लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना
गर्मी का मौसम था, आसमान से जैसे आग बरस रही थी। दोपहर में सन्नाटा ऐसा कि पत्ते भी हिलने से डरते थे। मगर हमारे घर के आँगन में उस खामोशी को तोड़ने वाले कुछ स्थायी साथी थे—एक पुराना कुआँ, आम का पेड़, और एक सुराही, जो हर साल की गर्मियों में हमारी प्यासी हथेलियों की सबसे बड़ी राहत बनती थी।
मैं तब सात-आठ साल का रहा होऊँगा। हमारे गाँव में बिजली तो थी, लेकिन फ्रिज जैसे शब्द तब कहानियों में सुने जाते थे। प्यास लगती तो दौड़कर सुराही की ओर भागते। सुराही की ठंडी गरदन से निकलते पानी की मिठास आज भी ज़ुबान पर ताज़ा है। उस समय यह समझ में नहीं आता था कि मिट्टी और पानी की यह जोड़ी कितनी गहरी है, कितनी सजीव।
माँ सुराही को सुबह-सुबह धूप में धोकर सूखा देती, फिर उसमें कुएँ से भरकर पानी लाती। हम बच्चे दिन भर खेल-खेल में सुराही का पानी खत्म कर देते, कभी चुपके से, कभी दौड़ते हुए। माँ डाँटती, पर खुद ही फिर भरने भी चली जाती।
सुराही सिर्फ पानी का बर्तन नहीं थी, वह हमारे बचपन की सबसे मीठी स्मृति थी।
वक़्त बीता। मैं पढ़ाई के लिए शहर चला गया। वहाँ हर घर में फ्रिज था, बोतलबंद पानी था, और पानी के नाम पर भावनाएँ नहीं, केवल तापमान की बात होती थी—”पानी ठंडा है या नहीं?” पर किसी ने यह नहीं पूछा कि वो पानी जीता है या बस ठंडा किया गया है।
सालों बाद गाँव लौटा तो वो आम का पेड़ अब बूढ़ा हो चला था, कुआँ जर्जर हो चुका था, और सुराही… वो कहीं दिखाई नहीं दी। माँ से पूछा तो बोली, “अब कौन भरता बार-बार, फ्रिज है ना…”
फ्रिज था, बोतलें थीं, पर वो सुकून नहीं था जो सुराही के पानी में था। ना मिट्टी की वो खुशबू, ना वो अहसास कि यह पानी ज़मीन से निकला है, ज़मीन ने ही उसे ठंडा किया है, और अब वही ज़मीन इसे हमारे जीवन में उतार रही है।
एक दिन बाजार में घूमते-घूमते एक कुम्हार मिला। धूप में बैठा था, उसके पास मिट्टी के कुछ बर्तन रखे थे—कुछ दीए, कुछ गुल्लकें, और एक सुराही।
मैं ठिठक गया। जैसे वर्षों पुरानी कोई दोस्त सामने आ खड़ी हो। मैंने पूछा, “भैया, अब भी कोई सुराही खरीदता है क्या?”
उसने मुस्कुराते हुए कहा, “कम ही लोग हैं बाबू जी… अब सबको मशीनों की आदत लग गई है। मिट्टी अब फैशन नहीं रही।”
उसके शब्दों में एक थकावट थी, जैसे उसने हार मान ली हो। मैंने वो सुराही खरीद ली। घर लाया। धोया। और कुएँ से खुद पानी भरकर उसमें डाला। फिर देर तक बैठकर उसे निहारता रहा, जैसे कोई पुराना रिश्ता फिर से जुड़ गया हो।
रात को जब पहली बार सुराही से पानी पिया, तो ऐसा लगा जैसे ज़िंदगी ने फिर से मिट्टी छू ली हो। ठंडक तो थी ही, पर उस पानी में एक भावनात्मक गर्माहट भी थी—माँ की डाँट, बचपन की धमाचौकड़ी, कुम्हार के हाथों की मेहनत, और उस मिट्टी की आत्मा, जिसने न जाने कितने बचपन सहेजे होंगे।

आज हम आधुनिकता की दौड़ में भागते-भागते अपनी जड़ों से दूर हो चुके हैं। हमने फ्रिज को अपनाया, लेकिन सुराही को खो दिया। हमने सुविधा चुनी, लेकिन प्रकृति से रिश्ता तोड़ लिया। और सबसे बड़ा नुकसान यह कि हम उन कुम्हारों को भूल गए, जिनकी मिट्टी की सांसों से हमारी परंपराएँ जीवित थीं।
शायद अब समय आ गया है कि हम फिर से सुराही को जीवन में स्थान दें।
क्योंकि सुराही केवल एक बर्तन नहीं है—वह हमारी संस्कृति, हमारी मिट्टी, और हमारे बचपन की आखिरी साँस है।
और अगर हमने अब भी इसे नहीं बचाया…
तो अगली पीढ़ी सुराही का नाम केवल किताबों में पढ़ेगी—जैसे कोई विलुप्त जीव का उल्लेख।
कभी-कभी बदलाव का मतलब पीछे लौटना भी होता है।
क्योंकि जो चीज़ें हमें इंसान बनाती हैं, वो अक्सर मिट्टी से ही निकली होती हैं।

बहुत ही सुंदर भईया 👌🏻👌🏻
Bahut khub kaha bhai.
Pyas kewal surhi bujha sakta hai freeze nhi