लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना
रामायण में निषादराज की कहानी हम सबने कभी-न-कभी पढ़ी, सुनी या देखी होगी। जब भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण वनवास के दौरान गंगा तट पहुँचे, तब गंगा पार कराने के लिए निषादराज ने अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया। यह प्रसंग केवल नदी पार करने का नहीं है, बल्कि यह त्याग, सेवा और नि:स्वार्थ भाव का प्रतीक है। निषादराज ने अपने सहज व्यवहार, सरलता और निःस्वार्थ भक्ति से हमें यह सीख दी कि सेवा किसी वस्तु या पद की नहीं, बल्कि भाव की होती है।
परंतु सोचने वाली बात यह है कि क्या ऐसे निषादराज आज भी हमारे आस-पास मिलते हैं? क्या हमने कभी किसी ऐसे व्यक्ति को देखा है, जो अपने निःस्वार्थ भाव से समाज को मार्ग दिखाता हो, बिना किसी स्वार्थ के दूसरों की मदद करता हो? यदि हाँ, तो निस्संदेह आप भाग्यशाली हैं। और यदि नहीं, तो आइए, मैं आपको अपने गाँव के एक निषादराज से मिलवाता हूँ—छोटेलाल निषाद दादा जी।
यह बात है 90 के दशक की। उस समय गाँवों से कस्बों और शहरों तक पहुँचने के लिए आज जैसी सुविधाएँ नहीं थीं। मेरा गाँव हिर्री, जो जांजगीर जिले के पामगढ़ विकासखंड में आता है, मुख्य सड़क से लगभग दो किलोमीटर अंदर स्थित है। उस समय सड़कें कच्ची थीं। मुख्य मार्ग गिट्टी का हुआ करता था और गाँव तक पहुँचने का रास्ता मुरुम की पगडंडी। बरसात में यह रास्ता कीचड़ से भर जाता था और लोग पैदल ही मुख्य मार्ग तक जाते। पामगढ़, जो गाँव से लगभग 12 किलोमीटर दूर था, वहाँ पहुँचना भी आसान नहीं था।
मुख्य सड़क पर एक जगह थी जिसे सब हिर्री मोड़ कहते थे। उस समय वहाँ कोई घर नहीं था, कोई बस्ती नहीं थी न पानी न बिजली की व्यवस्था। बस एक झोपड़ी थी- जहाँ रहते थे छोटेलाल निषाद दादा जी और उनकी पत्नी। यही हमारे गाँव के निषादराज थे।
उस दौर में हिर्री मोड़ पर पानी की कोई सुविधा नहीं थी। दादा जी रोज़ बस्ती तक चार किलोमीटर पैदल जाकर पानी लाते। जब कोई यात्री या गाँववाला उनसे पानी माँगता तो दादी जी स्वाभाविक रूप से गुस्सा हो जातीं, क्योंकि इतनी मेहनत से लाया पानी बाँटना आसान नहीं था। लेकिन दादा जी कभी इंकार नहीं करते। वे हर किसी को पानी पिलाते और चेहरे पर मुस्कान बनाए रखते। उस दौर में पानी बेचना आम बात नहीं थी, सेवा करना ही सबसे बड़ा धर्म माना जाता था।
दादा जी का जीवन बड़ा सादा था। वे खेती-बाड़ी करते, बकरियाँ पालते और जंगल के किनारे बैठकर आने-जाने वालों से बातचीत करते। उनका आचरण और व्यवहार इतना सहज था कि हर कोई उनसे प्रभावित होता। जैसे रामायण के निषादराज ने नाव से राम-सीता को पार कराया था, वैसे ही हमारे निषादराज दादा जी जीवन की कठिनाई पार कराने के लिए ज्ञान और सीख का सहारा देते।
