“गाँव छोड़ शहर क्यों? क्या अपने सपनों को जन्मभूमि में ही साकार कर सकते हैं?”

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लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना

आज भारत के गाँवों से युवाओं का शहरों की ओर पलायन एक आम दृश्य बन गया है। गाँव की मिट्टी से उठकर कोई बच्चा जब कड़ी मेहनत से पढ़ाई करता है तो उसका सपना होता है कि वह अपने परिवार का जीवन बदल दे। लेकिन सच यह है कि शिक्षा पूरी होते ही वह गाँव छोड़ शहर की ओर बढ़ता है। कहा जाता है – “गाँव में गरीब माता-पिता का बच्चा अगर मेहनत से पढ़ाई कर ले तो वह अपने माता-पिता से दूर हो जाता है।” यह सुनने में सामान्य वाक्य है, परंतु इसके पीछे छिपे भाव बेहद मार्मिक हैं।

गाँव में संसाधनों की कमी, सीमित रोज़गार, स्वरोजगार के लिए पूँजी का अभाव और बेहतर सुविधाओं की तलाश युवाओं को शहर की ओर धकेल देती है। प्रारंभ में वह त्योहारों में लौटता है, कुछ समय गाँव में बिताता है, लेकिन धीरे-धीरे शहर ही उसकी स्थायी कर्मभूमि बन जाता है। परिवार शहर में बस जाता है और अगली पीढ़ी गाँव से जुड़ाव खो देती है। गाँव सिर्फ छुट्टियों की याद बनकर रह जाता है।

लेकिन क्या यह स्थिति अनिवार्य है? क्या हम अपने सपनों को अपने गाँव में ही साकार नहीं कर सकते?

शहर की समस्याएँ: क्यों तलाश रहे हैं लोग गाँव की शांति?

आज बड़े शहरों में शोर, ट्रैफिक, प्रदूषण और मानसिक तनाव एक सामान्य समस्या बन चुकी है। पहले शहर के बीचोंबीच घर होना समृद्धि का प्रतीक माना जाता था, अब वही जगह परेशानी का कारण बन गई है।
भारत के आठ बड़े शहरों में शहरी क्षेत्र का आकार 1995 से 2025 तक दोगुना हो चुका है और 2050 तक शहरी आबादी में 330 मिलियन से अधिक का इजाफा होने की आशंका जताई जा रही है। इस बढ़ती आबादी के साथ ट्रैफिक जाम, वायु प्रदूषण और मानसिक तनाव बढ़ रहे हैं।

लोग अब शांति की तलाश में शहरों से दूर आउटर क्षेत्रों या आसपास के गाँवों में बसने लगे हैं। फिर सवाल उठता है — हम गाँव वाले ही क्यों नहीं अपने गाँव में रहकर रोजगार के अवसर तलाशें?

गाँव में रोजगार की संभावनाएँ: एक नया अध्याय

गाँव केवल कृषि तक सीमित नहीं हैं। आज सरकार और समाज मिलकर स्वरोजगार को बढ़ावा देने की दिशा में अनेक योजनाएँ चला रहे हैं।

✔ प्रदेश के कई जिले में ‘लखपति दीदी योजना’ के अंतर्गत हजारों महिलाएँ स्वरोजगार से जुड़ चुकी हैं। यह उदाहरण बताता है कि अगर अवसर दिए जाएँ तो गाँव की महिलाएँ भी आर्थिक रूप से सक्षम बन सकती हैं।

✔ ‘विश्वकर्मा योजना’ में 18 से 45 वर्ष तक के युवाओं को स्वरोजगार शुरू करने के लिए 2 करोड़ रुपये तक के ऋण पर ब्याज में छूट दी जा रही है। इससे ग्रामीण युवाओं को व्यवसाय शुरू करने का मौका मिल रहा है।

✔ डिजिटल प्लेटफॉर्म्स, ऑनलाइन व्यवसाय, कृषि-आधारित उद्यम और स्थानीय कुटीर उद्योग गाँवों में नए रोजगार के रास्ते खोल रहे हैं।

अगर सही प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता, बाजार तक पहुँच और तकनीकी जानकारी उपलब्ध कराई जाए तो गाँव भी आर्थिक गतिविधियों के केंद्र बन सकते हैं।

जन्मभूमि और कर्मभूमि एक साथ: क्या यह सपना सच हो सकता है?

हर व्यक्ति अपने जन्मस्थान से जुड़ा रहता है। कोई भी अपने परिवार से दूर जाना नहीं चाहता। फिर भी परिस्थितियाँ, संसाधनों की कमी और बेहतर अवसरों की तलाश हमें गाँव छोड़ने पर मजबूर कर देती हैं।

क्या हम ऐसा समाज बना सकते हैं जिसमें जन्मभूमि ही कर्मभूमि बन जाए? इसका उत्तर सकारात्मक है – बशर्ते हम मिलकर प्रयास करें।

➡ व्यक्ति को चाहिए कि वह अपने गाँव में उपलब्ध अवसरों की तलाश करे और स्थानीय संसाधनों का उपयोग कर स्वरोजगार या छोटे व्यवसाय शुरू करे।
➡ समाज को चाहिए कि वह युवाओं का साथ दे, उन्हें प्रशिक्षण और सहयोग प्रदान करे।
➡ शासन को चाहिए कि वह गाँव में बुनियादी सुविधाएँ, सड़क, इंटरनेट, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करे।

जब गाँव में ही रोजगार के पर्याप्त अवसर उपलब्ध होंगे, तो पलायन की मजबूरी खत्म हो सकती है।

हमारे सामने चुनौतियाँ भी हैं और अवसर भी

✔ गाँव में पूँजी की कमी, बुनियादी सुविधाओं का अभाव, बाजार तक पहुँच न होना बड़ी बाधाएँ हैं।
✔ लेकिन योजनाओं, सरकारी सहायता, डिजिटल तकनीक और सामूहिक प्रयास से इन समस्याओं का समाधान संभव है।
✔ युवाओं को चाहिए कि वे अपने गाँव में मौजूद संसाधनों का उपयोग करें – जैसे कृषि, पशुपालन, हस्तशिल्प, खाद्य प्रसंस्करण, ऑनलाइन व्यापार आदि।
✔ शिक्षा को केवल नौकरी पाने का साधन न मानकर, स्वयं का व्यवसाय शुरू करने की दिशा में प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।

एक साझा प्रयास की आवश्यकता

गाँव और शहर के बीच पलायन का यह सिलसिला तभी बदलेगा जब हम सब मिलकर सोचें और काम करें। हर परिवार, हर युवा, हर संस्था और हर प्रशासन यदि अपनी भूमिका निभाए तो यह संभव है कि गाँव भी समृद्ध हो, युवाओं को रोजगार मिले और वे अपने माता-पिता के पास रहकर अपने सपनों को साकार कर सकें। आज आवश्यकता है जागरूकता, सहयोग और दीर्घकालिक सोच की। गाँव केवल अतीत की याद नहीं है – यह भविष्य की संभावना भी है। क्यों न हम इसे अवसर में बदलें?


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8 thoughts on ““गाँव छोड़ शहर क्यों? क्या अपने सपनों को जन्मभूमि में ही साकार कर सकते हैं?”

    1. बहुत ही शानदार टॉपिक पर लिखा गया है हम भी गांव से जुड़े हैं तो इस मुद्दा को अच्छे से समझते है इसलिए मैने खुद शहर में न रहकर गांव में रहते हुए शिक्षण का काम कर रही हूं

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