“शाटीदार – एक विलुप्त होती परंपरा और शिक्षा का उजाला”

लेखक – एम. बी. बलवंत सिंह खन्ना ©️ गाँवों की एक पुरानी परंपरा थी-शाटीदारएक ऐसा पद, जो न कहीं दर्ज था, न किसी काग़ज़ में, लेकिन हर परिवार –हर समाज के सुख दुख का कार्यक्रम इसी के भरोसे चलती थी।वो समय जब न मोबाइल था, न व्हाट्सएप, न कोई इवेंट मैनेजमेंट किसी घर में छट्ठी…

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भारत की बेटी का अभ्युदय: संघर्ष से शिखर तक

लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना आज भारतीय इतिहास की नई प्रभात है। वह क्षण, जब करोड़ों हृदयों ने गर्व की धड़कन महसूस की। भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने पहली बार अंतरराष्ट्रीय विश्व कप जीतकर यह प्रमाणित कर दिया — सपनों का कोई लिंग नहीं होता, केवल समर्पण और साहस होता है।यह विजय केवल खेल…

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“छत्तीसगढ़िया वाद: सादगी को कमजोरी मत समझिए”

लेखक: एम बलवंत सिंह खन्ना सादर नमन उस धरती को, जिसने सत्य, संतुलन और संवाद को हमेशा जीवन का मूल माना- छत्तीसगढ़।यह वही भूमि है जहाँ संत बाबा गुरु घासीदास जी ने जन्म लेकर मनखे-मनखे एक समान का संदेश दिया; जहाँ शहीद वीर नारायण सिंह ने अत्याचार के विरुद्ध आवाज़ उठाई; जहाँ डॉक्टर खुबचंद बघेल…

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अफ़ेयर – मन की अधूरी भूख या रिश्तों की अनकही पुकार?

लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना अफ़ेयर — यह शब्द जितना आकर्षक लगता है, उतना ही समाज में विवादों से घिरा हुआ भी है।कई लोग इसे पाप कहते हैं, कुछ गलती मानते हैं, और कुछ इसे प्रेम का एक और रूप।पर सच यह है कि यह विषय न केवल मानवीय भावनाओं की गहराई से जुड़ा…

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“वो दीवाली, जब बिना स्टेटस लगाए भी त्योहार मनते थे”

लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना रात के आठ बजे थे, मोहल्ले में झिलमिल करती लाइटों की कतारें टिमटिमा रही थीं, लेकिन दिल में कहीं एक खालीपन था। खिड़की से बाहर देखा- बच्चे मोबाइल में व्यस्त थे, कोई वीडियो बना रहा था, कोई नए पटाखों का शो दिखा रहा था। चमक ज़रूर थी, पर न…

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मेरे घर की खिड़की

“लेखक:एम बी बलवंत सिंह खन्ना” बचपन की स्मृतियाँ कभी-कभी यूँ लौट आती हैं जैसे हवा का कोई झोंका अचानक मन को छू जाए। मुझे आज भी याद है, जब होश संभाला था, तब गाँव की हर सुबह किसी उत्सव से कम नहीं होती थी। चारों ओर हरियाली, खेतों में लहलहाती फसलें, खुले मैदान पर खेलते…

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“तू जा, मैं संभाल लूँगा”

लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना क्या एक पति का अपनी पत्नी से यह कहना-“तू जा, मैं संभाल लूँगा”- सिर्फ़ एक भावनात्मक वाक्य है? या यह एक नई सामाजिक क्रांति की दस्तक है? यह सवाल हमें उस दौर में ले जाता है जहाँ सदियों से पुरुषों को परिवार का “कमाने वाला” और स्त्रियों को “घर…

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“गाँव छोड़ शहर क्यों? क्या अपने सपनों को जन्मभूमि में ही साकार कर सकते हैं?”

लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना आज भारत के गाँवों से युवाओं का शहरों की ओर पलायन एक आम दृश्य बन गया है। गाँव की मिट्टी से उठकर कोई बच्चा जब कड़ी मेहनत से पढ़ाई करता है तो उसका सपना होता है कि वह अपने परिवार का जीवन बदल दे। लेकिन सच यह है कि…

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सुंदरम

लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना रिश्तों की दुनिया बड़ी अजीब होती है। कुछ रिश्ते खून से बनते हैं, कुछ समाज से, और कुछ अनजाने ही दिल की गहराइयों में पनप जाते हैं। ये वही रिश्ते होते हैं जिनके नाम नहीं होते, पर उनकी मौजूदगी हर पल महसूस होती है। राघव और अवनि का रिश्ता…

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माँ की गोद से बड़ा कोई सुकून नहीं

लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना गाँव की कच्ची गलियों से जब भी सूरज की सुनहरी किरणें छनकर आतीं, तो लगता जैसे हर ईंट, हर पेड़ और हर छप्पर में जीवन साँस ले रहा हो। यही गाँव था जहाँ कुमार का जन्म हुआ था। मिट्टी की खुशबू, बैलों की घंटियाँ, कुएँ पर खनकते घड़ों की…

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