“पलास के फूलों की परंपरा”

गाँव की गलियाँ होली के रंग में डूबी रहती थीं, जब चारों तरफ़ से ढोलक की धुन और होली के गीत गूंजते थे। 90 के दशक में होली की एक खास बात थी – यह त्योहार सिर्फ़ हंसी-खुशी का नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ सामंजस्य और भाईचारे का प्रतीक भी था। उस समय की होली…

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“शब्दों की धरोहर: एक लेखक की यात्रा नवभारत से डिजिटल युग तक”

“शब्दों की धरोहर: एक लेखक की यात्रा नवभारत से डिजिटल युग तक” करीब बीस साल पहले की बात है, जब हर सुबह हमारे घर में नवभारत अखबार का आना एक पारिवारिक रिवाज था। अखबार के पन्नों में खबरें तो होतीं, लेकिन मेरे लिए सबसे प्रिय हिस्सा था—शब्दावली वाला पृष्ठ। जैसे ही अखबार मेरे हाथ में…

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“भोलेनाथ का आशीर्वाद: प्रेम और विश्वास की अनंत शक्ति”

छोटे से गांव में एक साधारण और निश्चल व्यक्ति रहता था जिसका नाम रामू था। रामू का जीवन कठिनाइयों से भरा था। बचपन में ही उसने अपने माता-पिता को खो दिया था और उसका पालन-पोषण उसकी बूढ़ी दादी ने किया। वह बचपन से ही सरल, निर्दोष और दूसरों की मदद करने में हमेशा आगे रहता…

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खंडहर होती यादें

विगत दिनों पिता जी का 86 वर्ष की आयु में स्वर्गवास हो गया। आज गाँव में उनकी तेरहवीं पूरी विधि-विधान से सम्पन्न की गई। पिता जी की आखिरी साँसें शहर के हमारे घर पर निकलीं, लेकिन उनका मन हमेशा गाँव में ही बसा था। उम्र के आखिरी पड़ाव पर, मजबूरी में हमें उन्हें शहर लाना…

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“शांति निवास: एकता की विरासत”

सर्दियों की ठिठुरती शाम थी। गाँव के एक कोने में एक पुराना सा, मिट्टी की दीवारों और खपरैल की छत वाला बड़ा घर था। इस घर में वर्षों से एक संयुक्त परिवार निवास करता था। चार पीढ़ियों का एक साथ होना उस घर की खासियत थी। बड़े-बुज़ुर्गों से लेकर छोटे बच्चों तक, सब एक ही…

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साधराम की यादों का कोठार

छत्तीसगढ़ के जांजगीर जिले के पामगढ़ तहसील के गाँव हिर्री की मिट्टी में एक पुराना और साधारण परिवार बसा हुआ था, जो पिछले कई पीढ़ियों से इस गाँव में निवासरत हैं। इस परिवार की कहानी साधराम से शुरू होती है, जो 70 वर्ष का किसान था। उसका जीवन सादगी और अनुभव का अनूठा उदाहरण था।…

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