(गांव से शहर तक की एक यात्रा कथा)
लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना
बबलू जब भी अपने घर की बालकनी में खड़ा होकर कॉलोनी के मुख्य गेट की ओर देखता, तो उसे अपने गांव का वह कच्चा दरवाज़ा याद आ जाता, जिसकी कुंडी कभी पूरी तरह बंद ही नहीं होती थी।
आज यहां ऊँची दीवारें थीं, लोहे का विशाल फाटक था, कैमरे थे, गार्ड थे, और अब तो मोबाइल ऐप भी था-जिसमें हर आने-जाने वाले का हिसाब दर्ज होता था।
बबलू गांव से निकला हुआ आदमी था।
उसका बचपन मिट्टी में खेलते, तालाब में नहाते, और बिना झिझक किसी के भी आंगन में घुस जाने में बीता था। गांव का नाम था हिर्री, छोटा-सा गांव, जहां रास्ते सकरे थे लेकिन रिश्ते चौड़े।
सुबह-सुबह किसी के दरवाज़े पर आवाज़ लगती
“सगा आए हन जी… फलाना…!”
और भीतर से जवाब आता-
“आव जी… खुला हे दरवाज़ा।”
कुंडी खटखटाने से पहले आवाज़ देना तहज़ीब थी,
और बिना बुलाए भीतर न आना संस्कार।
गांव का समय
हिर्री में समय घड़ी से नहीं,
सूरज की चाल से चलता था।
दोपहर को छांव में सुस्ताती खाटें,
शाम को चौपाल की गपशप,
और रात को लालटेन की मद्धिम रोशनी।
बबलू के लिए गांव केवल एक जगह नहीं थी ,
वह उसकी पहचान थी।
लेकिन समय की अपनी ज़िद होती है।
शहर की ओर पहला क़दम
कॉलेज में दाख़िले के साथ बबलू शहर आया।
शहर का नाम था- रायपुर।
पहले हॉस्टल, फिर किराए का कमरा।
हॉस्टल में सब अलग होकर भी साथ थे।
किराए के मकान में पड़ोसी थे,
पर परिचय बस “नमस्ते” तक सीमित।
शहर ने उसे पढ़ाया,
शहर ने उसे रोज़गार दिया,
पर अपनापन धीरे-धीरे कहीं पीछे छूटता चला गया।
19 साल बीत गए।
इसी शहर में।
अपना घर
तीन साल पहले बबलू ने अपना छोटा-सा घर बनाया।
एक कवर्ड कैंपस कॉलोनी में।
घर छोटा था,
पर सपना बड़ा।
कॉलोनी सुंदर थी-
साफ़ सड़कें,
बगीचा,
बच्चों का पार्क,
और सबसे अहम-सुरक्षा।
मुख्य द्वार पर गार्ड।
अब नया नियम-
हर आगंतुक का नाम, मोबाइल नंबर,
और अब तो फोटो भी।

एक मोबाइल ऐप शुरू हुआ।
हर निवासी की पूरी जानकारी उसमें दर्ज।
कोई भी बाहरी व्यक्ति आए,
तो गार्ड पहले उसका फोटो ले,
फिर ऐप में अपलोड करे,
फिर मकान मालिक से अनुमति ले।
अनुमति मिले-तो प्रवेश।
अनुमति न मिले-तो इंतज़ार।
एक दिन
एक दोपहर बबलू ऑफिस से लौटा।
उसके मोबाइल पर कॉल आया।
“सर, गेट से बोल रहा हूँ।
एक व्यक्ति आए हैं-नाम बता रहे हैं इंदर।
आपसे मिलने आए हैं।”
बबलू चौंका।
इंदर…
उसका बचपन का मित्र।
गांव का ही।
“अरे… हां-हां, भेजिए,”
बबलू ने जल्दी से कहा।
कुछ देर बाद
इंदर सामने खड़ा था-
वही सादा कुर्ता,
वही झुकी हुई मुस्कान।
लेकिन आंखों में झिझक थी।
“बबलू…
गेट पर बहुत पूछताछ हो गई,”
बबलू ने धीरे से कहा,
“फोटो भी खींच लिए…”
बबलू हँसने की कोशिश करता है,
पर भीतर कुछ चुभ गया।
दो दुनियाओं का टकराव
चाय पीते हुए
इन्दर बोला-
“हमारे गांव में तो आज भी
दरवाज़े पर आवाज़ दे दो,
बस।”
बबलू चुप रहा।
उसे याद आया
गांव में जब कोई शहर से आता था,
तो पूरा मोहल्ला जान जाता था।
कोई गेट नहीं,
कोई रजिस्टर नहीं,
कोई कैमरा नहीं।
शहर में सब सुरक्षित था,
पर सब अकेले भी थे।
सोच का दरवाज़ा
उस रात बबलू ठीक से सो नहीं पाया।
मोबाइल ऐप खोलकर देखा-
आज कितने लोग आए,
किसके घर गए,
किसका फोटो लिया गया।
उसने सोचा-
यह सुरक्षा है या अविश्वास?
लेकिन सावधानी के साथ सुरक्षा भी जरूरी है।
गांव में दरवाज़े कमजोर थे,
पर भरोसा मजबूत।
शहर में दीवारें मजबूत हैं,
पर भरोसा नियमों में कैद है।
बबलू जानता था-
शहर बदलेगा नहीं,
पर वह खुद बदल सकता है।
अब जब भी कोई गांव से आता है,
बबलू उन्हें लेने गेट पर खुद चला जाता है।
और मन ही मन
कहता है-
“आव जी…
खुला हे दरवाज़ा…”

SAHI HAI BABLOO JHIJHAK TO HONA HI HAI GATE PAR
DUNIYA KABHI BADAL GAYA HAI BHAI