, कोई कहता है—”अब तो ऐसा नाम भूल ही चुके थे…” मगर जैसे ही पंडित जी ऊंची आवाज में पुकारते हैं—”गजोधर! इधर आओ!” गांव का आंगन फिर से खिल उठता है।
बबा की आंखों से एक बूंद चुपचाप टपक पड़ती है। वे मुस्कराते हैं—”अब लगता है… गांव अब भी ज़िंदा है।”
क्योंकि नाम केवल पुकारने के लिए नहीं होते। नाम विरासत होते हैं—माटी की, यादों की, अपनेपन की। जब तक गजोधर, सरला, रामलाल जैसे नाम आंगनों में गूंजते रहेंगे, तब तक खटिया पर बैठकर कहानियाँ सुनाने वाले बबा भी जिंदा रहेंगे।

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति, पढ़ते समय गांव की मिट्टी की महक महसूस हुई