लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना
आज विश्व पर्यावरण दिवस है। मन बार-बार कुछ लिखने को कह रहा है — लेकिन शब्द कहाँ से शुरू करूँ, ये समझ नहीं आता। शायद इसलिए कि मैं जिस ग्रामीण पृष्ठभूमि से आता हूँ, वहाँ जीवन और पर्यावरण दो अलग चीज़ें नहीं, बल्कि एक ही साँस के दो रूप होते हैं।

अब शहर में रहते हुए अठारह साल बीत चुके हैं। पहले यूनिवर्सिटी का हॉस्टल, फिर किराये के मकान, और अब पिछले तीन वर्षों से मेरा अपना छोटा-सा घर। लेकिन सपना तो कुछ और ही है — एक ऐसा घर जहाँ मिट्टी की खुशबू हो, जहाँ 1500 वर्गफुट में घर हो, 200 वर्गफुट में एक गौशाला, 500 वर्गफुट की बाड़ी और बाकी आँगन जहाँ बीचोंबीच तुलसी चौरा हो जिससे सुबह की शुरुआत हो।कब पूरा होगा, ये नहीं पता… लेकिन सपना है, और उसके लिए कोशिशें भी जारी हैं।

पर्यावरण प्रेम मेरे लिए कोई जागरूकता अभियान नहीं, यह मेरी परवरिश का हिस्सा है। गाँव में माँ के हाथों में ऐसा जादू है कि जो पौधा वो रोप देती हैं, वह पेड़ बनकर फल देता है। हमारे घर के चारों तरफ़ पेड़ ही पेड़ हैं — अमरूद, नींबू, चीकू, आंवला, कटहल, अंगूर, बेल, नारियल, अंजीर, और यहाँ तक कि सेब का पेड़ भी जो ठंडे प्रदेशों में फलता है, हमारे घर में लहलहा रहा है।
माँ की देखरेख और लगन से प्रेरित होकर मैंने भी शहर के अपने छोटे से घर में पपीते के कुछ पौधे लगाए। इस बार पपीते इतने ज्यादा फल गए कि पहली बार गाँव से शहर नहीं, शहर से गाँव फल ले जाना पड़ा — पूरे 23 किलो पके हुए, स्वादिष्ट पपीते। वो पल मेरे लिए भावुक कर देने वाला था, जब मैं माँ के लिए शहर में उगाया फल गाँव ले गया। वर्षों से माँ जो गाँव से फल भेजती रही, आज बेटे ने प्रकृति को लौटा दिया।
मेरी सुबह इन्हीं पेड़ों से बात करते हुए होती है। वे मेरी सबसे शांति देने वाली संगत हैं — जो चुपचाप मेरी बातें सुनती हैं, बिना टोकाटाकी, बिना कोई शर्त रखे। यह एक ऐसी अनुभूति है जिसे शब्दों में बाँधना कठिन है। जब आप एक बीज को बोते हैं, और फिर देख पाते हैं कि वह पौधा बनकर वृक्ष में बदल गया है, तो वह क्षण एक सजीव कविता जैसा लगता है — आत्मा को छू लेने वाला।

लेकिन अफ़सोस यह है कि हमारे देश में पर्यावरण अब भी एक ‘मुद्दा’ नहीं बन पाया है। न सरकारें, न समाज — कोई भी इसे उतनी गहराई से महसूस नहीं करता, जितनी यह ज़रूरत है। जबकि सच्चाई यह है कि अगर आप कुछ नहीं कर सकते, तो बस एक पौधा लगाइए। बस एक।
पेड़ से बात करिए, वो आपकी बातें नहीं काटेगा, न टालेगा, न अनदेखा करेगा। वह सिर्फ़ सुनेगा। और यही सुनना आज की दुनिया में सबसे दुर्लभ है।

बनावटी रिश्तों, मक्कारी और अहंकार की दुनिया में जब कुछ भी सच्चा नहीं लगता, तो लौट आइए प्रकृति की गोद में। वह न आपको जज करेगी, न ही ठुकराएगी। वह केवल देना जानती है।
तो इस विश्व पर्यावरण दिवस पर आपसे मेरी यही प्रार्थना है — एक पेड़ ज़रूर लगाइए। शायद यही वह रिश्ता हो जिसे निभाते-निभाते आप खुद से भी जुड़ जाएँ।


ऐसा ही घर मुझे भी चाइए
आपने में जिस घर का जिक्र है वैसा है फोटो में जैसा घर दिख रहा है वैसा