शब्दों का संस्कार: जब भाषा से मर्यादा हटने लगे

लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना भारत, एक ऐसा देश जो अपनी सभ्यता, संस्कृति और संस्कारों के लिए विश्वविख्यात रहा है। यहाँ की मिट्टी से लेकर यहाँ की बोली तक में एक खास तरह की आत्मीयता, विनम्रता और मर्यादा झलकती थी। हम बचपन से सुनते आए हैं — वाणी में मधुरता होनी चाहिए, क्योंकि शब्दों…

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“खून का यह रंग शर्म नहीं, समझ की ज़रूरत है”

आता तो हर महीने है… कुछ दिन साथ भी रहता है… लेकिन कोई उससे बात नहीं करता। कोई उसके बारे में बात नहीं करना चाहता।वो चुपचाप आता है… दर्द, असहजता, और डर साथ लाता है…कभी स्कूल की छुट्टी बनकर, तो कभी आत्म-संकोच का कारण बनकर।उसका नाम लेना भी ‘शर्म’ समझा जाता है, जैसे कोई अपराध…

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“सुराही की ठंडकता हो रही ग़ायब”

लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना गर्मी का मौसम था, आसमान से जैसे आग बरस रही थी। दोपहर में सन्नाटा ऐसा कि पत्ते भी हिलने से डरते थे। मगर हमारे घर के आँगन में उस खामोशी को तोड़ने वाले कुछ स्थायी साथी थे—एक पुराना कुआँ, आम का पेड़, और एक सुराही, जो हर साल की…

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हुंकारू: कहानियों की धड़कन

80-90 के दशक की वो सुनहरी शामें, जब गांव की मिट्टी में खेलने के बाद बच्चों के पैर धूल से सने होते थे और घर के आंगन में चौपाल लगती थी। चूल्हे से उठता धुंआं, और दादा-दादी, नाना-नानी के होठों से बहती कहानियों का जादू। दिनभर के काम के बाद, थके हुए शरीर और तरोताज़ा…

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जेब वाली दादी और पर्स वाली दीदी

लेखक- एम बी बलवंत सिंह खन्ना गाँव की सुबहें अब भी वैसी ही होती हैं — धीमी, शांत, और धूप की नर्म चादर ओढ़े हुए। लेकिन समय का चेहरा बदल चुका है। अब हर आँगन में मोबाइल की घंटियाँ सुनाई देती हैं, और बच्चों के हाथों में खिलौनों की जगह स्क्रीन चमकती है। उस दिन…

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हम अब भी कपड़ों से इंसान पहचानते हैं…

लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना सुबह की भागदौड़ भरी उस घड़ी में मैंने शायद ये नहीं सोचा था कि आज का दिन मुझे एक ऐसा अनुभव देगा, जो समाज की सोच पर सवाल उठा देगा।रायपुर की सेजबहार स्थित मेरी कॉलोनी गोल्फ ग्रीन में बीती रात आए आंधी-तूफान ने बिजली व्यवस्था ठप कर दी। हमारी…

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“जहाँ नामों में गांव बसता है”

गांव के पूरब कोने में, जहाँ अब भी महुआ के पेड़ हर वसंत अपनी चुप खुशबू बिखेरते हैं, वहीं मिट्टी की दीवारों से घिरा एक पुराना सा घर खड़ा है। छप्पर कुछ झुक चुका है, दीवारों पर समय की दरारें उभर आई हैं, मगर आंगन अब भी वैसा ही साफ और पवित्र लगता है, जैसा…

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“शहर के सीने में सपने”

सूरज की पहली किरणें जैसे ही पहाड़ियों से उतरकर धरती को छूने लगीं, गाँव की पगडंडियों पर हल्की धूल उड़ने लगी। सुदर्शन, बाईस साल का एक युवक, पास की पहाड़ी पर बैठा दूर तक फैले खेतों और झोपड़ियों को निहार रहा था। यह वही गाँव था जहाँ उसकी जड़ें थीं, पर आज उसका मन कुछ…

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“क्लिक से रिश्ता, दस्तख़त से जुदाई”

(एक कहानी, जो हज़ारों के आईने में खुद को देखती है) रुचि कभी ज़्यादा बोलने वाली नहीं थी। लेकिन उसकी चुप्पी में वो सब था, जो शब्द कभी कह नहीं पाते। माँ के मस्तिष्क में उभरते हुए सफ़ेद बाल और पिताजी की झुकी हुई पीठ के बीच, उसने अपने सपनों को तह करके अलमारी के…

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“क्लिक से रिश्ता, दस्तख़त से जुदाई”

“क्लिक से रिश्ता, दस्तख़त से जुदाई”(एक कहानी, जो हज़ारों के आईने में खुद को देखती है) रुचि कभी ज़्यादा बोलने वाली नहीं थी। लेकिन उसकी चुप्पी में वो सब था, जो शब्द कभी कह नहीं पाते। माँ के मस्तिष्क में उभरते हुए सफ़ेद बाल और पिताजी की झुकी हुई पीठ के बीच, उसने अपने सपनों…

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