उदन्त मार्तंड: उस पहले दीपक की कहानी जिसने हिंदी पत्रकारिता की राह रोशन की

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लेखक- दिव्यांशु कश्यप

जब हम आज सुबह की चाय के साथ अख़बार खोलते हैं या सोशल मीडिया पर हिंदी में कोई खबर पढ़ते हैं, तो शायद ही सोचते हैं कि इस अभिव्यक्ति की आज़ादी की शुरुआत कब और कैसे हुई होगी। पर कभी-कभी इतिहास की धूल में छुपे उन पहले क़दमों को याद करना ज़रूरी हो जाता है – और ऐसा ही एक ऐतिहासिक क़दम था ‘उदन्त मार्तंड’ का प्रकाशन।

एक निजी जुड़ाव…
एक हिंदी भाषी के रूप में जब मैंने पहली बार ‘उदन्त मार्तंड’ के बारे में पढ़ा, तो एक गर्व की लहर सी उठी। सोचिए, 1826 का वो समय जब अंग्रेज़ी और फारसी भाषाएं पत्रकारिता पर राज कर रही थीं – तब किसी ने हिम्मत दिखाई कि आम भारतीय की भाषा में भी खबरें हों, उसके सवाल पूछे जाएं, उसकी बात कही जाए।

क्या था ‘उदन्त मार्तंड’?
‘उदन्त मार्तंड’ का मतलब है – “समाचारों का उगता सूरज”। और सच में, इसने हिंदी पत्रकारिता का सूरज उगाया।

प्रकाशन की तारीख: 30 मई 1826
स्थान: कोलकाता (तब का कलकत्ता)
संपादक: पंडित जुगल किशोर शुक्ल

यह भारत का पहला हिंदी समाचार पत्र था, जो हफ्ते में एक बार – हर मंगलवार को – प्रकाशित होता था।

संघर्ष की कहानी
पंडित जुगल किशोर शुक्ल कोई बड़े धनाढ्य नहीं थे, न ही उनके पास कोई बड़ी टीम थी। उनके पास थी बस एक जिद – हिंदी भाषियों को उनकी भाषा में खबर देने की। लेकिन चुनौतियां कम नहीं थीं:

हिंदीभाषी पाठक कोलकाता में न के बराबर थे।

डाक प्रणाली का सहारा नहीं मिला।

सरकारी विज्ञापन या सहयोग नहीं मिला।

आर्थिक तंगी ने कदम-कदम पर रोका।

पर वो रुके नहीं… जब तक चला, पूरी शिद्दत से चलाया। 79 अंकों के बाद यह अख़बार 4 दिसंबर 1827 को बंद हो गया। लेकिन उसकी लौ आज भी जल रही है।

हिंदी पत्रकारिता दिवस
आज, हर साल 30 मई को ‘हिंदी पत्रकारिता दिवस’ मनाया जाता है – उदन्त मार्तंड की याद में, और उन सभी पत्रकारों के सम्मान में जो हिंदी भाषा की गरिमा को बनाए रखने के लिए काम करते हैं।

यह दिन सिर्फ इतिहास याद करने का नहीं, बल्कि सच बोलने की हिम्मत और भाषा की ताक़त को सलाम करने का दिन है।

मेरे विचार…
आज जब हम मोबाइल स्क्रीन पर स्क्रॉल करते हुए किसी समाचार पोर्टल की हेडलाइन पढ़ते हैं, तो हमें ये याद रखना चाहिए कि किसी ने कभी बिना संसाधनों के, बिना समर्थन के, सिर्फ अपने विश्वास के बल पर ये रास्ता शुरू किया था।

पंडित जुगल किशोर शुक्ल और उदन्त मार्तंड हमें याद दिलाते हैं कि भाषा सिर्फ अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि आत्मा की आवाज़ होती है।

“हिंदी पत्रकारिता दिवस पर उन सभी शब्दवीरों को नमन, जिनकी कलम ने सच को आवाज़ दी।”


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