प्रेम की अधूरी पराकाष्ठा

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लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना

“प्रेम की अधूरी पराकाष्ठा”:
“वह प्रेम जो अपनी गहराई, पवित्रता और निस्वार्थता में सर्वोच्च था — पर फिर भी अधूरा रह गया।”

साल 2014 की जुलाई थी। मौसम बरसात का था और मन भीगने को तैयार। यूनिवर्सिटी का तीसरा साल चल रहा था। लाइब्रेरी की खिड़की के पास बैठा मैं, किताब से ज़्यादा बाहर गिरती बारिश को देख रहा था। तभी पहली बार वो आई — आमना।

न ज़्यादा सज-धज, न बनावटी मुस्कान — बस एक सादगी थी उसके चेहरे पर, जैसे बरसात में खिला कोई कच्चा फूल। हाथ में किताब थी — “गोदान” — और आँखों में वो गहराई, जो पहली नज़र में ठहर जाए।

वो हिंदी साहित्य की छात्रा थी और मैं मनोविज्ञान का विद्यार्थी। एकदम अलग विषय, पर शायद किसी अध्याय में हमारी कहानी पहले ही लिख दी गई थी। रोज़ वो लाइब्रेरी आती, वही किताबें, वही सीट, वही चुप्पी… और मैं, अपनी किताब लिए उसका इंतज़ार करता।

हमारी पहली बातचीत बड़ी मामूली सी थी —
“क्या ये सीट खाली है?”
मैंने मुस्कराकर सिर हिलाया — “हाँ।”

उस एक हाँ के बाद, जैसे मौन का रिश्ता बन गया। बातों की जगह मुस्कुराहटों ने ली, और पन्नों की आवाज़ें हमारे बीच की बातचीत बन गईं।

आमना अक्सर “प्रेमचंद”, “महादेवी वर्मा” या “निराला” की कविताएँ पढ़ती। और मैं उसकी पढ़ने की अदा देखता। जब वो शब्दों में डूबी होती, तो लगता जैसे कोई कविता चलती हुई देख रहा हूँ।

एक दिन उसने मुझसे पूछा,
“क्या प्रेम आत्मा को शिक्षित कर सकता है?”

मैं कुछ देर चुप रहा, फिर बस एक पंक्ति में जवाब दिया —
“प्रेम जब मौन होता है, तब सबसे गहरा होता है।”

शायद उसी दिन से हमारी अनकही कहानी शुरू हुई।
हमने कभी एक-दूसरे को आई लव यू नहीं कहा।
न कोई डेट, न हाथों में हाथ — बस चाय के कप, नोट्स के पन्ने और लाइब्रेरी की खामोशियां।

कभी-कभी कॉलेज कैंपस में टहलते हुए बातें हो जाती थीं। वो बताती थी कि वो गाँव की रहने वाली है, और पढ़-लिखकर बच्चों को पढ़ाना चाहती है। उसकी बातें गाँव की मिट्टी जैसी थीं — सादगी से भरी, भरोसे से लिपटी हुई।

मैं शहर में पला-बढ़ा था, लेकिन उसकी बातों में जो अपनापन था, वो मुझे शहर की चकाचौंध में कभी नहीं मिला था।

हमारी पढ़ाई पूरी हुई। मैं रिसर्च के लिए दिल्ली चला आया और वो छत्तीसगढ़ के एक दूरस्थ गाँव में सरकारी स्कूल में शिक्षिका बन गई।

शुरुआत में हम ह्वाट्सऐप करते थे —
वो गाँव के बच्चों की शरारतें बताती, मैं दिल्ली की दौड़भाग।
कभी-कभी वो लिखती —
“यहाँ के बच्चे तोतली ज़ुबान में ‘गुरुजी’ कहते हैं, सुनकर दिल पिघल जाता है…”

मैं जवाब में लिखता —*”यहाँ मेट्रो की भीड़ में सुकून नहीं मिलता,
तुम्हारी चुपचपी में जो था, वो अब कहीं नहीं है।”

धीरे-धीरे ह्वाट्सऐप भी कम होते गए। शायद समय ने संवाद की जगह खामोशी को दे दी थी।
हमने झगड़ा नहीं किया, कोई शिकायत नहीं थी — बस ज़िंदगी आगे बढ़ रही थी।

फिर एक दिन डाक से एक पीला लिफ़ाफ़ा आया।
खुलते ही उसकी शादी का निमंत्रण था।

नाम पढ़ते ही सब थम गया।
मैं देर तक उसे देखता रहा —
कुछ लिखा नहीं, कुछ कहा नहीं — बस आँखें भीगती रहीं।

शादी में नहीं गया।
पर उसके गाँव ज़रूर गया —
उस स्कूल के बाहर, जहाँ वो बच्चों को पढ़ाती थी।
एक पुराने पेड़ के नीचे बैठकर
वो आख़िरी ईमेल पढ़ा जो उसने भेजा था:

“तुम्हारे बिना भी मैं पढ़ रही हूँ, और पढ़ा रही हूँ।
पर तुम्हारे साथ जो पढ़ा था, वो आज भी सबसे गहरा था।”

उस दिन मैंने महसूस किया कि
प्रेम सिर्फ साथ रहने का नाम नहीं,
कभी-कभी सबसे सच्चा प्रेम वो होता है
जो बिना कहे… बिना माँगे… बिना पाये…
बस एक एहसास बनकर ज़िंदगी भर साथ चलता है।

मैंने उसे कभी आई लव यू नहीं कहा,
क्योंकि डर था —
अगर कह दिया तो जो चुपचाप सुंदर है, वो टूट न जाए।

आज जब मैं किताब लिख रहा हूँ,
तो उसका नाम नहीं लिखा,
पर हर पंक्ति में वो है।
उसकी मुस्कुराहट, उसकी खामोशी,
उसकी अनकही बातें — सब कुछ।

“मैं जब भी किताब लिखूँगा,
तो एक बात ज़रूर लिखूँगा —
कि प्रेम अपनी पराकाष्ठा पर तब तक रहता है
जब तक इज़हार न हो।”

हम जितने वेग से एक-दूसरे के नज़दीक आए थे,
उतने वेग से दूर नहीं जा सके।
हमें मानसिक रूप से दूर जाने में
आज भी एक ज़माना लग रहा है।

ये कोई अधूरी प्रेम कहानी नहीं थी…
बल्कि एक पूरी शिक्षा थी —
जो किताबों में नहीं मिलती,
जो शब्दों से परे है,
और जो आज भी मेरे अंदर
कहीं गहराई में जीवित है।


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