(A Love Story Rooted in a Moment, Grown by Destiny)
लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना
“एक प्रेम कहानी — जो एक क्षण में अंकुरित हुई और किस्मत ने उसे सींचा।”
वो दिन आज भी मेरे ज़ेहन में वैसे ही महकता है, जैसे कोई भीगी मिट्टी पर पहली बारिश की खुशबू से। मैं 28 वर्ष का हो चुका था, ज़िंदगी की तेज़ रफ़्तार में कई रिश्तों को पीछे छोड़ते हुए अपने सबसे करीबी दोस्त की शादी में शरीक हुआ था। हल्दी-मेहंदी की चहल-पहल, हंसी-ठिठोली, और बीच में अचानक एक मासूम, चंचल मुस्कान — बस वहीं मेरी नज़र ठहर गई।
मेरे दोस्त के हाथों में मेहंदी लगा रही थी एक लड़की, जो उस भीड़ में अकेली अलग चमक रही थी। उसकी आँखों में एक सादगी थी, और हँसी में ऐसा जादू कि पल भर को मैं वहीं थम गया। जब दोस्त ने मुझसे कहा, “तू भी मेहंदी लगवा ले,” तो मैंने मुस्कराते हुए बस इतना कहा, “अगर जो तेरे हाथों में मेहंदी लगा रही है, वही मेरे हाथों में लगाएगी तो लगाऊँगा, वरना रहने दे।”
दोस्त ने हस्ते हुए कहा ठीक है इंतज़ार कर फिर
थोड़ा इंतज़ार करना पड़ा, लेकिन जब मेरी बारी आई और मेहंदी लगाने के लिए उसने मेरी हथेली पकड़ी और मेहंदी लगानी शुरू की, तब जैसे समय थम गया था। धीरे से मैंने पूछा, “नाम क्या है?” — और बातचीत शुरू हुई। उसका नाम सुगंधा था — और सच में, वो वहाँ मौजूद हर शोरगुल के बीच एक सुगन्ध बनकर मुझे अपनी ओर खींच रही थी। मैं ख़ूसाग्र हूँ — बीएससी कृषि से पढ़ाई पूरी कर चुका, और उस समय एक मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी कर रहा था।

सुगंधा, गणित विषय से बीएससी अंतिम वर्ष में थी। उस शादी के तीन दिनों में हम कई बार टकराए, बातचीत हुई, हल्की-फुल्की मुस्कानें साझा हुईं — लेकिन कोई नंबर नहीं लिया गया। शादी समारोह के बाद हम अपनी-अपनी दुनिया में लौट गए।
कुछ दिनों बाद, मुझे उस छवि को मन से हटाना मुश्किल हो गया। मैंने अपने दोस्त से बात की — “मुझे उसी लड़की से शादी करनी है जिसने तेरे हाथों में मेहंदी लगाई थी… सुगंधा । अगर तू उसके माँ-पापा से बात कर सके तो कर।” दोस्त ने हामी भर दी और बात बढ़ाई — लेकिन जवाब निराशाजनक था।
उसके माता-पिता ने विनम्रता से मना कर दिया, क्योंकि सुगंधा आगे एमएससी करना चाहती थी। मैंने खुद को समझाया — “शायद यह अधूरा सपना था।” लेकिन दिल तो वहीं अटका रहा। मैंने अपने लिए अन्य रिश्तों के प्रस्ताव देखे, दूसरे विकल्पों पर भी विचार किया, लेकिन हर चेहरा, हर नाम — बस अधूरा सा लगता। वो मुस्कान, वो सादगी बार-बार मेरी यादों में लौट आती।
इन्ही सब के बीच कई महीने बीत गए। और फिर — जैसे किसी फिल्म में अचानक कोई मोड़ आता है — एक दिन मेरे दोस्त ने बताया कि सुगंधा ने खुद मुझसे शादी के लिए हामी भरी है। मैं स्तब्ध था, लेकिन भीतर कहीं एक शर्सराहट सी दौड़ गई। बाद में पता चला, सुगंधा इस बीच मेरे बारे में जानकारी जुटा रही थी — मैं कहाँ काम करता हूँ, मेरी पढ़ाई, परिवार — शायद प्रकृति ने हमें मिलाने की एक नई पटकथा लिखी थी।
इस बार सबकुछ जैसे नियति के साथ था। रिश्ते की बात फिर से चली, और इस बार न कोई अड़चन, न कोई इनकार। शादी तय हुई।
“सच में, कभी जो मेहंदी हाथों पर लगती है, वो उम्र भर दिल में बसी रह जाती है…”
शादी के सात साल हो चुके हैं — अब मैं, मेरे माँ जी – बाबूजी और मेरी जीवनसंगिनी सुगंधा के साथ, हमारा छोटा सा परिवार बसाया है — और इस परिवार का सबसे उजला कोना है हमारा 5 साल का बेटा आरव।
अब भी जब कभी मैं सुगंधा की तरफ़ देखता हूँ, तो उस मेहंदी की हल्की सी महक और उसकी चंचल हँसी मेरी स्मृतियों में ताज़ा हो जाती है। हम भी बहस करते हैं, रूठते-मनाते हैं — लेकिन हर दिन एक नया वादा होता है — साथ चलने का, साथ मुस्कुराने का।
“कभी-कभी प्यार इंतज़ार करवाता है — लेकिन जब लौटता है, तो सिर्फ़ मिलने नहीं, जीने आता है।”
क्या आपको भी हुआ है पहली नज़र में प्यार और अगर हुआ है तो क्या आज जीवन साथी के रूप में आपके साथ हैं अगर हाँ तो मुझे अपनी कहानी साझा जरूर कीजिए
