झिझक — एक अदृश्य बोझ

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लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना

यह लेख उन सभी के लिए है जो खुद को ‘मिडिल क्लास’ और उससे नीचे मानते हैं — क्योंकि ऊपर वाले इस वर्ग की झिझक नाम की चीज़ से मुलाक़ात ही नहीं होती।

कल्पना कीजिए — आप एक नए शहर में हैं, या अपने ही कस्बे के एक नए सैलून, रेस्टोरेंट, या शोरूम में। माहौल नया है, लोग नए हैं, सब कुछ थोड़ा चमकदार और आपको थोड़ा ‘महंगा’ लगता है। पर मन में एक आवाज़ आती है — “चलो, एक बार ट्राय कर ही लेते हैं।” आप कुर्सी पर बैठते हैं, मेन्यू देखे बिना कोई सेवा शुरू हो जाती है, और जब अंत में बिल आता है — तो मन भीतर तक हिल जाता है। वही पुराना पछतावा: “काश मैंने पहले पूछ लिया होता…”

लेकिन हम पूछते नहीं।

क्यों?

क्योंकि एक अदृश्य सी झिझक हमें रोकती है। यह झिझक हमारी परवरिश में, हमारे समाज में, हमारी चुपचाप सहने की आदत में पनपती है। हमें बचपन से सिखाया जाता है — “शालीन बनो, ज्यादा मत पूछो, सवाल मत करो, बेइज़्ज़ती हो जाएगी।” और इसी चुप्पी में हमारी जेबें कटती हैं।

एक होटल में बैठकर जब हम यह सोचते हैं कि “अगर मैंने दाल-चावल का रेट पूछ लिया तो क्या वेटर मुझे गरीब समझेगा?” — उसी पल हम अपने आत्मसम्मान को झूठी इज्ज़त के नाम पर गिरवी रख देते हैं।

पर सोचिए — अगर कोई लाखों में कमाने वाला इंसान खुले दिल से पूछ सकता है कि “इसमें GST कितना लगेगा?” तो हम क्यों नहीं?

इस झिझक ने हमें लूटा है — न सिर्फ पैसों में, बल्कि आत्मविश्वास में भी।

और यकीन मानिए, जिन अजनबियों के सामने आप खुद को छोटा समझ लेते हैं — उन्हें आपके बारे में कोई परवाह नहीं है। वे अगले दस मिनट में आपको भूल जाएंगे। लेकिन आपकी जेब और मन में जो बोझ छूट जाता है, वो देर तक टिका रहता है।

अब समय है इस झिझक को उतार फेंकने का।

अब समय है खुद से कहने का —
“मुझे पूछने में शर्म नहीं, गर्व है।”
“यह मेरा पैसा है, मेरा अधिकार है, मेरा हक है पूछना।”
“सवाल पूछना हमारा अधिकार है!”

और अगर कोई तिरछी नज़रों से देखे भी, तो मुस्कुरा के कहिए —

“है’ तो है।”


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2 thoughts on “झिझक — एक अदृश्य बोझ

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