अनदेखी चेहरे की वो दोस्ती(एक अंतहीन प्रेम का आलोक)

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लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना

बात 2009 की है, जब मोबाइल फोन शहरों की सीमा लांघकर कस्बों और गाँवों में दस्तक देने लगे थे। उस वक्त हर हाथ में फोन नहीं होता था, और कॉल भी काफी महंगे हुआ करते थे। रिलायंस का छोटा सा सीडीएमए फोन, उसमें सीमित बैलेंस, और हर कॉल से पहले सौ बार सोचना पड़ता था। यही दौर था एसटीडी पीसीओ की दुकानों का – हर नुक्कड़ पर एक, जहां लोग कतार में खड़े होकर अपनों से कुछ पल की बात कर सुकून पा लेते

कहानी एक लड़के की है – नाम है कुमार। एक सामान्य से गांव में पला-बढ़ा, और अब शहर में पढ़ाई के लिए निकला था। एक दिन मोबाइल नेटवर्क की किसी समस्या के कारण उसने रिलायंस कस्टमर केयर पर कॉल किया, जो उन दिनों भोपाल से संचालित होता था। उस कॉल को उठाया एक मीठी, शांत, और आत्मीय आवाज़ ने – ज्योति

“हैलो…”
“हैलो…” – उधर से आवाज़ आई।
कुमार कुछ क्षणों के लिए जैसे ठहर गया। इतनी कोमल, इतनी शांत आवाज़—मानो पहली बार किसी ने उसके मन के भीतर तक बात की हो।

बात तो महज़ नेटवर्क की थी, लेकिन उस दिन के बाद, कुछ और भी जुड़ गया था—एक अहसास, जो शब्दों से परे था।

कुमार ने हिचकते हुए ज्योति से उसका नंबर मांगा, लेकिन ज्योति ने ऑफिस के नियमों का हवाला देकर विनम्रता से मना कर दिया। पर शायद उसकी भी आत्मा ने उस आवाज़ में कुछ खोज लिया था। उसने चुपचाप कुमार का नंबर नोट कर लिया।

कुछ दिनों बाद, एक शाम, कुमार के मोबाइल पर एक कॉल आई।

“हैलो, मैं ज्योति बोल रही हूँ, उस दिन आपने कॉल किया था न…”

कुमार की धड़कनें जैसे रुक-सी गईं। फिर शुरू हुआ सिलसिला—धीरे-धीरे, हर शाम एक नई बात, हर रात एक नई परत खुलती गई। बिना देखे, बिना छुए, बस शब्दों और आवाज़ों के ज़रिए एक रिश्ता पनप रहा था।

ज्योति की ज़िंदगी संघर्षों से भरी थी। पिता शराब की लत में खो चुके थे। तीन बहनों में सबसे बड़ी, दो छोटी बहनों की पढ़ाई और माँ की सब्ज़ी की दुकान की ज़िम्मेदारी उसके कंधों पर थी। चार हजार की नौकरी, आठ घंटे की शिफ्ट और फिर घर की देखभाल।

कुमार भी अकेला नहीं था। उसके जीवन में भी तकलीफ़ें थीं—घर की जिम्मेदारियां, पढ़ाई का बोझ, और मन में उपजता भविष्य का डर। लेकिन दोनों जब एक-दूसरे से बात करते, तो मानो सारी थकान, सारी परेशानियाँ, कहीं दूर चली जातीं।

किसी ने कभी ‘आई लव यू’ नहीं कहा। न कोई वादा किया, न कोई भविष्य की योजना बनाई। बस एक रिश्ता था—बिना नाम का, लेकिन नाम से बड़ा। शायद ये मित्रता के आवरण में लिपटा निःस्वार्थ प्रेम था।

छह साल तक लगातार बातें होती रहीं। कभी कम, कभी ज़्यादा, पर कभी टूटकर अलग नहीं हुईं। फिर एक दिन 2015 में, ज्योति की शादी हो गई।

बातें धीरे-धीरे कम हो गईं। एक दिन अचानक पूरी तरह बंद।

कुमार ने कभी शिकायत नहीं की। न खुद से, न उस रिश्‍ते से, न किस्मत से। वह जानता था कि उस आवाज़ ने उसे ज़िंदगी के सबसे अकेले पलों में सहारा दिया था। वह हमेशा उस मित्रता को, उस रिश्ते को सम्मान देता रहा।

सोशल मीडिया उस समय उतना प्रचलित नहीं था। न व्हाट्सएप, न इंस्टाग्राम। न कोई तस्वीर, न वीडियो कॉल। केवल आवाज़ थी—और उसी आवाज़ में बसी एक आत्मा।

कुमार आज भी उसी आवाज़ को याद करता है। चेहरा कभी देखा नहीं, मिलने की कभी कोशिश नहीं की। लेकिन उस दोस्ती ने उसे एक जीवन दृष्टि दी, सच्चे संबंधों की परिभाषा सिखाई—कि बिना शर्त, बिना अपेक्षा, बिना किसी लालच के भी कोई रिश्ता निभाया जा सकता है।

हाँ, यही तो है असली दोस्ती।

जिसमें मिलने की ज़रूरत नहीं होती, जिसमें प्यार कहने की ज़रूरत नहीं होती। जो केवल आत्मा से आत्मा तक पहुँचती है। जो विरह की अग्नि में तपकर भी ठंडी हवा-सी सुकून देती है।

और अंत?

इस कहानी का कोई अंत नहीं।

क्योंकि दोस्ती, जब सच्ची होती है, तो अंतहीन होती है।
बस… कहीं दूर किसी शहर में एक ज्योति अपने परिवार में व्यस्त है,
और कहीं एक कुमार आज भी उस आवाज़ को याद कर मुस्कुराता है।



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6 thoughts on “अनदेखी चेहरे की वो दोस्ती(एक अंतहीन प्रेम का आलोक)

  1. वाह बलवंत बहुत खूब लिखा आपने, मजा आ गया

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