“अगर भटकी पत्नी हो…!!”

(मातृ शक्ति से मानव शक्ति तक की यात्रा) लेखक: एम. बी. बलवंत सिंह खन्ना पिछले सप्ताह जब मेरी कहानी “ओ री पत्नी” प्रकाशित हुई, तो अनेक पाठकों ने सराहना की। सबने माना कि एक स्त्री, एक पत्नी, किस तरह अपने प्रेम, धैर्य और मौन से टूटते रिश्ते को सँभाल लेती है।पर उसी प्रशंसा के बीच…

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“शाटीदार – एक विलुप्त होती परंपरा और शिक्षा का उजाला”

लेखक – एम. बी. बलवंत सिंह खन्ना ©️ गाँवों की एक पुरानी परंपरा थी-शाटीदारएक ऐसा पद, जो न कहीं दर्ज था, न किसी काग़ज़ में, लेकिन हर परिवार –हर समाज के सुख दुख का कार्यक्रम इसी के भरोसे चलती थी।वो समय जब न मोबाइल था, न व्हाट्सएप, न कोई इवेंट मैनेजमेंट किसी घर में छट्ठी…

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मिस्टर नंबर चोर

लेखक: एम. बी. बलवंत सिंह खन्ना ©️ वो वक्त था जब प्यार के लिए सोशल मीडिया नहीं, साहस और संयोग की ज़रूरत होती थी।जब मोहब्बतें चिट्ठियों से चलती थीं और मोबाइल नाम का चमत्कार शहरों के साथ गांवों में दस्तक दे रहा था।साल था 2008 जब हर हाथ में की-पैड मोबाइल आने लगे थे जिसमे…

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भारत की बेटी का अभ्युदय: संघर्ष से शिखर तक

लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना आज भारतीय इतिहास की नई प्रभात है। वह क्षण, जब करोड़ों हृदयों ने गर्व की धड़कन महसूस की। भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने पहली बार अंतरराष्ट्रीय विश्व कप जीतकर यह प्रमाणित कर दिया — सपनों का कोई लिंग नहीं होता, केवल समर्पण और साहस होता है।यह विजय केवल खेल…

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अफ़ेयर – मन की अधूरी भूख या रिश्तों की अनकही पुकार?

लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना अफ़ेयर — यह शब्द जितना आकर्षक लगता है, उतना ही समाज में विवादों से घिरा हुआ भी है।कई लोग इसे पाप कहते हैं, कुछ गलती मानते हैं, और कुछ इसे प्रेम का एक और रूप।पर सच यह है कि यह विषय न केवल मानवीय भावनाओं की गहराई से जुड़ा…

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“वो दीवाली, जब बिना स्टेटस लगाए भी त्योहार मनते थे”

लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना रात के आठ बजे थे, मोहल्ले में झिलमिल करती लाइटों की कतारें टिमटिमा रही थीं, लेकिन दिल में कहीं एक खालीपन था। खिड़की से बाहर देखा- बच्चे मोबाइल में व्यस्त थे, कोई वीडियो बना रहा था, कोई नए पटाखों का शो दिखा रहा था। चमक ज़रूर थी, पर न…

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मेरे घर की खिड़की

“लेखक:एम बी बलवंत सिंह खन्ना” बचपन की स्मृतियाँ कभी-कभी यूँ लौट आती हैं जैसे हवा का कोई झोंका अचानक मन को छू जाए। मुझे आज भी याद है, जब होश संभाला था, तब गाँव की हर सुबह किसी उत्सव से कम नहीं होती थी। चारों ओर हरियाली, खेतों में लहलहाती फसलें, खुले मैदान पर खेलते…

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हॉस्टल डायरी- ‘अधूरे एहसासों से पूरी हुई कहानी’

लेखक- एम बी बलवंत सिंह खन्ना छोटे से कस्बे की साक्षी जब पहली बार शहर आई, तो उसके मन में उत्साह और डर दोनों थे। गाँव की गलियों से निकलकर विश्वविद्यालय के बड़े दरवाज़े तक पहुँचना उसके लिए किसी सपने से कम नहीं था। परिवार ने उसे हमेशा संस्कार और सादगी का पाठ पढ़ाया था,…

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गरबा की रात और अधूरी दुआ

लेखक एम बी बलवंत सिंह खन्ना शरद नवरात्रि का मौसम था। पूरे शहर में उत्सव का आलोक बिखरा हुआ था। पंडालों में देवी दुर्गा की प्रतिमाएं विराजमान थीं, तो कहीं कॉलोनियों और मैदानों में गरबा की धुन गूंज रही थी। गाँव से निकला कुमार अब शहर में पढ़ाई कर रहा था। बचपन में वह माँ…

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“गाँव छोड़ शहर क्यों? क्या अपने सपनों को जन्मभूमि में ही साकार कर सकते हैं?”

लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना आज भारत के गाँवों से युवाओं का शहरों की ओर पलायन एक आम दृश्य बन गया है। गाँव की मिट्टी से उठकर कोई बच्चा जब कड़ी मेहनत से पढ़ाई करता है तो उसका सपना होता है कि वह अपने परिवार का जीवन बदल दे। लेकिन सच यह है कि…

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