“मेहंदी के रंग में रचा प्रेम”

(A Love Story Rooted in a Moment, Grown by Destiny) लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना “एक प्रेम कहानी — जो एक क्षण में अंकुरित हुई और किस्मत ने उसे सींचा।”वो दिन आज भी मेरे ज़ेहन में वैसे ही महकता है, जैसे कोई भीगी मिट्टी पर पहली बारिश की खुशबू से। मैं 28 वर्ष का…

Read More

“गुज़र जाना चाहिए”

(एक ऐसे प्रेम की कहानी, जिसे कोई नाम नहीं चाहिए) लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना वो किसी रेलगाड़ी की खिड़की से बाहर देखते हुए अचानक बोला था —“हम मिलते तो हैं, लेकिन शायद ज़रूरत से ज़्यादा देर के लिए…” और मैं हँस दी थी, जैसे कोई गंभीर बात को हल्का करना चाहती हो।हम दोनों…

Read More

जब आदि ने अकेले भरी दाखिला की राह: एक शिक्षाप्रद और भावनात्मक अनुभव

लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना एक छोटे से कस्बे में जन्मा आदि, एक ऐसा लड़का था जो पढ़ाई में ठीक-ठाक था। परिवार में पढ़ाई का माहौल था, सभी लोग शिक्षित थे, लेकिन बड़े शहरों जैसी जानकारी और संसाधन नहीं थे। आदि के जीवन में सबसे बड़ा मोड़ उस समय आया जब उसने 12वीं कक्षा…

Read More

प्रेम की अधूरी पराकाष्ठा

लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना “प्रेम की अधूरी पराकाष्ठा”:“वह प्रेम जो अपनी गहराई, पवित्रता और निस्वार्थता में सर्वोच्च था — पर फिर भी अधूरा रह गया।” साल 2014 की जुलाई थी। मौसम बरसात का था और मन भीगने को तैयार। यूनिवर्सिटी का तीसरा साल चल रहा था। लाइब्रेरी की खिड़की के पास बैठा मैं,…

Read More

आधुनिक जीवन शैली में कमजोर पड़ते पारिवारिक नाते-रिश्ते: एक सांस्कृतिक यात्रा पाषाण युग से 21वीं सदी तक

लेखक- एम बी बलवंत सिंह खन्ना मानव सभ्यता की यात्रा एक बहुत लंबी और गहन प्रक्रिया रही है। पाषाण युग से लेकर आज की 21वीं सदी तक, इंसान ने जीवन के हर क्षेत्र में विकास किया है—रहन-सहन, तकनीक, शिक्षा, चिकित्सा, संचार, और सबसे अधिक सामाजिक संरचना में। परंतु इस प्रगति के बीच एक बात जो…

Read More

शब्दों का संस्कार: जब भाषा से मर्यादा हटने लगे

लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना भारत, एक ऐसा देश जो अपनी सभ्यता, संस्कृति और संस्कारों के लिए विश्वविख्यात रहा है। यहाँ की मिट्टी से लेकर यहाँ की बोली तक में एक खास तरह की आत्मीयता, विनम्रता और मर्यादा झलकती थी। हम बचपन से सुनते आए हैं — वाणी में मधुरता होनी चाहिए, क्योंकि शब्दों…

Read More

मेरे आँगन का पर्यावरण

लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना आज विश्व पर्यावरण दिवस है। मन बार-बार कुछ लिखने को कह रहा है — लेकिन शब्द कहाँ से शुरू करूँ, ये समझ नहीं आता। शायद इसलिए कि मैं जिस ग्रामीण पृष्ठभूमि से आता हूँ, वहाँ जीवन और पर्यावरण दो अलग चीज़ें नहीं, बल्कि एक ही साँस के दो रूप…

Read More

हुंकारू: कहानियों की धड़कन

80-90 के दशक की वो सुनहरी शामें, जब गांव की मिट्टी में खेलने के बाद बच्चों के पैर धूल से सने होते थे और घर के आंगन में चौपाल लगती थी। चूल्हे से उठता धुंआं, और दादा-दादी, नाना-नानी के होठों से बहती कहानियों का जादू। दिनभर के काम के बाद, थके हुए शरीर और तरोताज़ा…

Read More
Back To Top