लेखक- एम बी बलवंत सिंह खन्ना ©️
पिछले दो सोमवारों की व्यस्तता के बाद जब कलम फिर से हाथ में आई, तो मन सीधे उस विषय की ओर गया जो हर घर, हर परिवार और हर भविष्य से जुड़ा है-शिक्षा।
अप्रैल का महीना है। स्कूलों में नए दाखिले शुरू हो चुके हैं। हर माता-पिता अपने बच्चे के भविष्य के लिए चिंतित है, उम्मीदों से भरा हुआ है, और अपने सामर्थ्य के अनुसार सर्वोत्तम विकल्प चुनने की कोशिश में लगा है।
लेकिन इसी प्रक्रिया के बीच एक बड़ा और असहज सवाल खड़ा होता है-
क्या आज शिक्षा सच में सभी के लिए समान अवसर है, या यह भी आर्थिक स्थिति का प्रतिबिंब बन चुकी है?
एक समय था जब देश में मुख्य रूप से शासकीय विद्यालय ही हुआ करते थे।
इन्हीं विद्यालयों से पढ़कर न जाने कितने लोग प्रशासनिक सेवाओं में गए, बड़े व्यवसायी बने, शिक्षाविद बने और समाज के हर क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई।
उन दिनों शिक्षा का अर्थ केवल संसाधनों से नहीं, बल्कि गुरु के समर्पण और छात्र के परिश्रम से तय होता था।
आज परिदृश्य बदल चुका है।
वर्तमान में समाज तीन स्पष्ट वर्गों में बंटा दिखाई देता है
अमीर, मध्यम वर्ग और गरीब– और शिक्षा के प्रति इन तीनों की स्थिति भी अलग-अलग हो गई है।

अमीर वर्ग के लिए शिक्षा अब “चयन” का विषय है।
वे अपने बच्चों को देश-विदेश के महंगे और प्रतिष्ठित विद्यालयों में भेज सकते हैं। उनके लिए फीस, संसाधन, सुविधाएँ-कोई बाधा नहीं हैं। उनके बच्चे आधुनिक तकनीक, वैश्विक exposure और बेहतर अवसरों के साथ आगे बढ़ते हैं।
मध्यम वर्ग एक संघर्ष की स्थिति में है।
वह चाहता है कि उसका बच्चा अच्छे निजी विद्यालय में पढ़े, ताकि उसका भविष्य सुरक्षित हो सके। लेकिन इसके लिए उसे अपनी आय का बड़ा हिस्सा शिक्षा पर खर्च करना पड़ता है।
यह वर्ग लगातार एक संतुलन साधने की कोशिश करता है-
सपनों और सामर्थ्य के बीच।
और गरीब वर्ग…
वह अभी भी इस उम्मीद में है कि “बच्चे पढ़-लिख जाएँ, यही बहुत है।”
उसके लिए शिक्षा अभी भी एक संघर्ष है- कभी संसाधनों का, कभी पहुँच का, और कभी गुणवत्ता का।
यहीं से सबसे बड़ा प्रश्न जन्म लेता है—
क्या शिक्षा का स्तर और गुणवत्ता अब व्यक्ति की आर्थिक स्थिति पर निर्भर हो गया है?

यदि इसका उत्तर “हाँ” है, तो यह केवल एक सामाजिक असमानता नहीं, बल्कि एक गंभीर चेतावनी है।
क्योंकि शिक्षा ही वह माध्यम है जो किसी भी व्यक्ति को उसकी वर्तमान स्थिति से उठाकर एक बेहतर भविष्य की ओर ले जा सकती है।
यदि वही शिक्षा असमान हो जाए, तो अवसर भी असमान हो जाते हैं
और फिर समाज में एक स्थायी विभाजन पैदा हो जाता है।
यह भी समझना जरूरी है कि शिक्षा केवल किताबों और डिग्रियों तक सीमित नहीं है।
शिक्षा वह है जो व्यक्ति को जीवन की जटिल परिस्थितियों से निकलने की समझ देती है।
यह व्यवहार सिखाती है, संस्कार देती है, निर्णय लेने की क्षमता विकसित करती है।
यदि बचपन में सही शिक्षा और सही संस्कार मिले,
तो व्यक्ति न केवल अपने जीवन को बेहतर बनाता है, बल्कि समाज के लिए भी उपयोगी बनता है।
लेकिन आज जब हम शासकीय और निजी विद्यालयों के बीच अंतर देखते हैं,
तो यह अंतर केवल इमारतों या सुविधाओं का नहीं, बल्कि विश्वास और गुणवत्ता का है।
सरकारी विद्यालयों में अब भी कई जगहों पर संसाधनों की कमी, शिक्षकों की अनुपलब्धता या गुणवत्ता को लेकर सवाल उठते हैं।
वहीं निजी विद्यालयों में भी एक समानता नहीं है
कुछ उच्च स्तर के हैं, तो कुछ केवल “नाम के निजी” हैं।
इसका सीधा असर विद्यार्थियों और अभिभावकों पर पड़ता है।
एक ओर अभिभावक आर्थिक दबाव झेलते हैं,
दूसरी ओर विद्यार्थी एक असमान प्रतिस्पर्धा में खड़े होते हैं।
तो क्या एक कल्याणकारी राज्य में यह स्थिति स्वीकार्य हो सकती है?
भारत जैसे देश में, जहाँ संविधान हर नागरिक को समान अवसर का अधिकार देता है,
क्या शिक्षा भी सभी के लिए समान गुणवत्ता में उपलब्ध नहीं होनी चाहिए?
यह प्रश्न केवल सरकार से नहीं,
बल्कि पूरे समाज से है।
सरकार की जिम्मेदारी है कि वह शासकीय विद्यालयों को इतना सशक्त बनाए कि वे किसी भी निजी विद्यालय से कम न हों।
शिक्षकों की गुणवत्ता, आधारभूत सुविधाएँ, आधुनिक तकनीक, इन सब पर गंभीरता से काम करना होगा।
लेकिन समाज की भी जिम्मेदारी है
कि वह शिक्षा को केवल “डिग्री” के रूप में न देखे,
बल्कि उसे जीवन निर्माण की प्रक्रिया के रूप में समझे।
अंततः यह समझना होगा कि
शिक्षा खर्च नहीं, निवेश है।
और यह निवेश केवल व्यक्ति का नहीं,
पूरे राष्ट्र का भविष्य तय करता है।
यदि हम चाहते हैं कि हमारा समाज मजबूत, संतुलित और प्रगतिशील बने,
तो हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि शिक्षा किसी की “सुविधा” नहीं,
बल्कि हर नागरिक का सशक्त अधिकार बने।
क्योंकि जहाँ शिक्षा शून्य होती है,
वहाँ संभावनाएँ भी शून्य हो जाती हैं।
और जहाँ शिक्षा समान होती है,
वहीं से एक सशक्त और समतामूलक समाज की शुरुआत होती है।

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