लेखक एम बी बलवंत सिंह खन्ना
शरद नवरात्रि का मौसम था। पूरे शहर में उत्सव का आलोक बिखरा हुआ था। पंडालों में देवी दुर्गा की प्रतिमाएं विराजमान थीं, तो कहीं कॉलोनियों और मैदानों में गरबा की धुन गूंज रही थी।
गाँव से निकला कुमार अब शहर में पढ़ाई कर रहा था। बचपन में वह माँ के साथ गाँव के जगराते में बैठा करता था, जहाँ ढोलक की थाप पर जस गीत गाए जाते और पूरी रात माता रानी की महिमा का गुणगान होता। पर अब शहर में आने के बाद उसकी दुनिया बदल चुकी थी। पढ़ाई, प्रतियोगिता और आधुनिकता के बीच उसने धीरे-धीरे खुद को शहर के रंग में ढाल लिया था।
उस साल नवरात्रि के दूसरे दिन उसकी मुलाकात प्रियल से हुई। यह मुलाकात अचानक हुई थी—शहर के सबसे बड़े गरबा मैदान पर। कुमार अपने दोस्तों के साथ आया था और प्रियल अपनी सहेलियों संग। दोनों अलग-अलग कॉलेज के छात्र थे, लेकिन शायद नियति को यही मंजूर था कि वे माता रानी की आराधना और गरबा की चमकदार रात में पहली बार एक-दूसरे से टकराएं।

पहली मुलाकात में सिर्फ नामों का आदान-प्रदान हुआ, लेकिन कुछ तो था उस पल में, जो दिलों के किसी कोने में हल्का-सा कंपन छोड़ गया।
अगले दिन फिर वही मैदान, वही धुन—ढोल-ताशे की आवाज़, झिलमिलाती रोशनियाँ, और भीड़ के बीच दो नज़रें जैसे खोजती हुई मिल गईं। धीरे-धीरे यह सिलसिला चल पड़ा। कभी एक-दूसरे को ढूँढने की कोशिश, कभी मुस्कुराकर नज़रें चुराना, तो कभी बस हाथ हिलाकर हालचाल पूछ लेना।
कुमार को लगता था जैसे देवी दुर्गा ने ही उसे कोई संकेत दिया हो। प्रियल के चेहरे पर सादगी और आत्मविश्वास था। वहीं प्रियल को कुमार का सीधा-सादा व्यवहार भा गया।
नवरात्रि के पाँचवें दिन, गरबा की धुन पर अचानक तेज़ बारिश शुरू हो गई। लोग पंडाल की ओर भागने लगे। उसी अफरातफरी में कुमार और प्रियल आमने-सामने आ गए। भीगते हुए दोनों हँस पड़े।
कुमार ने झिझकते हुए कहा,
“शायद माँ रानी हमें मिलवाने का ही बहाना ढूँढ रही थीं।”
प्रियल हल्का-सा मुस्कुरा दी। वह मुस्कान जैसे दिल में उतर गई।
दिन गुज़रते गए, और नवरात्रि समाप्त हो गई। परंतु दोनों की कहानी वहीं से शुरू हुई थी। वे मिलने लगे—कॉफ़ी शॉप, कॉलेज कैंटीन, लाइब्रेरी… बातों का सिलसिला बढ़ता गया।
कुमार को लगता, जैसे उसने अपना जीवनसाथी पा लिया है। प्रियल भी उसके साथ सहज थी। परंतु उसने अब तक कभी अपने परिवार के बारे में खुलकर बात नहीं की थी।
एक दिन कुमार ने पूछा,
“तुम्हारे घरवालों को पता है मेरे बारे में?”
प्रियल ने चुप्पी साध ली। कुछ देर बाद उसने कहा,
“अभी नहीं… लेकिन सही समय आने पर सब बता दूँगी।”
कुमार ने इस बात को हल्के में लिया। उसे लगा कि सबकुछ समय के साथ ठीक हो जाएगा।
साल गुज़रता गया। परीक्षा, प्लेसमेंट, और करियर की दौड़ के बीच उनका रिश्ता और मज़बूत हो गया। वे दोनों साथ मंदिर जाते, गरबा नृत्य करते, और हर बार माँ दुर्गा से यही प्रार्थना करते कि उनका साथ कभी न टूटे।
एक दिन, विजयादशमी की शाम को, प्रियल ने अचानक कहा,
“कुमार, अगर कल मैं तुम्हारी ज़िंदगी से चली जाऊँ तो?”
