वर्ष 2005 का समय था। जांजगीर जिले में शिक्षा का माहौल कुछ और ही था, एक ऐसा माहौल जिसे अब सोचकर भी अजीब लगता है। नकल का इतना जोर था कि परीक्षा देने वाला हर विद्यार्थी असमंजस में होता कि वह मेहनत करे या नकल के भरोसे बैठे। परीक्षा केंद्रों पर नकल करवाने वालों की भीड़ इतनी होती थी कि जो ईमानदारी से पढ़ाई करते थे, उनका भी मन विचलित हो जाता था। मैंने भी उसी साल दसवीं की परीक्षा दी, और उस माहौल का सामना किया।
तब मैंने शासकीय विद्यालय से पढ़ाई की थी, लेकिन परीक्षा केंद्र पर जब आप पूरे आत्मविश्वास के साथ पहुँचते थे, तो परीक्षा कक्ष के बाहर हो-हल्ला इतना होता था कि आप जो पढ़कर गए होते, उसे भी भूल जाते। हर जगह नकल का बाजार गर्म था। मैंने परीक्षा तो पास कर ली, लेकिन मन में कहीं न कहीं शिक्षा के इस स्तर को लेकर बहुत निराशा थी।
फिर आया वर्ष 2008, जब जांजगीर-चांपा जिले का नाम एक बड़े विवाद में आ गया। पोरा बाई, जो बिर्रा के शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय की छात्रा थीं, ने छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल की 12वीं कक्षा की परीक्षा में टॉप किया। उनका नाम मेरिट लिस्ट में पहले स्थान पर आया, लेकिन उनके परिणाम को लेकर कई संदेह उठे। मीडिया ने इस मामले को खूब उछाला, और यह मामला अदालत तक पहुँच गया हालांकि बारह साल बाद पोरा बाई इन आरोपों से आदलत द्वारा बरी हुई। लेकिन यह घटना जिले के शिक्षा तंत्र को एक बार फिर से कटघरे में खड़ा कर गई। जिले के कुछ लोग नकल को ही शिक्षा का आधार मानने लगे थे, और यह बात हमें और शर्मसार कर रही थी।

ऐसे समय में श्री ओपी चौधरी, जो उस वक्त जिले के कलेक्टर थे (आज प्रदेश सरकार में वित्त मंत्री) ने एक बड़ा कदम उठाया। उन्होंने जिले में शिक्षा के स्तर को सुधारने का बीड़ा उठाया और नकल पर कड़ी कार्रवाई की। उनकी पहल से परीक्षा केंद्रों पर सुरक्षा कड़ी की गई और नकल माफियाओं पर शिकंजा कसा गया। धीरे-धीरे जिले से नकल की समस्या कम होने लगी, और श्री चौधरी का यह कड़ा रुख शिक्षा के प्रति एक सकारात्मक बदलाव का प्रतीक बना।
अब जब मेरी पढ़ाई की बात करें, तो दसवीं पास करने के बाद मैंने विद्या निकेतन पब्लिक कॉन्वेंट स्कूल, पामगढ़ में ग्यारहवीं और बारहवीं की पढ़ाई की। यहाँ का माहौल पूरी तरह से अलग था। जहाँ शासकीय विद्यालय में नकल का बोलबाला था, वहीं विद्या निकेतन में यह संभव ही नहीं था। इस स्कूल में पढ़ाई के साथ-साथ नैतिकता और अनुशासन पर भी जोर दिया जाता था। यहाँ मुझे एक नई दिशा मिली, और इसके पीछे हमारे स्कूल के प्राचार्य श्री नरेंद्र पांडेय सर का विशेष योगदान रहा।
पांडेय सर का व्यक्तित्व बिल्कुल नारियल जैसा था – बाहर से सख्त लेकिन अंदर से बेहद संवेदनशील। वे नियमों का पालन करवाने में सख्त थे, लेकिन अपने छात्रों के प्रति उनके मन में गहरा स्नेह था। मुझे याद है, कई बार फीस देने में देरी हो जाती थी, लेकिन उन्होंने कभी मुझसे नाराजगी नहीं जताई। वे हमेशा शिक्षा को प्राथमिकता देते और कहते, “पैसे का सवाल बाद में, पहले पढ़ाई पर ध्यान दो।” पांडेय सर से छात्रवृत्ति के पैसे जब एडवांस में मांगते , तो वह राशि भी वे मुझे दे देते ताकि मेरी पढ़ाई प्रभावित न हो। उनका यह समर्पण और विश्वास मेरे लिए प्रेरणा का स्रोत रहा।
