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लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना ©️

“प्रकृति नाम नहीं पूछती, फिर इंसान क्यों हर पल पहचान ढूँढता है?”

इंसान अपने पूरे जीवन में आखिर किसके पीछे भागता है?
रोटी, कपड़ा, मकान-ये तो आवश्यकताएँ हैं, पर इन सबसे आगे जो दौड़ है, वह है ‘नाम’ की दौड़। एक ऐसी दौड़, जो जन्म के साथ शुरू होती है और मृत्यु के बाद भी अधूरी रह जाती है।

मानव सभ्यता के आरंभ से आज तक पृथ्वी ने असंख्य परिवर्तन देखे हैं। कभी मनुष्य गुफाओं में रहा, जंगलों में भटका, प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व में जीया। फिर धीरे-धीरे उसने आग खोजी, औज़ार बनाए, भाषा विकसित की, खेती सीखी, नगर बसाए और आज वह आकाश से परे अन्य ग्रहों तक पहुँच गया। इस पूरी यात्रा में एक बात समान रही-हर खोज, हर आविष्कार, हर स्थान और हर उपलब्धि को एक नाम दिया गया।
नाम, ताकि उसे पहचाना जा सके।
नाम, ताकि उस पर अधिकार जताया जा सके।
और नाम, ताकि उसे याद रखा जा सके।

भारत जैसे देश में तो नाम केवल पहचान नहीं, बल्कि वर्गीकरण का औज़ार भी बन गया। यहाँ जाति का नाम है, धर्म का नाम है, राजनीति का नाम है, पद का नाम है, शिक्षा और अशिक्षा तक के नाम हैं। यहाँ नाम तय करता है कि आप कौन हैं, कहाँ खड़े हैं और समाज आपको किस नज़र से देखेगा।

पर क्या हमने कभी ठहरकर यह सोचा है कि इस नाम के पीछे भागते-भागते जीवन ही समाप्त हो जाता है?
और वह नाम, जिसे हमने जीवन भर सँजोया, एक समय के बाद इतिहास के किसी धुँधले कोने में विलुप्त हो जाता है।

आज भी इस पृथ्वी पर ऐसे लोग हैं, जो नाम और पहचान के बोझ से मुक्त जीवन जी रहे हैं। बीहड़ जंगलों में रहने वाले आदिम जनजातीय समुदाय, या वे खानाबदोश परिवार जिनका न कोई स्थायी ठिकाना है, न सरकारी पहचान-वे भी इसी धरती पर सांस लेते हैं, हँसते हैं, रोते हैं, अपने बच्चों को संस्कार देते हैं। उनकी अपनी शिक्षा है, अपनी दीक्षा है, अपनी संस्कृति है।
वे बिना नाम के भी जीवन जीना जानते हैं।

समस्या तब शुरू होती है जब इंसान को नाम दे दिया जाता है-चाहे वह व्यक्ति का हो, जाति का हो, धर्म का हो या क्षेत्र का।
नाम मिलते ही शुरू हो जाता है उसे बचाने, बढ़ाने और दूसरों से ऊपर रखने का खेल।
फिर पूरी ज़िंदगी उसी नाम को ऊँचा करने में खप जाती है-कभी प्रतिस्पर्धा में, कभी ईर्ष्या में, कभी सत्ता की लालसा में।

मुख्यधारा का समाज इंसान को इतना व्यस्त कर देता है कि उसे अपनी खुशी का अर्थ ही बदलना पड़ता है। अब खुशी का मतलब शांति नहीं, बल्कि पहचान है। अब आनंद का मतलब संतोष नहीं, बल्कि दूसरों से आगे निकलना है। इस दौड़ में इंसान अपने स्वार्थ के लिए कितना मतलबी हो जाता है, यह उसे खुद भी पता नहीं चलता।

एक बड़ा प्रश्न यहीं खड़ा होता है-
इंसान प्रकृति के साथ रहकर ज़्यादा खुश है, या प्रकृति को बर्बाद कर अपना नाम बनाने की कोशिश में?

आज की जीवनशैली सतत विकास की नहीं, बल्कि सतत दोहन की बन चुकी है। जंगल कट रहे हैं, नदियाँ सूख रही हैं, पहाड़ खोखले हो रहे हैं-सब कुछ “नाम” के नाम पर। बड़े भवन, बड़ी कंपनियाँ, बड़ी उपलब्धियाँ-और हर जगह एक नाम चमकता हुआ।
लेकिन क्या यह चमक स्थायी है?

जन्म के तुरंत बाद नामकरण होता है। फिर वही नाम स्कूल में पहचान बनता है, कॉलेज में प्रतिष्ठा, नौकरी में पद और समाज में रुतबा। इसी क्रम में हम यह भूल जाते हैं कि जीवन का उद्देश्य नाम कमाना नहीं, बल्कि जीना है।
और जीना तब संभव है, जब प्रकृति बची रहे।

विडंबना यह है कि जिन लोगों को हम “पिछड़ा” कहते हैं-जंगलों में रहने वाले जनजातीय समुदाय-वे आज भी आनंदित हैं। क्योंकि उन्हें पता है कि जीवन प्रकृति के साथ तालमेल में है, न कि नाम और पहचान के बोझ में। उनके लिए खुशी किसी पद या उपाधि की मोहताज नहीं।

अंततः प्रश्न यही रह जाता है-
क्या नाम के बिना जीवन अधूरा है, या नाम के पीछे भागते हुए जीवन ही अधूरा रह जाता है?

शायद असली आनंद वहाँ है, जहाँ नाम नहीं, केवल अस्तित्व होता है।
जहाँ पहचान नहीं, केवल प्रकृति और मनुष्य का संतुलन होता है।


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4 thoughts on “‘नाम’

  1. Naam…
    Jitni baatein likhi gae hain , vo sari baatein sach hain or hum sab in sab baaton se
    ru-ba-ru hain .
    Sach janne k bad v agr hum aisa kar rahen hain toh , hume kis category m rakhna chahiye???

  2. ठीक बात है। नाम के पीछे लोग इसीलिए दौड़ रहे है कि यही पैमाना है इंसान के होने ना होना असफल या कामयाब होने का । असल समस्या है नाम को अभिमान बना देने का । नाम को गर्व या अपमान का कारण बना देना ।

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