मुझे आज भी अच्छे से याद है मैं तब सात-आठ साल का था। एक दिन अपने माता-पिता के साथ मामा जी के गाँव जाने निकला। बस का इंतज़ार करते हुए हम हिर्री मोड़ पर खड़े थे। तभी छोटेलाल दादा जी बकरियाँ चराते हुए पास आए। मेरे लंबे बाल माथे को ढक रहे थे। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा- “बेटा, प्रकृति ने माथा दिया है, चेहरा सुंदर बनाया है, उसे ढक क्यों रहे हो? इंसान को अपनी पहचान छिपानी नहीं चाहिए।” वह साधारण-सी बात आज भी मेरे मन में गहराई तक बैठी है।
उनसे मिलने-जुलने पर हमेशा जीवन की नई-नई बातें सीखने को मिलतीं। पढ़ाई वे चौथी कक्षा तक ही कर पाए थे, लेकिन जीवन और व्यवहार का उनका ज्ञान किसी विद्वान से कम नहीं था। वे कहते-“मनुष्य का मूल्य उसकी शिक्षा की डिग्री से नहीं, बल्कि उसके आचरण से आँका जाता है।” यह बात मैं आज भी अपने जीवन में अनुभव करता हूँ।
समय बदलता गया। धीरे-धीरे हिर्री मोड़ पर सड़कें बनीं, बिजली पहुँची, मकान और दुकानें बनने लगीं। लेकिन जब 2010-11 में छोटेलाल दादा जी का निधन हुआ, तो उस जगह की आत्मीयता भी मानो खो गई। सुविधाएँ तो आ गईं, लेकिन वह सहजता, वह निःस्वार्थ सेवा और वह अपनापन अब कहीं दिखाई नहीं देता।
दरअसल, ऐसे निषादराज पहले हर गाँव, हर मोहल्ले में हुआ करते थे। वे हमें जीवन की दिशा दिखाते थे-कभी प्यार से, कभी डाँट से, तो कभी थप्पड़ से भी। तब समाज की परंपरा थी कि गलती करने पर कोई भी बड़ा-बुजुर्ग बच्चों को समझा सकता था। इससे न कोई झगड़ा होता, न विवाद। बल्कि यही संस्कार बच्चों के भीतर अनुशासन और आदर भाव भरते थे।
हम बच्चे गाँव में गिल्ली-डंडा, बाटी जैसे खेल खेलते थे। जब कोई बुजुर्ग सामने से गुजरता, तो हम खेल छोड़ देते और खड़े होकर उनका सम्मान करते। नशा करने वाले भी बच्चों के सामने शराब, सिगरेट या गुटखा नहीं खाते थे, क्योंकि वे जानते थे कि बच्चे देखकर सीखते हैं। यह सामाजिक अनुशासन हर पीढ़ी को संस्कारित करता था।
लेकिन आज की स्थिति चिंताजनक है। अब गली-चौराहों पर खुलेआम नशे की वस्तुएँ बिक रही हैं। किशोर वर्ग इसी से प्रभावित होकर गलत रास्तों पर जा रहा है। अब पड़ोस का कोई बुजुर्ग बच्चों को टोक भी दे तो लोग कहते हैं—“आपको हमारे बच्चों पर बोलने का हक़ नहीं।” जबकि सच तो यह है कि बच्चों की परवरिश केवल परिवार ही नहीं, पूरा समाज करता है।
तो सवाल यही है-क्या आज भी कोई निषादराज बन सकता है? मेरा उत्तर है-हाँ, बिल्कुल। लेकिन इसके लिए पहले हमें अपने भीतर निषादराज को जगाना होगा। यदि हम दूसरों के बच्चों को सुधारना चाहते हैं, तो हमें अपने आचरण को भी सुधारना होगा। हमारी वाणी, व्यवहार और जीवन ही दूसरों के लिए उदाहरण बने, तभी हम समाज में बदलाव ला सकेंगे।
इसके साथ ही शासन-प्रशासन को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। नशे के खुले व्यापार पर सख्त नियंत्रण, नाबालिगों को रोकने के उपाय और समाज को सही दिशा देने वाली नीतियाँ अनिवार्य हैं।
आज हमें फिर से ऐसे निषादराजों की ज़रूरत है—जो निःस्वार्थ भाव से समाज को मार्ग दिखाएँ, बच्चों को संस्कार दें, और जीवन की राह को आसान बनाएँ। तभी हमारे समाज में रामायण की उस झलक को हम महसूस कर पाएँगे, जब निषादराज ने भगवान श्रीराम को नाव से नहीं, बल्कि भाव से पार कराया था।