लेकिन अभी विगत दिनों जब मैंने अखबार में खबर पढ़ी कि विद्या निकेतन में नकल की घटनाएं हुई हैं, तो मन स्तब्ध रह गया। जिस स्कूल में मैंने नैतिकता और अनुशासन सीखा, वहाँ नकल का आरोप मेरे लिए विश्वास से परे था। पांडेय सर जैसे आदर्श शिक्षक के नेतृत्व में यह संभव ही नहीं हो सकता। मैंने जिस विद्या निकेतन में शिक्षा पाई थी, वहाँ के नियम और अनुशासन इतने सख्त थे कि नकल की कोई जगह ही नहीं थी। पांडेय सर का मानना था कि ईमानदारी से मिली शिक्षा ही असली शिक्षा है, और इसी पर उन्होंने हमेशा जोर दिया था।
इस खबर ने मेरे मन में एक द्वंद्व पैदा कर दिया। जिस स्कूल ने मुझे ईमानदारी, मेहनत, और अनुशासन सिखाया, वहाँ इस तरह के आरोप कैसे लग सकते हैं? हालांकि स्कूल प्रबंधन और विद्यालय समिति ने 7 मार्च 2025 को संभागीय अधिकारी बिलासपुर को अपने स्कूल को परीक्षा केंद्र नहीं बनाने के लिए चिट्ठी लिखी थी। इसके बावजूद, स्थानीय शिक्षा विभाग ने जानबूझकर विद्या निकेतन उमावि पामगढ़ को परीक्षा केंद्र बनाया, ताकि सामूहिक नकल हो सके। यहां बोर्ड परीक्षा के संचालन में स्कूल प्रबंधन या शिक्षकों की कोई भूमिका नहीं है, और न ही इस स्कूल के छात्र परीक्षा में शामिल हो रहे हैं। सरकारी स्कूल के शिक्षकों की निगरानी में सामूहिक नकल हो रही है, जिससे स्कूल की छवि खराब हो रही है।
मुझे याद है, पांडेय सर ने हमेशा कहा था, “नकल से केवल परीक्षा पास कर सकते हो, लेकिन जीवन की असली परीक्षा में नकल काम नहीं आएगी।” और यह बात उन्होंने अपने जीवन में भी सिद्ध की थी। उनकी शिक्षा का उद्देश्य केवल किताबें पढ़ाना नहीं था, बल्कि विद्यार्थियों को जीवन की चुनौतियों के लिए तैयार करना था।
विद्या निकेतन और पांडेय सर की शिक्षा ने मुझे यह सिखाया कि जीवन में सच्चाई और ईमानदारी ही सबसे महत्वपूर्ण है। आज जब लोग शिक्षा को एक साधन के रूप में देखते हैं, पांडेय सर ने हमें इसे एक साधना के रूप में देखने की प्रेरणा दी। उनके नेतृत्व में विद्या निकेतन में शिक्षा का जो माहौल था, वह न केवल ज्ञान देने वाला था, बल्कि चरित्र निर्माण करने वाला भी था।
आज, जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो समझता हूँ कि शिक्षा का असली उद्देश्य केवल डिग्री हासिल करना नहीं है, बल्कि एक बेहतर इंसान बनाना है। नकल करके केवल परीक्षा पास की जा सकती है, लेकिन जीवन की परीक्षाओं में सफलता पाने के लिए सच्चाई और मेहनत की जरूरत होती है। यही शिक्षा मुझे विद्या निकेतन और पांडेय सर से मिली, और आज मैं जिस भी मुकाम पर हूँ, उसमें उनका योगदान अमूल्य है।
श्री ओपी चौधरी के नेतृत्व में जिले से नकल की समस्या को समाप्त करने का जो प्रयास हुआ, वह शिक्षा के प्रति एक सकारात्मक कदम था। लेकिन पांडेय सर जैसे शिक्षकों के कारण हम जैसे विद्यार्थी सही मार्ग पर बढ़ सके। शिक्षा का असली उद्देश्य हमें केवल ज्ञान नहीं, बल्कि नैतिकता, ईमानदारी, और अनुशासन का पाठ पढ़ाना है, और पांडेय सर ने यह काम बखूबी किया।


Bahut jabardast bhaiya….aapne pandey sir ka jikra apne kitan m bhi kiya hai…💐💐💐
Thank you bhai