“हमारे बीच के निषादराज”

लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना रामायण में निषादराज की कहानी हम सबने कभी-न-कभी पढ़ी, सुनी या देखी होगी। जब भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण वनवास के दौरान गंगा तट पहुँचे, तब गंगा पार कराने के लिए निषादराज ने अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया। यह प्रसंग केवल नदी पार करने का नहीं है, बल्कि…

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“धुएं में उड़ता बचपन – वर्तमान समय की नई चुनौती”

लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना बचपन जो सादगी और मासूमियत के लिए जाना जाता है, आज एक नई सामाजिक बीमारी से जूझ रहा है। बचपन जहां लोग अपनी सहजता और अपनत्व से किसी को भी “अपना” बना लेते हैं, अब उसी समाज में एक गंभीर समस्या चुपचाप जड़ें जमा रही है – कम उम्र…

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प्रेम की दिशा: कुमार और सान्वी की कहानी

लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना कहते हैं, हर सफल पुरुष के पीछे किसी स्त्री का हाथ होता है — यह बात बचपन से सुनते आए थे। लेकिन समय ने कई बार यह भी दिखाया कि कुछ पुरुषों का साथ, कुछ स्त्रियों के जीवन की दिशा ही बदल देता है। यह कहानी ऐसी ही एक…

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आधुनिक जीवन शैली में कमजोर पड़ते पारिवारिक नाते-रिश्ते: एक सांस्कृतिक यात्रा पाषाण युग से 21वीं सदी तक

लेखक- एम बी बलवंत सिंह खन्ना मानव सभ्यता की यात्रा एक बहुत लंबी और गहन प्रक्रिया रही है। पाषाण युग से लेकर आज की 21वीं सदी तक, इंसान ने जीवन के हर क्षेत्र में विकास किया है—रहन-सहन, तकनीक, शिक्षा, चिकित्सा, संचार, और सबसे अधिक सामाजिक संरचना में। परंतु इस प्रगति के बीच एक बात जो…

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शब्दों का संस्कार: जब भाषा से मर्यादा हटने लगे

लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना भारत, एक ऐसा देश जो अपनी सभ्यता, संस्कृति और संस्कारों के लिए विश्वविख्यात रहा है। यहाँ की मिट्टी से लेकर यहाँ की बोली तक में एक खास तरह की आत्मीयता, विनम्रता और मर्यादा झलकती थी। हम बचपन से सुनते आए हैं — वाणी में मधुरता होनी चाहिए, क्योंकि शब्दों…

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अनदेखी चेहरे की वो दोस्ती(एक अंतहीन प्रेम का आलोक)

लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना बात 2009 की है, जब मोबाइल फोन शहरों की सीमा लांघकर कस्बों और गाँवों में दस्तक देने लगे थे। उस वक्त हर हाथ में फोन नहीं होता था, और कॉल भी काफी महंगे हुआ करते थे। रिलायंस का छोटा सा सीडीएमए फोन, उसमें सीमित बैलेंस, और हर कॉल से…

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“सुराही की ठंडकता हो रही ग़ायब”

लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना गर्मी का मौसम था, आसमान से जैसे आग बरस रही थी। दोपहर में सन्नाटा ऐसा कि पत्ते भी हिलने से डरते थे। मगर हमारे घर के आँगन में उस खामोशी को तोड़ने वाले कुछ स्थायी साथी थे—एक पुराना कुआँ, आम का पेड़, और एक सुराही, जो हर साल की…

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हुंकारू: कहानियों की धड़कन

80-90 के दशक की वो सुनहरी शामें, जब गांव की मिट्टी में खेलने के बाद बच्चों के पैर धूल से सने होते थे और घर के आंगन में चौपाल लगती थी। चूल्हे से उठता धुंआं, और दादा-दादी, नाना-नानी के होठों से बहती कहानियों का जादू। दिनभर के काम के बाद, थके हुए शरीर और तरोताज़ा…

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जेब वाली दादी और पर्स वाली दीदी

लेखक- एम बी बलवंत सिंह खन्ना गाँव की सुबहें अब भी वैसी ही होती हैं — धीमी, शांत, और धूप की नर्म चादर ओढ़े हुए। लेकिन समय का चेहरा बदल चुका है। अब हर आँगन में मोबाइल की घंटियाँ सुनाई देती हैं, और बच्चों के हाथों में खिलौनों की जगह स्क्रीन चमकती है। उस दिन…

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“जहाँ नामों में गांव बसता है”

गांव के पूरब कोने में, जहाँ अब भी महुआ के पेड़ हर वसंत अपनी चुप खुशबू बिखेरते हैं, वहीं मिट्टी की दीवारों से घिरा एक पुराना सा घर खड़ा है। छप्पर कुछ झुक चुका है, दीवारों पर समय की दरारें उभर आई हैं, मगर आंगन अब भी वैसा ही साफ और पवित्र लगता है, जैसा…

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