प्रेम की अधूरी पराकाष्ठा

लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना “प्रेम की अधूरी पराकाष्ठा”:“वह प्रेम जो अपनी गहराई, पवित्रता और निस्वार्थता में सर्वोच्च था — पर फिर भी अधूरा रह गया।” साल 2014 की जुलाई थी। मौसम बरसात का था और मन भीगने को तैयार। यूनिवर्सिटी का तीसरा साल चल रहा था। लाइब्रेरी की खिड़की के पास बैठा मैं,…

Read More

आधुनिक जीवन शैली में कमजोर पड़ते पारिवारिक नाते-रिश्ते: एक सांस्कृतिक यात्रा पाषाण युग से 21वीं सदी तक

लेखक- एम बी बलवंत सिंह खन्ना मानव सभ्यता की यात्रा एक बहुत लंबी और गहन प्रक्रिया रही है। पाषाण युग से लेकर आज की 21वीं सदी तक, इंसान ने जीवन के हर क्षेत्र में विकास किया है—रहन-सहन, तकनीक, शिक्षा, चिकित्सा, संचार, और सबसे अधिक सामाजिक संरचना में। परंतु इस प्रगति के बीच एक बात जो…

Read More

शब्दों का संस्कार: जब भाषा से मर्यादा हटने लगे

लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना भारत, एक ऐसा देश जो अपनी सभ्यता, संस्कृति और संस्कारों के लिए विश्वविख्यात रहा है। यहाँ की मिट्टी से लेकर यहाँ की बोली तक में एक खास तरह की आत्मीयता, विनम्रता और मर्यादा झलकती थी। हम बचपन से सुनते आए हैं — वाणी में मधुरता होनी चाहिए, क्योंकि शब्दों…

Read More

मेरे आँगन का पर्यावरण

लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना आज विश्व पर्यावरण दिवस है। मन बार-बार कुछ लिखने को कह रहा है — लेकिन शब्द कहाँ से शुरू करूँ, ये समझ नहीं आता। शायद इसलिए कि मैं जिस ग्रामीण पृष्ठभूमि से आता हूँ, वहाँ जीवन और पर्यावरण दो अलग चीज़ें नहीं, बल्कि एक ही साँस के दो रूप…

Read More

उदन्त मार्तंड: उस पहले दीपक की कहानी जिसने हिंदी पत्रकारिता की राह रोशन की

लेखक- दिव्यांशु कश्यप जब हम आज सुबह की चाय के साथ अख़बार खोलते हैं या सोशल मीडिया पर हिंदी में कोई खबर पढ़ते हैं, तो शायद ही सोचते हैं कि इस अभिव्यक्ति की आज़ादी की शुरुआत कब और कैसे हुई होगी। पर कभी-कभी इतिहास की धूल में छुपे उन पहले क़दमों को याद करना ज़रूरी…

Read More

“खून का यह रंग शर्म नहीं, समझ की ज़रूरत है”

आता तो हर महीने है… कुछ दिन साथ भी रहता है… लेकिन कोई उससे बात नहीं करता। कोई उसके बारे में बात नहीं करना चाहता।वो चुपचाप आता है… दर्द, असहजता, और डर साथ लाता है…कभी स्कूल की छुट्टी बनकर, तो कभी आत्म-संकोच का कारण बनकर।उसका नाम लेना भी ‘शर्म’ समझा जाता है, जैसे कोई अपराध…

Read More

हुंकारू: कहानियों की धड़कन

80-90 के दशक की वो सुनहरी शामें, जब गांव की मिट्टी में खेलने के बाद बच्चों के पैर धूल से सने होते थे और घर के आंगन में चौपाल लगती थी। चूल्हे से उठता धुंआं, और दादा-दादी, नाना-नानी के होठों से बहती कहानियों का जादू। दिनभर के काम के बाद, थके हुए शरीर और तरोताज़ा…

Read More

“जहाँ नामों में गांव बसता है”

गांव के पूरब कोने में, जहाँ अब भी महुआ के पेड़ हर वसंत अपनी चुप खुशबू बिखेरते हैं, वहीं मिट्टी की दीवारों से घिरा एक पुराना सा घर खड़ा है। छप्पर कुछ झुक चुका है, दीवारों पर समय की दरारें उभर आई हैं, मगर आंगन अब भी वैसा ही साफ और पवित्र लगता है, जैसा…

Read More

“शहर के सीने में सपने”

सूरज की पहली किरणें जैसे ही पहाड़ियों से उतरकर धरती को छूने लगीं, गाँव की पगडंडियों पर हल्की धूल उड़ने लगी। सुदर्शन, बाईस साल का एक युवक, पास की पहाड़ी पर बैठा दूर तक फैले खेतों और झोपड़ियों को निहार रहा था। यह वही गाँव था जहाँ उसकी जड़ें थीं, पर आज उसका मन कुछ…

Read More

“क्लिक से रिश्ता, दस्तख़त से जुदाई”

(एक कहानी, जो हज़ारों के आईने में खुद को देखती है) रुचि कभी ज़्यादा बोलने वाली नहीं थी। लेकिन उसकी चुप्पी में वो सब था, जो शब्द कभी कह नहीं पाते। माँ के मस्तिष्क में उभरते हुए सफ़ेद बाल और पिताजी की झुकी हुई पीठ के बीच, उसने अपने सपनों को तह करके अलमारी के…

Read More
Back To Top