“वो दीवाली, जब बिना स्टेटस लगाए भी त्योहार मनते थे”

लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना रात के आठ बजे थे, मोहल्ले में झिलमिल करती लाइटों की कतारें टिमटिमा रही थीं, लेकिन दिल में कहीं एक खालीपन था। खिड़की से बाहर देखा- बच्चे मोबाइल में व्यस्त थे, कोई वीडियो बना रहा था, कोई नए पटाखों का शो दिखा रहा था। चमक ज़रूर थी, पर न…

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“तू जा, मैं संभाल लूँगा”

लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना क्या एक पति का अपनी पत्नी से यह कहना-“तू जा, मैं संभाल लूँगा”- सिर्फ़ एक भावनात्मक वाक्य है? या यह एक नई सामाजिक क्रांति की दस्तक है? यह सवाल हमें उस दौर में ले जाता है जहाँ सदियों से पुरुषों को परिवार का “कमाने वाला” और स्त्रियों को “घर…

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“गाँव छोड़ शहर क्यों? क्या अपने सपनों को जन्मभूमि में ही साकार कर सकते हैं?”

लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना आज भारत के गाँवों से युवाओं का शहरों की ओर पलायन एक आम दृश्य बन गया है। गाँव की मिट्टी से उठकर कोई बच्चा जब कड़ी मेहनत से पढ़ाई करता है तो उसका सपना होता है कि वह अपने परिवार का जीवन बदल दे। लेकिन सच यह है कि…

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माँ की गोद से बड़ा कोई सुकून नहीं

लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना गाँव की कच्ची गलियों से जब भी सूरज की सुनहरी किरणें छनकर आतीं, तो लगता जैसे हर ईंट, हर पेड़ और हर छप्पर में जीवन साँस ले रहा हो। यही गाँव था जहाँ कुमार का जन्म हुआ था। मिट्टी की खुशबू, बैलों की घंटियाँ, कुएँ पर खनकते घड़ों की…

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ग़रीब का आशियाना: विकास बनाम विस्थापन की दास्तान

जब मानव ने पृथ्वी पर जीवन शुरू किया, उसकी बुनियादी ज़रूरतें थीं—भोजन, वस्त्र और आश्रय। पाषाण युग में गुफाएं उसकी छत थीं, पत्ते और जानवरों की खालें वस्त्र। फिर समय के साथ मानव ने खेती, निर्माण और बुनाई सीखी, समाज बना, नगर बसे, शासन और कानून विकसित हुए। शिक्षा, चिकित्सा, और कारोबार जैसे क्षेत्र आगे…

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“ईमानदारी की पाठशाला”

वर्ष 2005 का समय था। जांजगीर जिले में शिक्षा का माहौल कुछ और ही था, एक ऐसा माहौल जिसे अब सोचकर भी अजीब लगता है। नकल का इतना जोर था कि परीक्षा देने वाला हर विद्यार्थी असमंजस में होता कि वह मेहनत करे या नकल के भरोसे बैठे। परीक्षा केंद्रों पर नकल करवाने वालों की…

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“गाँव की नई सुबह,पंचायती राज से सशक्त होता छत्तीसगढ़”

छत्तीसगढ़ के छोटे से गाँव रसौटा में चुनावी माहौल गर्म था। गाँव की गलियों में रोज़ चर्चाएँ होतीं, जनसभाएँ होतीं, और प्रत्याशी अपने-अपने समर्थकों के साथ घर-घर जाकर समर्थन मांग रहे थे। हर किसी के चेहरे पर उम्मीद और उत्साह झलक रहा था। पंचायत चुनाव नज़दीक थे, और गाँव के लोग बड़ी दिलचस्पी के साथ…

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