साधराम की यादों का कोठार

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छत्तीसगढ़ के जांजगीर जिले के पामगढ़ तहसील के गाँव हिर्री की मिट्टी में एक पुराना और साधारण परिवार बसा हुआ था, जो पिछले कई पीढ़ियों से इस गाँव में निवासरत हैं। इस परिवार की कहानी साधराम से शुरू होती है, जो 70 वर्ष का किसान था। उसका जीवन सादगी और अनुभव का अनूठा उदाहरण था। साधराम के पास कई एकड़ ज़मीन थी, जहां वह धान के साथ दलहन और तिलहन की फसलें उगाता था। खेत और कोठार से उसका संबंध उस समय से था जब उसने होश संभाला था।

गाँव में साधराम की इज़्ज़त थी, और उसके अनुभवों ने उसे कृषि के हर पहलू में निपुण बना दिया था। पढ़ाई के लिए स्कूल कभी नहीं गया, परंतु उसने ज़िंदगी और खेती का हर पाठ खेतों से ही सीखा। साधराम ने अपने बच्चों को पढ़ा-लिखाकर शहरों में ऊँचे पदों पर बिठा दिया था। बच्चों की सफलताएँ उसकी मेहनत का फल थीं, परंतु उसके जीवन की यह चमकदार छवि एक गहरी मायूसी को छुपाए हुए थी।

साधराम के बच्चे अब शहरों में बस चुके थे। गाँव की पगडंडियाँ, खेत और कोठार, जो कभी उसके बच्चों की हँसी-खुशी से गूँजते थे, अब सूनसान और उदास हो चले थे। साधराम का पूरा जीवन खेतों में बीता था। जब वह बच्चा था, तब उसके पिता के साथ कोठार में जाकर फ़सल के ढेर को देखते हुए उसकी आँखों में एक अलग सी चमक होती थी।

कोठार, जिसे गाँव के लोग अपनी फ़सलों को साफ़ और संग्रहित करने के लिए इस्तेमाल करते थे, साधराम के जीवन का अभिन्न हिस्सा था। हर साल जब दीपावली के बाद धान की कटाई शुरू होती थी, तब कोठार का दृश्य देखते ही बनता था। सफ़ाई के बाद कोठार में फ़सल के ढेर लगते जाते थे, और धीरे-धीरे वह पूरा क्षेत्र स्वर्णिम धान से ढक जाता था। साधराम के लिए यह समय सबसे सुखद होता था।

साधराम को याद था कि कैसे उसके पिता के साथ रात को कोठार में बने अस्थाई निवास ‘कुंद्रा’ में सोना पड़ता था। कुंद्रा, जो बांस के तंबू से बना होता था, वह जगह थी जहाँ किसान अपने धान की मिंज़ाई करते थे। रात में आग जलाकर उसके चारों ओर बैठना, ठंड के मौसम में उसकी गर्माहट लेना जिसे आज आप और हम शहरों में बोर्न फायर कहते हैं, पुराने किस्से सुनना, यह साधराम की यादों का अनमोल हिस्सा था। उस समय हर किसान का कोठार जीवंत था, हँसी-खुशी, काम की चहल-पहल और परिवार की मिलन स्थल जैसा लगता था।

लेकिन अब वह दृश्य बदल गया था। पहले जहाँ मैन्युअल काम होता था, अब मशीनों ने उसकी जगह ले ली थी। धान की मिंज़ाई जो हाथों और लकड़ी के बड़े बड़े बेलनों से भैस और बैल के मदद से होती थी, अब बड़े-बड़े हार्वेस्टर आ गए थे। खेतों में और कोठार में जो रौनक़ पहले होती थी, वह अब नहीं रही। किसान भी अब शहरों की ओर पलायन करने लगे थे।

साधराम का दिल इन बदलावों को देखकर भर आया। उसे अब हर दिन यह एहसास होता था कि उसका समय समाप्त हो रहा है। उसकी उम्र ढल रही थी, और उसका जीवन अब उन्हीं यादों में समेटा जा रहा था जो कभी जीवंत थीं। साधराम जानता था कि उसके बाद उसकी ज़मीनें और यह पुराना कोठार धीरे-धीरे बेमतलब हो जाएँगे। हो सकता है कि उसकी जमीने बेंच दी जाएँ या ठेके पर दी जाएँ, पर वह पुरानी जीवंतता और अपनापन शायद कभी लौटकर नहीं आएगा।

वह अकसर कोठार में खड़ा होकर अपने बीते समय को याद करता था। कोठार अब सूना था, उसका बचपन अब केवल यादों में था। फ़सलों की महक, हाथों से की गई मेहनत, और गाँव की खुशियाँ, यह सब अब अतीत का हिस्सा बन गए थे। साधराम की आँखों से आँसू बह निकले। उसे एहसास हो गया था कि जैसे-जैसे समय बीत रहा है, उसकी जिंदगी का वह अंश भी समाप्त हो रहा है जो कभी उसकी पहचान हुआ करता था।

गाँव के लोग अब मशीनों से जुड़े कामों में व्यस्त हो चुके थे। वह हाथों से जोड़े गए संबंधों और मेहनत की महक को कभी न महसूस कर पाएँगे, जो साधराम की पीढ़ी ने महसूस की थी। साधराम के जीवन के कोठार के दिन समाप्त हो रहे थे, और उसके साथ ही एक युग का अंत हो रहा था।

वह जानता था कि आने वाली पीढ़ियाँ इस कोठार को केवल एक पुरानी कहानी के रूप में याद रखेंगी, पर वह अपने दिल में इन यादों को संजोए हुए ही इस दुनिया से जाएगा। उसकी आँखों से गिरते आँसू उसकी गहरी भावनाओं का प्रतीक थे, जो शायद उसकी ही तरह धीरे-धीरे विलुप्त हो रही थीं।


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5 thoughts on “साधराम की यादों का कोठार

  1. गांव के आखिरी पन्नों की कहानी। यह अध्याय अपने अंतिम दौर में है। बहुत सुंदर स्मरण।

    1. कोठार ही नहीं अन्य ग्रामीण परिवेश भी आने वाले दिनों में बस किसी संग्रहालय की वस्तु बन जाएगी..न जाने क्या होगा…शहर दर शहर

  2. साध राम के यादों का कोठार को प्रस्तुत कर ग्रामीण परिवेश को उकेरने और मनोभावों को इसी परिवेश में ले जाकर कोठार तक कि यात्रा कराने के लिए शुक्रिया

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