लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना
छत्तीसगढ़ की मिट्टी हमेशा से शांत रही है -घने वनों, पहाड़ों और जनजातीय संस्कृति की सहजता से भरी हुई। पर हाल के दिनों में राजधानी दिल्ली से लेकर बस्तर तक जिस तरह “जल–जंगल–जमीन” के नाम पर बहसें तेज़ हुई हैं, उसने फिर एक बार इस प्रदेश के मूल प्रश्नों को सामने ला दिया है।
दिल्ली में कुछ युवाओं द्वारा कुख्यात नक्सली हिडमा की मौत पर सवाल उठाना, उसे शहीद बताना और उसके समर्थन में नारे लगाना न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि पूरे देश के लिए चिंता का विषय है। यह उस संघर्ष की पुनरावृत्ति है जिसमें विचारधाराओं के नाम पर सशस्त्र हिंसा को न्यायसंगत बनाने की कोशिश की जाती है।

जनजातीय जीवन : संतोष, प्रकृति और संघर्ष का अपना संसार
छत्तीसगढ़ के वन सदियों से जनजातीय समुदायों का घर रहे हैं। इन समुदायों का जीवन–चक्र जंगल से ही बनता है – भोजन, आवास, औषधि, आजीविका और सांस्कृतिक पहचान तक सब कुछ प्रकृति में निहित है।
इनके पास न पक्के घर हैं, न आधुनिक सुविधाएँ, और न ही शहरी चमक-but वे संतुष्ट हैं। क्योंकि उनकी दुनिया “अभाव” की परिभाषा से नहीं बल्कि “स्वावलंबन” से संचालित होती है।
लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब बाहरी समाज के पैमाने-अमीरी, गरीबी, सुविधा और आधुनिकता-इनकी सहज जीवनशैली को मापने लगते हैं।
नक्सलवाद : न्याय की आड़ में हिंसा का जाल
पिछले दशकों में नक्सलवाद ने इसी जनजातीय नारों को हथियार बनाकर खून–खराबे और भय का साम्राज्य खड़ा किया।
अबूझमाड़, जिसे कभी भारत का सबसे “अबूझ” भूभाग कहा जाता था, धीरे–धीरे खुल रहा है। सड़कें बन रही हैं, स्कूल खुल रहे हैं और आम लोग अब आवाजाही कर पा रहे हैं।
लेकिन यह परिवर्तन तभी टिक सकता है जब हिंसा समाप्त हो।
क्योंकि लोकतांत्रिक देश में संविधान के बाहर बंदूक लेकर शासन चलाना न जनजातीय हित है, न समाज का।
नक्सलियों को भी यह समझना होगा कि हथियार छोड़कर ही वे अपने समुदायों को वास्तविक विकास और गरिमा दिला सकते हैं।
वन संसाधन और सरकार की ज़िम्मेदारी
वनों की सुरक्षा पर सवाल उठाना भी आवश्यक है।
हसदेव अरण्य में जिस प्रकार से पेड़ों की कटाई हुई है, वह जनभावना और पर्यावरणीय संतुलन दोनों के लिए चिंता पैदा करती है।
सवाल है-अगर जंगल नहीं बचेंगे, तो जनजातीय संस्कृति कैसे बचेगी?
यदि जल–जंगल–जमीन खतरे में पड़ा, तो छत्तीसगढ़ की आत्मा ही खतरे में पड़ जाएगी।
इसलिए सरकार को जनजातीय समुदायों के साथ मिलकर एक संतुलित नीति बनानी होगी-
जहाँ विकास भी हो और प्रकृति भी सुरक्षित रहे।
स्थानीय बनाम बाहरी, जाति–वर्चस्व और राजनीतिक शोर
बीते दिनों प्रदेश में “स्थानीय–बाहरी” का विवाद, जातीय तनाव और राजनीतिक बयानबाज़ी ने प्रदेश के शांत स्वभाव को हिलाकर रख दिया है।
नक्सलवाद, क्षेत्रीयता या जातीयता—किसी भी रूप में विभाजनकारी भाषा स्वीकार्य नहीं हो सकती।
छत्तीसगढ़ की असली पहचान उसकी शांत प्रकृति, उसकी संस्कृति और उसकी सादगी में है-न कि संघर्षों में।
आगे का रास्ता : संविधान, संवाद और संतुलन
इस जटिल परिस्थिति में कुछ कदम बेहद आवश्यक हैं-
- नक्सलियों का आत्मसमर्पण और मुख्यधारा में लौटना।
बंदूक से नहीं, संविधान से समाधान मिलेगा। - वन–अधिकार कानूनों का पारदर्शी और न्यायपूर्ण पालन।
जनजातियों को उनके हक का सम्मान मिले-कागज़ों में नहीं, ज़मीन पर। - हसदेव सहित अन्य संवेदनशील वन क्षेत्रों में पुनर्मूल्यांकन।
हर विकास परियोजना जनमत, पर्यावरण और दीर्घकालिक हितों को देखकर ही बने। - जनजातीय युवाओं के लिए शिक्षा, कौशल और रोजगार के वास्तविक अवसर।
ताकि उनका भविष्य बंदूक नहीं, कलम तय करे। - स्थानीय–बाहरी और जातीय विवादों को तत्काल समाप्त करने के लिए सख़्त नीति।
प्रदेश की एकता से बड़ा कोई राजनीतिक एजेंडा नहीं।
छत्तीसगढ़ केवल एक राज्य नहीं, एक संस्कृति है-
जहाँ जल जीवन है, जंगल पहचान है, और जमीन सम्मान है।
इन तीनों की रक्षा हिंसा से नहीं, समझ, संवाद और संविधान की मर्यादा से ही संभव है।
समय आ गया है कि हम सभी मिलकर यह तय करें कि-
“हमारा प्रदेश संघर्ष की नहीं, शांति और विकास की राह पर आगे बढ़े।”
