“गुज़र जाना चाहिए”

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(एक ऐसे प्रेम की कहानी, जिसे कोई नाम नहीं चाहिए)

लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना

वो किसी रेलगाड़ी की खिड़की से बाहर देखते हुए अचानक बोला था —
“हम मिलते तो हैं, लेकिन शायद ज़रूरत से ज़्यादा देर के लिए…”

और मैं हँस दी थी, जैसे कोई गंभीर बात को हल्का करना चाहती हो।
हम दोनों जानते थे — यह जो चल रहा है, न नाम है, न जगह, न मंज़िल।

उसका नाम अद्वैत था। मेरी उम्र से कुछ साल बड़ा, शादीशुदा, दो बच्चों का पिता।
मैं अनन्या, अपने तीसवें साल में कदम रखने वाली, एक खाली कमरे में रहने वाली लड़की, जो ऑफिस के बाद देर तक जागती है — कभी किताबों के साथ, कभी ख्यालों के साथ।

हमारी मुलाकातें कभी कैफे में होती थीं, कभी किसी पार्क की बेंच पर।
हम ज़्यादा नहीं बोलते थे। हम बस… साथ रहते थे।
वो मेरी बातों में अपने खोए सपनों को ढूँढता, और मैं उसकी आँखों में वो ठहराव — जो मुझे अपने आस-पास कहीं नहीं मिला था।

हमने कभी एक-दूसरे से वादा नहीं किया।
ना साथ चलने का, ना छूटने से बचने का।
हम दोनों जानते थे — यह सब कुछ एक झोंका है, जो गुज़र जाएगा।

एक दिन उसने अचानक कहा —
“मुझे अब तुमसे मिलना नहीं चाहिए। घर में कोई कुछ पूछता नहीं, फिर भी कुछ छूटता-सा लगता है।”

मैं चुप रही।
मुझे बुरा नहीं लगा।
मुझे समझ आया — कोई किसी का हो भी जाए, तो भी कई बार वो कहीं का नहीं रह जाता।

“कभी-कभी सबसे सच्चे रिश्ते वो होते हैं, जो अधूरे रह जाते हैं।”

हम फिर नहीं मिले।

न मैं उसे खोजने गई, न उसने कोई मैसेज किया।

पर वो था… कहीं था।

मेरी नींद के कोनों में, मेरी कॉफी के स्वाद में, मेरे ऑफिस की लिफ्ट की तीसरी घंटी में…

और शायद मैं भी थी उसकी किसी पुरानी याद में, उसके गीले रूमाल में, बच्चों को सुलाने वाली कहानियों के खाली वक्फ़े में।

न वो बुरा था, न मैं ग़लत।
हम बस दो लोग थे — जो एक दूसरे के जीवन में ऐसे आए जैसे गर्मी में बारिश की एक ठंडी फुहार।
कुछ प्यास बुझाई, कुछ उम्मीद जगाई, और फिर मिट्टी की तरह बैठ गए — शांत, चुपचाप।

कभी-कभी किसी का होना ही सबसे बड़ी बात होती है।
और कभी-कभी किसी का ना होना ही सब कुछ कह जाता है।

कोई रिश्ता अगर नाम नहीं पा सका, तो इसका मतलब यह नहीं कि वो झूठा था।
शायद वो इतना सच्चा था कि किसी नाम के बंधन में नहीं बँध सकता था।

समय का चक्र चलता रहा।
वो अपने घर में लौट गया, मैं अपनी दुनिया में।
कोई शिकायत नहीं, कोई कसक नहीं।

“वो जो चला गया, वो ग़लत नहीं था — बस वक़्त का मेहमान था।”

बस एक एहसास, जो अब भी दिल में पलता है —
कि कुछ लोग हमारी ज़िंदगी में आते हैं, सिर्फ ये बताने के लिए…
कि हमें किसी की ज़रूरत है।

और फिर वो गुज़र जाते हैं…
जैसे बारिश…
जैसे एक मौसम…
जैसे समय — जो गुज़र ही जाना चाहिए।❤️❤️❤️


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