कुमार चौंक गया।
“ये कैसी बात कर रही हो? ऐसा कभी मत कहना।”
प्रियल की आँखों में हल्की नमी थी, पर उसने मुस्कान से उसे छुपा लिया।
“बस यूँ ही… सोचा पूछ लूँ।”
कुमार ने उसका हाथ पकड़कर कहा,
“हमारा रिश्ता सिर्फ़ यहाँ तक सीमित नहीं है। ये माँ रानी की मर्जी से बना है। याद है श्लोक?
‘या देवी सर्वभूतेषु श्रद्धारूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥’
तुम पर मेरा विश्वास अटूट है, जैसे माँ पर।”
प्रियल ने कुछ नहीं कहा, बस नज़रें झुका लीं।
समय बदला। पढ़ाई पूरी होते ही कुमार को शहर में नौकरी मिल गई। उसने प्रियल से शादी की बातें शुरू कीं। पर हर बार प्रियल टाल जाती।
आख़िरकार एक दिन उसने सच बता ही दिया।
“कुमार, मैं तुमसे कुछ छुपा रही थी। मेरा परिवार बहुत परंपरागत है। उन्होंने मेरी शादी तय कर दी है… और वो तुम्हारे साथ नहीं है।”
कुमार पर जैसे बिजली गिर गई।
“तो अब तक तुमने मुझे उम्मीद क्यों दी?”
प्रियल की आँखों से आँसू बह निकले।
“क्योंकि मैं भी तुम्हें खोना नहीं चाहती थी। पर मैं बग़ावत भी नहीं कर सकती।”
कुमार गुस्से और दुख से भर गया।
“तो हमारा रिश्ता बस इन रोशनियों और गरबा की रातों तक ही था?”
प्रियल ने धीमे स्वर में कहा,
“नहीं कुमार… ये रिश्ता मेरी आत्मा में है। भले मैं तुम्हारे साथ जीवन न बिता पाऊँ, पर तुम्हें हमेशा अपने दिल में रखूँगी।”
कुछ दिन बाद, प्रियल अपने घर लौट गई। कुमार टूट चुका था। उसने खुद को नौकरी और अकेलेपन में झोंक दिया।
नवरात्रि का अगला साल आया। शहर फिर से रोशनी से जगमगा उठा। गरबा की धुन गूंज रही थी। कुमार भी दोस्तों के ज़ोर देने पर मैदान पहुँचा।
वहाँ भीड़ में, रोशनी के बीच, उसे एक जाना-पहचाना चेहरा दिखा। दिल की धड़कनें तेज़ हो गईं। पर जब पास गया, तो पाया कि वह प्रियल नहीं थी-बस उससे मिलती-जुलती कोई और लड़की थी।
उसने महसूस किया कि यादें कभी सचमुच नहीं जातीं। वे चेहरे, मुस्कान और बातें-सब दिल में कहीं अंकित रह जाती हैं।
उस रात कुमार गरबा मैदान से बाहर निकला, मंदिर की ओर गया और माँ दुर्गा के सामने हाथ जोड़कर प्रार्थना की।
“माँ, आपने प्रियल को मेरी ज़िंदगी में भेजा, और फिर दूर कर दिया। शायद यही आपकी मर्जी थी। अब मैं यही दुआ करता हूँ-वह जहाँ भी हो, खुश रहे।”
मंदिर में गूँज रही आरती के बीच उसे शांति मिली।
कहानी से सीख- कुमार और प्रियल की कहानी अधूरी रही, पर इसने एक बात सिखा दी-प्यार सिर्फ़ साथ रहने का नाम नहीं, बल्कि किसी की खुशी में अपनी दुआएँ जोड़ देने का नाम है। जीवन में हर रिश्ता हमें कुछ सिखाने आता है। कभी वह पूर्ण होता है, तो कभी अधूरा रहकर भी हमारी आत्मा का हिस्सा बन जाता ह
जैसे नवरात्रि का संदेश है-“सत्य और भक्ति का मार्ग कठिन हो सकता है, पर अंततः वही जीवन को शांति देता है।”
कुमार ने सीखा कि प्रेम त्याग से भी पवित्र हो सकता है। और यही शायद माँ दुर्गा की असली सीख है-आस्था, विश्वास और समर्पण।
