लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना
रात के आठ बजे थे, मोहल्ले में झिलमिल करती लाइटों की कतारें टिमटिमा रही थीं, लेकिन दिल में कहीं एक खालीपन था। खिड़की से बाहर देखा- बच्चे मोबाइल में व्यस्त थे, कोई वीडियो बना रहा था, कोई नए पटाखों का शो दिखा रहा था। चमक ज़रूर थी, पर न जाने क्यों इस चमक में वो गरमाहट नहीं थी, जो कभी मिट्टी के दीयों की लौ में महसूस होती थी।
बीस साल पहले की बात है – वही अक्टूबर की ठंडी हवा, वही गाँव का आँगन, वही दीवाली की तैयारी, लेकिन कितनी सादगी थी उसमें।
घर में बिजली की लाइट नहीं थी, पर मिट्टी के दीयों की कतार जब आँगन में जलती थी, तो पूरा घर जैसे सचमुच जगमगा उठता था। माँ सुबह से पकवान बनाना शुरू कर देती थीं — अईरसा, खुरमी, गुझिया, चकली, बेसन के लड्डू, और नमकीन। उस समय बाजार से सब कुछ नहीं आता था, बहुत कुछ घर में ही बनता था।

बाबूजी बाजार से पाँच रुपये का मिट्टी का दिया लाते थे – वो भी सजे-धजे, कभी लाल रंग में, कभी पीले में बात सिर्फ दिए की नहीं थी, उसकी मिट्टी में वो अपनापन था, जिसकी खुशबू पूरी शाम भरती थी।
हम सब भाई-बहन आँगन में मिलकर मिट्टी से बने दीये जलाते थे। कहीं किसी की बात से दीया बुझ भी जाता, तो सब मिलकर हँसते हुए कहते – “फूँक मारो, फिर से जलाते हैं।”
उस वक्त जलता हुआ हर दिया एक छोटी सी जीत लगता था – अँधेरे पर, तंगी पर, और शायद थके हुए जीवन पर भी।
पटाखे?
हाँ, होते थे न, पर गिने-चुने 10 रुपये की लड़ी, एक-दो अनार, चकरी, साँप फटाका जो मेरा मनपसंद हुआ करता था , टिकली फटाका जिसे हम बच्चे नाखून में फ़साकर दीवारों से घसीटते हुए ही फोड़ दिया करते थे और कुछ फुलझड़ियाँ।
पर उनसे मिलने वाली खुशी – आज के हजारों के फायरवर्क्स से कहीं बड़ी थी।
क्योंकि तब बच्चों की आँखों में चमक थी, और बड़ों के दिल में सुकून।
दीवाली के अगले दिन मोहल्ले के बच्चे सुबह-सुबह यह देखने निकलते कि किसके घर के सामने ज़्यादा फुलझड़ी के जले हुए टुकड़े हैं- वही सबसे बड़ा ‘दीवाली चैंपियन’ कहलाता था।
न कोई फोटोशूट, न वीडियो – बस सच्ची मुस्कानें और स्नेह से भरे पल।
आज सब कुछ है- लाइटें, सजावट, उपहार, महंगे कपड़े, मिठाइयाँ और हज़ारों के पटाखे।
पर उस पुराने मिट्टी के दिए की लौ जैसी सादगी अब कहीं खो गई है।
आज दीवाली “परफेक्ट दिखने” की हो गई है, “महसूस करने” की नहीं।
बाबूजी अब नहीं हैं, पर आज भी जब दीये जलाता हूँ, तो लगता है वो मेरे साथ बैठे हैं।
माँ अब मोबाइल पर वीडियो कॉल करती हैं, कहती हैं – “बेटा, वहाँ भी(शहर के घर में) दीया ज़रूर जलाना, घर की दहलीज़ पर।”
और मैं हर बार वही सोचता हूँ –
वो दीया, जो तब पाँच रुपये में पूरे घर को रौशन कर देता था,
आज हजारों की बिजली से भी ज़्यादा उजाला देता था।
क्योंकि तब रोशनी दिलों में थी,
अब दीवारों पर है।
काश! इस बार की दीवाली पर हम सब एक पल के लिए मोबाइल रख दें,
बाज़ार की लाइटें बंद कर दें,
और किसी पुराने मिट्टी के दीए को फिर से जलाएँ-
शायद तब वो पुराना उजाला लौट आए,
जो हमारी आँखों में नहीं,
हमारे दिलों में जलता था।
एक बार पुनः आप सभी को शुभ दीपावली 🪔
